नौकरी की सुरक्षित दुनिया छोड़कर चुना अनिश्चितता भरा रास्ता
भारत में अधिकांश लोग एक अच्छी नौकरी को करियर का अंतिम लक्ष्य मानते हैं। खासतौर पर जब नौकरी किसी प्रतिष्ठित आईटी कंपनी में हो, विदेश में काम करने का अवसर मिला हो और आकर्षक वेतन मिल रहा हो, तब उसे छोड़कर बिजनेस शुरू करने का फैसला लेना आसान नहीं होता। लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सुरक्षित रास्ते की बजाय अपने सपनों का पीछा करना पसंद करते हैं। यूनोसर्च (UnoSearch) के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पंकज श्रीवास्तव उन्हीं लोगों में शामिल हैं।
आज उनकी कंपनी डिजिटल मार्केटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सेवाओं के क्षेत्र में काम कर रही है और करोड़ों रुपये का सालाना रेवेन्यू हासिल कर चुकी है। हालांकि इस सफलता तक पहुंचने का उनका सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। यूनोसर्च की स्थापना से पहले उनके तीन कारोबार असफल हो चुके थे और उन्हें लगभग 2 करोड़ रुपये का नुकसान झेलना पड़ा था।
मध्यमवर्गीय परिवार से निकलकर आईटी सेक्टर तक का सफर
पंकज श्रीवास्तव का जन्म महाराष्ट्र के नवी मुंबई में एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। उनके परिवार में पहले किसी ने कारोबार नहीं किया था। परिवार की सोच पारंपरिक थी और अधिकांश सदस्य नौकरीपेशा थे। ऐसे माहौल में व्यवसाय शुरू करने की कल्पना भी आसान नहीं थी।
उन्होंने कंप्यूटर एप्लीकेशन में मास्टर डिग्री (MCA) हासिल की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें देश की प्रमुख आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) में नौकरी मिल गई। आईटी सेक्टर में उनका करियर तेजी से आगे बढ़ा और बेहतर प्रदर्शन के कारण उन्हें अमेरिका में काम करने का अवसर भी मिला।
अमेरिका में नौकरी के दौरान उन्हें वैश्विक कारोबारी संस्कृति को करीब से देखने का मौका मिला। वहीं से उनके अंदर उद्यमिता को लेकर गंभीर सोच विकसित हुई। उन्होंने महसूस किया कि अमेरिका में बड़ी संख्या में लोग नौकरी करने के बजाय अपना व्यवसाय खड़ा करने को प्राथमिकता देते हैं।
अमेरिका की आरामदायक जिंदगी छोड़ने का फैसला
विदेश में अच्छी सैलरी, सुरक्षित भविष्य और आरामदायक जीवन होने के बावजूद पंकज के मन में हमेशा अपना कुछ बनाने का सपना था। उन्होंने महसूस किया कि यदि वे अपने विचारों को व्यवसाय में नहीं बदलेंगे तो जीवनभर इसका पछतावा रहेगा।
करीब चार वर्षों तक अमेरिका में काम करने के बाद उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जिसे कई लोग जोखिम भरा मानते। उन्होंने नौकरी छोड़ दी और भारत लौट आए।
यह फैसला सिर्फ करियर बदलने का नहीं था, बल्कि पूरी जिंदगी की दिशा बदलने जैसा था।
एक नहीं, लगातार तीन बिजनेस हुए फेल
भारत लौटने के बाद पंकज ने वर्ष 2008 में अपना पहला कारोबार शुरू किया। उन्होंने किसी निवेशक से पैसा लेने के बजाय अपनी खुद की बचत का इस्तेमाल किया। उन्हें विश्वास था कि मेहनत और तकनीकी अनुभव के दम पर वे सफल हो जाएंगे।
लेकिन वास्तविक दुनिया की कारोबारी चुनौतियां नौकरी की दुनिया से अलग थीं।
पहला व्यवसाय सफल नहीं हुआ और बंद करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने दूसरा उद्यम शुरू किया, लेकिन वह भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया। इसके बाद तीसरी कोशिश की गई, लेकिन वह भी असफल रही।
लगातार तीन असफलताओं ने उनकी आर्थिक स्थिति को बुरी तरह प्रभावित कर दिया। वर्ष 2014 तक उन्हें लगभग 2 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा था। कई लोगों के लिए यह स्थिति कारोबार छोड़ देने की वजह बन सकती थी।
लेकिन पंकज ने इसे अपनी यात्रा का अंत नहीं माना।
असफलताओं से सीखे सबक बने सबसे बड़ी पूंजी
उद्यमिता की दुनिया में अक्सर कहा जाता है कि असफलता सबसे महंगी लेकिन सबसे उपयोगी शिक्षक होती है। पंकज श्रीवास्तव का अनुभव भी कुछ ऐसा ही रहा।
पहले तीन कारोबारों की असफलता ने उन्हें बाजार, ग्राहकों की जरूरत, बिजनेस मॉडल और लागत नियंत्रण जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं को बेहतर तरीके से समझने का अवसर दिया। उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ तकनीकी ज्ञान से कंपनी नहीं चलती, बल्कि सही रणनीति, ग्राहक की समस्या का समाधान और वित्तीय अनुशासन भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।
यही अनुभव बाद में यूनोसर्च की सफलता की नींव बना।
परिवार की मदद से शुरू हुई यूनोसर्च
लगातार नुकसान के बाद उनकी अधिकांश बचत समाप्त हो चुकी थी। ऐसे समय में परिवार और करीबी लोगों ने उनका साथ दिया।
वर्ष 2014 में उन्होंने अपनी पत्नी प्रेरणा श्रीवास्तव के साथ मिलकर यूनोसर्च की स्थापना की। कंपनी शुरू करने के लिए उन्होंने लगभग 1 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी जुटाई।
यह रकम किसी बड़ी टेक कंपनी के लिए बेहद छोटी मानी जा सकती है, लेकिन पंकज के लिए यह नई शुरुआत का अवसर था।
उन्होंने शुरुआत में हेल्थकेयर क्षेत्र की कंपनियों को डिजिटल मार्केटिंग सेवाएं देना शुरू किया। सीमित संसाधनों के बावजूद उनका फोकस सेवा की गुणवत्ता और ग्राहक संतुष्टि पर रहा।
रिलायंस जियो के बाद मिला बड़ा अवसर
भारत में वर्ष 2016 डिजिटल क्रांति का वर्ष माना जाता है। रिलायंस जियो की एंट्री के बाद इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ी। ऑनलाइन कारोबार और डिजिटल मार्केटिंग की मांग भी तेजी से बढ़ने लगी।
यूनोसर्च के लिए यह बड़ा अवसर साबित हुआ।
कंपनी ने डिजिटल मार्केटिंग के साथ-साथ नई तकनीकों को अपनाना शुरू किया। समय के साथ उसने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सेवाओं पर भी काम बढ़ाया। इससे कंपनी को वैश्विक ग्राहकों तक पहुंचने में मदद मिली।
आज 150 से ज्यादा क्लाइंट और करोड़ों का कारोबार
लगातार मेहनत और रणनीतिक विस्तार के दम पर यूनोसर्च ने मजबूत पहचान बनाई। आज कंपनी के लगभग 150 क्लाइंट हैं, जिनमें बड़ी संख्या अमेरिका आधारित ग्राहकों की है।
कंपनी में 80 से अधिक कर्मचारी काम कर रहे हैं। भारत के अलावा अमेरिका और यूरोप के ग्राहकों को भी डिजिटल मार्केटिंग और एआई समाधान उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
पंकज श्रीवास्तव के अनुसार कंपनी का सालाना रेवेन्यू अब लगभग 10 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।
यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसकी शुरुआत बेहद सीमित पूंजी से हुई थी और इससे पहले संस्थापक तीन बड़ी असफलताओं का सामना कर चुके थे।
युवाओं के लिए क्या सीख है?
पंकज श्रीवास्तव की कहानी सिर्फ एक कारोबारी सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि धैर्य और दृढ़ता का उदाहरण भी है।
उनकी यात्रा बताती है कि:
- अच्छी नौकरी छोड़ना जोखिम भरा हो सकता है, लेकिन सही तैयारी के साथ यह अवसर भी बन सकता है।
- असफलता हमेशा अंत नहीं होती।
- बिजनेस में अनुभव और सीख कई बार पूंजी से अधिक मूल्यवान साबित होते हैं।
- परिवार का सहयोग कठिन समय में सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।
- डिजिटल और एआई जैसे उभरते क्षेत्रों में आज भी बड़े अवसर मौजूद हैं।
निष्कर्ष
पंकज श्रीवास्तव ने अमेरिका की सुरक्षित नौकरी छोड़कर उद्यमिता का रास्ता चुना। तीन कारोबारों की असफलता और करीब 2 करोड़ रुपये के नुकसान के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। वर्ष 2014 में मात्र 1 लाख रुपये से शुरू हुई यूनोसर्च आज करोड़ों रुपये का कारोबार कर रही है और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों को सेवाएं दे रही है।
उनकी कहानी यह साबित करती है कि सफलता का रास्ता हमेशा सीधा नहीं होता। कई बार बड़ी उपलब्धियों तक पहुंचने से पहले असफलताओं की लंबी श्रृंखला से गुजरना पड़ता है। जो व्यक्ति हर गिरावट के बाद फिर खड़ा होने की क्षमता रखता है, वही अंततः अपनी मंजिल तक पहुंचता है।


