Crude Oil Price: वैश्विक कच्चे तेल (Crude Oil) बाजार में एक बार फिर बड़ी गिरावट की आशंका जताई जा रही है। Crystol Energy के ग्लोबल एडवाइजर Christof Ruehl का मानना है कि यदि मौजूदा परिस्थितियां बनी रहीं, तो कच्चे तेल की कीमत 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे भी जा सकती है। उनके अनुसार, इस पूरे समीकरण में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका चीन की खरीदारी रणनीति निभाएगी। यदि चीन अपने रणनीतिक तेल भंडार (Strategic Petroleum Reserve) को भरने में देरी करता है, तो वैश्विक बाजार में कीमतों पर और दबाव बढ़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों पर क्यों बढ़ा दबाव?
इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल करीब 72 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में तेल की सप्लाई मांग से अधिक रह सकती है।
हाल के दिनों में मध्य पूर्व में भू-राजनीतिक तनाव कुछ कम हुए हैं और Strait of Hormuz से तेल टैंकरों की आवाजाही भी सामान्य होती दिख रही है। इससे वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता बढ़ रही है और सप्लाई संबंधी चिंताएं कम हुई हैं।
Christof Ruehl के मुताबिक, यदि सप्लाई लगातार बढ़ती रही और मांग उसी गति से नहीं बढ़ी, तो कीमतों में गिरावट आना स्वाभाविक होगा।
चीन की खरीदारी तय करेगी बाजार की दिशा
विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 2026 की दूसरी छमाही में तेल बाजार का सबसे बड़ा फैसला चीन करेगा।
चीन दुनिया का सबसे बड़ा क्रूड ऑयल आयातक है और जब भी वह अपने Strategic Petroleum Reserve (SPR) को भरने के लिए बड़े पैमाने पर खरीदारी करता है, तब वैश्विक कीमतों में तेजी देखने को मिलती है।
लेकिन यदि चीन कम कीमतों का इंतजार करते हुए खरीदारी टाल देता है, तो बाजार में अतिरिक्त सप्लाई बनी रहेगी और कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे जा सकती हैं।
60 डॉलर का स्तर क्यों माना जा रहा है अहम?
Christof Ruehl का मानना है कि 60 डॉलर प्रति बैरल का स्तर तेल बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगा।
यदि कीमतें इस स्तर से नीचे जाती हैं, तो चीन अपने रणनीतिक भंडार को भरने के लिए बड़ी मात्रा में तेल खरीद सकता है। इससे बाजार में मांग अचानक बढ़ेगी और कीमतों को मजबूत समर्थन मिल सकता है।
यानी 60 डॉलर का स्तर केवल मनोवैज्ञानिक नहीं बल्कि वैश्विक तेल बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण सपोर्ट लेवल भी माना जा रहा है।
OPEC+ भी बढ़ा रहा है उत्पादन
तेल बाजार पर दबाव बढ़ने की एक और बड़ी वजह OPEC+ देशों की बढ़ती सप्लाई है।
विशेषज्ञों के अनुसार हाल के महीनों में OPEC+ ने उत्पादन बढ़ाने का फैसला किया है। इसके अलावा UAE, रूस, इराक और ईरान जैसे प्रमुख तेल उत्पादक देश भी अधिक उत्पादन कर रहे हैं।
जब बाजार में सप्लाई लगातार बढ़ती है और मांग अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंचती, तो कीमतों में गिरावट की संभावना बढ़ जाती है।
OPEC के सामने भी बढ़ सकती हैं चुनौतियां
Christof Ruehl का मानना है कि आने वाले वर्षों में OPEC के सामने कई नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
यदि वैश्विक स्तर पर तेल की मांग अपने उच्चतम स्तर (Peak Oil Demand) पर पहुंचने के बाद धीरे-धीरे कम होने लगती है, तो तेल उत्पादक देशों के बीच बाजार हिस्सेदारी को लेकर प्रतिस्पर्धा और तेज हो जाएगी।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि भविष्य में अन्य देश भी UAE की तरह OPEC से अलग होने का फैसला करते हैं, तो संगठन के लिए बाजार पर नियंत्रण बनाए रखना और कठिन हो सकता है।
क्या 2025 बनेगा ‘Peak Oil Demand’ का साल?
Christof Ruehl का मानना है कि यदि आने वाले समय में वर्ष 2025 को वैश्विक स्तर पर Peak Oil Demand का वर्ष माना जाता है, तो यह पूरी ऑयल इंडस्ट्री के लिए बड़ा बदलाव साबित होगा।
इसके बाद पारंपरिक तेल उत्पादकों को घटती मांग, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बाजार हिस्सेदारी बचाने की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
फिलहाल सबसे बड़ा जोखिम क्या है?
विशेषज्ञों के अनुसार फिलहाल तेल बाजार में सबसे बड़ा जोखिम कीमतों में गिरावट का है।
हालांकि यदि मध्य पूर्व या किसी अन्य क्षेत्र में नया बड़ा भू-राजनीतिक संकट पैदा होता है, तो सप्लाई प्रभावित हो सकती है और कीमतों में अचानक तेजी भी लौट सकती है।
लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में बाजार की नजर केवल एक सवाल पर टिकी हुई है—चीन आखिर कब और कितनी मात्रा में तेल खरीदेगा? इसी फैसले से आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतों की दिशा तय हो सकती है।
निष्कर्ष
वैश्विक कच्चा तेल बाजार इस समय सप्लाई बढ़ने और मांग को लेकर अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है। OPEC+ की बढ़ती उत्पादन नीति, मध्य पूर्व में सामान्य होती सप्लाई और चीन की रणनीतिक खरीदारी की टाइमिंग आने वाले महीनों में कीमतों का रुख तय करेगी। यदि चीन खरीदारी में देरी करता है तो कच्चा तेल 60 डॉलर प्रति बैरल से नीचे भी जा सकता है, जबकि बड़ी खरीदारी शुरू होते ही बाजार को मजबूत सहारा मिल सकता है।
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