नई दिल्ली: केंद्र सरकार कमर्शियल वाहनों और ऑटोमोबाइल सेक्टर से जुड़े कारोबारियों को बड़ी राहत देने की तैयारी कर रही है। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) ने मोटर व्हीकल रूल्स में कई अहम बदलावों का प्रस्ताव रखा है। प्रस्तावित नियमों का सबसे बड़ा फायदा इलेक्ट्रिक (EV), हाइड्रोजन और सीएनजी जैसे वैकल्पिक ईंधन से चलने वाले कमर्शियल वाहनों को मिल सकता है।
सरकार के प्रस्ताव के मुताबिक, इन वाहनों की निर्धारित उम्र सीमा में 5 साल तक की बढ़ोतरी की जा सकती है। अगर यह प्रस्ताव अंतिम नियम का रूप लेता है, तो EV, हाइड्रोजन और नेचुरल गैस से चलने वाले कमर्शियल वाहनों को मौजूदा व्यवस्था की तुलना में लंबे समय तक व्यावसायिक इस्तेमाल किया जा सकेगा।
ट्रांसपोर्ट कारोबारियों को कैसे होगा फायदा?
कमर्शियल वाहनों की उम्र बढ़ने से फ्लीट ऑपरेटर्स और ट्रांसपोर्ट कंपनियों को सीधा आर्थिक फायदा मिल सकता है। बस, ट्रक, मालवाहक वाहन और दूसरे व्यावसायिक वाहनों को लंबे समय तक चलाने की अनुमति मिलने से कंपनियों को नए वाहन खरीदने की जरूरत कुछ समय के लिए टालने में मदद मिलेगी।
इससे कंपनियों की कैपिटल कॉस्ट कम हो सकती है और मौजूदा फ्लीट से अधिक समय तक कमाई की जा सकेगी। खासतौर पर उन कारोबारियों को राहत मिल सकती है जिन्होंने EV, CNG या हाइड्रोजन आधारित कमर्शियल वाहनों में निवेश किया है।
बिना बॉडी वाले चेसिस के लिए भी नया नियम
मंत्रालय ने बिना बॉडी वाले चेसिस के अस्थायी रजिस्ट्रेशन से जुड़े नियमों में भी बदलाव का प्रस्ताव दिया है। इसके तहत ऐसे चेसिस को 6 महीने तक का अस्थायी रजिस्ट्रेशन दिया जा सकता है।
जरूरत पड़ने पर इसकी अवधि को 30-30 दिन के लिए बढ़ाने का प्रावधान भी प्रस्तावित है। इससे वाहन निर्माताओं, बॉडी बिल्डर्स और ऑपरेटरों को सुविधा मिलेगी, क्योंकि कई मामलों में चेसिस पर बॉडी तैयार करने और वाहन को अंतिम रूप देने में अतिरिक्त समय लग जाता है।
दूसरे राज्य में रजिस्ट्रेशन के लिए भी राहत
पूरी तरह तैयार वाहन को दूसरे राज्य में रजिस्ट्रेशन कराने या किसी वाहन को Adapted Vehicle में बदलने के मामलों में भी अस्थायी रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है।
ऐसे मामलों में 45 दिन तक का अस्थायी रजिस्ट्रेशन दिया जा सकता है। इससे वाहन को एक राज्य से दूसरे राज्य ले जाने और वहां रजिस्ट्रेशन से जुड़ी जरूरी प्रक्रिया पूरी करने में आसानी होगी।
ऑटो कंपोनेंट कंपनियों को भी मिलेगा फायदा
सरकार ने ऑटो कंपोनेंट बनाने वाली कंपनियों से जुड़े नियमों में भी बदलाव का प्रस्ताव रखा है। मोटर व्हीकल रूल 33 के दायरे में ऑटो कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स को शामिल करने की योजना है।
इसका उद्देश्य ऑटो कंपोनेंट इंडस्ट्री में रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) और नए ऑटोमोटिव प्रोडक्ट्स के विकास को बढ़ावा देना है। इससे कंपनियों को नई तकनीक और आधुनिक वाहनों की जरूरत के मुताबिक कंपोनेंट विकसित करने में मदद मिल सकती है।
नेशनल परमिट की प्रक्रिया होगी आसान
कमर्शियल वाहनों के लिए नेशनल परमिट की प्रक्रिया को भी ज्यादा डिजिटल और आसान बनाने का प्रस्ताव है। इसके तहत नेशनल परमिट इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जारी किया जा सकेगा।
वाहन मालिकों को परमिट की अवधि चुनने का विकल्प भी मिल सकता है। प्रस्ताव के मुताबिक, 1 साल से 5 साल तक की अवधि चुनी जा सकेगी।
नेशनल परमिट की प्रस्तावित फीस 16,500 रुपये सालाना रखी गई है। डिजिटल प्रक्रिया से ट्रांसपोर्ट कंपनियों को बार-बार कागजी कार्रवाई करने से राहत मिल सकती है।
VAHAN से अपने आप आएंगी कई जानकारियां
डीलर ट्रेड सर्टिफिकेट में VAHAN से संबंधित जानकारी अपने आप आने का भी प्रस्ताव है। इसमें GST, PAN, उद्यम आधार और CIN जैसी जानकारियां शामिल हो सकती हैं।
इस बदलाव से डीलरों को अलग-अलग दस्तावेजों की जानकारी बार-बार दर्ज करने की जरूरत कम होगी। वाहन रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में आधार से लिंक मोबाइल नंबर के इस्तेमाल का भी प्रस्ताव है।
इसके अलावा, अगर वाहन पर लोन या हाइपोथिकेशन है तो एग्रीमेंट नंबर या लोन अकाउंट नंबर दर्ज करने की व्यवस्था भी प्रस्तावित की गई है।
नेशनल परमिट में दिखेगी जरूरी जानकारी
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत वाहन का नंबर दर्ज करने पर VAHAN डेटाबेस में उपलब्ध संबंधित जानकारियां अपने आप सामने आ सकती हैं।
नेशनल परमिट से जुड़े रिकॉर्ड में इंश्योरेंस, PUC, फिटनेस और पेंडिंग चालान की जानकारी भी दिखाई जा सकती है। इससे वाहन मालिकों और अधिकारियों के लिए जरूरी रिकॉर्ड की जांच आसान हो सकती है।
अभी लागू नहीं हुए हैं नए नियम
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये बदलाव फिलहाल प्रस्तावित स्तर पर हैं। सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने प्रस्तावित बदलावों पर स्टेकहोल्डर्स से 30 दिनों के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी हैं।
ट्रांसपोर्ट कंपनियां, वाहन निर्माता, ऑटो कंपोनेंट कंपनियां और दूसरे संबंधित पक्ष इस अवधि में अपनी राय दे सकते हैं। मिले सुझावों और आपत्तियों पर विचार करने के बाद सरकार प्रस्तावित नियमों को अंतिम रूप दे सकती है।
अगर नियम लागू होते हैं, तो इसका असर कमर्शियल व्हीकल सेक्टर पर व्यापक हो सकता है। खासतौर पर EV, CNG और हाइड्रोजन जैसे वैकल्पिक ईंधन वाले वाहनों के लिए लंबी परिचालन अवधि मिलने से फ्लीट ऑपरेटरों की लागत और वाहन बदलने की जरूरत पर असर पड़ सकता है।


