भारत में रुपये की कमजोरी, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच देश की अर्थव्यवस्था को लेकर बहस तेज हो गई है। इसी बीच 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष और जाने-माने अर्थशास्त्री Arvind Panagariya ने गिरते रुपये को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा कि कमजोर होता रुपया निश्चित रूप से एक गंभीर बाहरी झटका है, लेकिन इसे आर्थिक संकट कहना गलत होगा।
एक बातचीत में पनगढ़िया ने कहा कि भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति 2013 जैसी नहीं है और देश के व्यापक आर्थिक संकेतक अभी भी मजबूत बने हुए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों में उछाल और भू-राजनीतिक तनाव का असर जरूर पड़ रहा है, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था उसे संभालने की स्थिति में है।
रुपये की गिरावट पर क्या बोले अरविंद पनगढ़िया?
पनगढ़िया ने कहा कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए इसका सीधा असर रुपये, महंगाई और सरकारी सब्सिडी पर पड़ता है। इसके बावजूद उन्होंने कहा कि यह स्थिति “आर्थिक संकट” जैसी नहीं है।
उन्होंने कहा कि कुछ अर्थशास्त्री भारत की तुलना 2013 के “Fragile Five” देशों से कर रहे हैं, लेकिन यह तुलना सही नहीं है। उनके मुताबिक उस समय भारत की स्थिति कहीं अधिक कमजोर थी, जबकि आज विदेशी मुद्रा भंडार, निवेश और विकास दर जैसे कई आर्थिक संकेतक बेहतर स्थिति में हैं।
सुरजीत भल्ला की चेतावनी को बताया गलत
इस दौरान पनगढ़िया ने अर्थशास्त्री Surjit Bhalla की उन टिप्पणियों को भी खारिज किया, जिनमें भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता जताई गई थी। उन्होंने कहा कि भारत को “Fragile Five” जैसी स्थिति में बताना भ्रम पैदा करने वाला है।
पनगढ़िया का कहना था कि भारत के पास आज बेहतर विदेशी मुद्रा भंडार, मजबूत बैंकिंग सिस्टम और नियंत्रित चालू खाता घाटा जैसी कई ताकतें मौजूद हैं, जो देश को बड़े आर्थिक संकट से बचाती हैं।
वित्त मंत्री के ‘3F’ फॉर्मूले पर क्या कहा?
पनगढ़िया ने वित्त मंत्री Nirmala Sitharaman द्वारा बताए गए “3F” यानी Foreign Exchange, Fertiliser और Fuel पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने माना कि इन तीनों मोर्चों पर फिलहाल दबाव है।
दरअसल डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल है, उर्वरक सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है लेकिन इसके बावजूद उन्होंने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति मजबूत बनी हुई है।
भारत की अर्थव्यवस्था क्यों मजबूत मानी जा रही?
पनगढ़िया ने अपने तर्क के समर्थन में कई अहम आर्थिक आंकड़े भी पेश किए। उनके अनुसार पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपेक्षाकृत स्थिर आर्थिक प्रदर्शन किया है।
प्रमुख आर्थिक संकेतक
| संकेतक | स्थिति |
|---|---|
| औसत GDP ग्रोथ | 7.3% |
| सकल स्थिर निवेश | GDP का 31-32% |
| औसत महंगाई | करीब 4.3% |
| चालू खाता घाटा | GDP के 1% के भीतर |
उन्होंने कहा कि ये आंकड़े दिखाते हैं कि भारत की मैक्रो-इकोनॉमिक स्थिति अभी भी कई बड़े देशों की तुलना में बेहतर है।
गिरते रुपये का आम लोगों पर क्या असर?
हालांकि पनगढ़िया ने आर्थिक संकट की आशंका से इनकार किया, लेकिन गिरते रुपये का असर आम लोगों पर पड़ सकता है। खासतौर पर पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है LPG और CNG की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है आयातित इलेक्ट्रॉनिक सामान महंगे हो सकते हैं खाद्य महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी बढ़ सकता है।
GDP ग्रोथ पर कितना असर पड़ सकता है?
पनगढ़िया ने कहा कि अगर पश्चिम एशिया संकट जल्दी खत्म हो जाता है, तो भारत की GDP ग्रोथ में केवल 0.5% तक की गिरावट आ सकती है और विकास दर करीब 6.5% रह सकती है।
लेकिन अगर तेल संकट पूरे साल जारी रहता है, तो ग्रोथ घटकर 6% तक आ सकती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती के माहौल में भी 6% की विकास दर मजबूत मानी जाएगी।
क्या 2013 जैसी स्थिति बन सकती है?
विशेषज्ञों के मुताबिक फिलहाल भारत की स्थिति 2013 जैसी नहीं दिखती। उस समय चालू खाता घाटा काफी ज्यादा था, विदेशी निवेश तेजी से निकल रहा था रुपया अचानक कमजोर हुआ था लेकिन अब RBI के पास बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है, बैंकिंग सिस्टम पहले से मजबूत है, टैक्स कलेक्शन और निवेश बेहतर स्थिति में हैं. इसी वजह से कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि मौजूदा दबाव गंभीर जरूर है, लेकिन यह तत्काल आर्थिक संकट का संकेत नहीं है।
निष्कर्ष
रुपये की कमजोरी और तेल की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का विषय जरूर हैं, लेकिन Arvind Panagariya का मानना है कि भारत की बुनियादी आर्थिक स्थिति अभी भी मजबूत बनी हुई है। आने वाले महीनों में पश्चिम एशिया का संकट, कच्चे तेल की कीमतें और वैश्विक बाजारों का रुख तय करेगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसका कितना बड़ा असर पड़ता है।
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