Egg Chicken Price Hike: देशभर में अंडे और चिकन की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम लोगों का किचन बजट बिगाड़ दिया है। प्रोटीन के सस्ते स्रोत माने जाने वाले अंडे और चिकन अब पहले के मुकाबले महंगे मिल रहे हैं। इसके पीछे मौसम और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियां तो हैं ही, लेकिन पोल्ट्री सेक्टर की सबसे बड़ी चिंता फीड की बढ़ती लागत है। मक्का और सोयाबीन मील की कीमतों में मजबूती ने मुर्गियों को पालने की लागत बढ़ा दी है, जिसका असर धीरे-धीरे खुदरा बाजार तक पहुंच रहा है।
अंडे और चिकन की कीमतों में क्यों आया उछाल?
पोल्ट्री उद्योग में उत्पादन लागत का बड़ा हिस्सा मुर्गियों के खाने यानी फीड पर खर्च होता है। फीड में मुख्य रूप से मक्का और सोयाबीन मील का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में इन दोनों कच्चे माल की कीमत बढ़ने पर पोल्ट्री किसानों की लागत सीधे बढ़ जाती है।
इस साल पोल्ट्री फीड की कीमतों में करीब 15 फीसदी की बढ़ोतरी देखी गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक फीड की कीमत लगभग ₹4,400 प्रति क्विंटल तक पहुंच गई, जबकि एक साल पहले यह करीब ₹3,600 प्रति क्विंटल थी।
सोयाबीन मील की कीमत भी लगभग ₹62,000 से ₹65,000 प्रति टन के आसपास बनी हुई है। फीड की लागत बढ़ने से ब्रॉयलर चिकन और लेयर फार्म दोनों पर दबाव बढ़ा है।
मक्के की मांग बढ़ने से बढ़ी चिंता
पोल्ट्री फीड में मक्का सबसे अहम कच्चे माल में से एक है। उद्योग के अनुमानों के अनुसार, फीड में मक्के की हिस्सेदारी करीब 55-60 फीसदी तक हो सकती है। इसलिए मक्के की कीमत में मामूली बदलाव भी पोल्ट्री उत्पादन की लागत पर बड़ा असर डाल सकता है।
मक्के की मांग सिर्फ पोल्ट्री उद्योग तक सीमित नहीं है। एथेनॉल उत्पादन में भी मक्के का इस्तेमाल बढ़ा है। इससे मक्के के लिए फूड, फीड और एथेनॉल सेक्टर के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है।
देश में मक्के का उत्पादन अच्छी स्थिति में होने के बावजूद बढ़ती मांग उपलब्ध सप्लाई पर दबाव बना रही है। रिपोर्ट्स में नई फसल आने से पहले करीब 15 लाख टन की कमी की आशंका भी जताई गई है।
फीड महंगा होने का असर ग्राहक तक कैसे पहुंचता है?
फीड की कीमत बढ़ने का असर पोल्ट्री फार्म तक कई चरणों में पहुंचता है।
सबसे पहले फीड मिलों की लागत बढ़ती है। इसके बाद पोल्ट्री किसानों को ब्रॉयलर मुर्गियों को तैयार करने और अंडा देने वाली मुर्गियों को पालने के लिए अधिक खर्च करना पड़ता है।
अगर बाजार में किसानों को मिलने वाली कीमत उत्पादन लागत के अनुपात में नहीं बढ़ती, तो उनका मुनाफा कम हो जाता है। लंबे समय तक ऐसी स्थिति रहने पर किसान उत्पादन घटाने का फैसला कर सकते हैं।
दूसरी तरफ, यदि बढ़ी हुई लागत बाजार में ट्रांसफर होती है तो थोक और खुदरा कीमतें बढ़ जाती हैं। यही वजह है कि पोल्ट्री फीड की कीमतों का असर आखिरकार अंडे और चिकन खरीदने वाले ग्राहकों की जेब पर दिखाई देता है।
गर्मी ने भी बढ़ाई पोल्ट्री सेक्टर की मुश्किल
फीड महंगा होने के अलावा मौसम भी पोल्ट्री उद्योग के लिए चुनौती बना हुआ है। अत्यधिक गर्मी में मुर्गियों की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इससे ब्रॉयलर चिकन की उपलब्धता पर असर पड़ता है और बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं।
अंडा उत्पादन में भी मौसम की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उत्पादन और सप्लाई में मामूली बदलाव का असर कई स्थानीय बाजारों में कीमतों पर तेजी से दिखाई देता है।
अंडे की कीमतें कई बाजारों में रिकॉर्ड स्तर पर
फीड और सप्लाई की बढ़ती लागत का असर अंडे की कीमतों में भी देखने को मिला है। रिपोर्ट्स के अनुसार, जुलाई में हैदराबाद में फार्म-लेवल अंडे की कीमतों में महीने-दर-महीने करीब 15 फीसदी और सालाना आधार पर लगभग 40 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
कई बाजारों में खुदरा अंडे की कीमत करीब ₹8.5 से ₹9 प्रति अंडा तक पहुंच गई। हालांकि स्थानीय बाजार में कीमतें मांग, सप्लाई, परिवहन और मौसम के हिसाब से अलग-अलग हो सकती हैं।
भारत में अंडा उत्पादन कितना है?
भारत दुनिया के बड़े अंडा उत्पादक देशों में शामिल है। पशुपालन एवं डेयरी विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में देश में 149.11 अरब अंडों का उत्पादन हुआ।
इसमें कॉमर्शियल पोल्ट्री की हिस्सेदारी करीब 84.49 फीसदी रही। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि फीड की कीमतों में बदलाव का असर देश के बड़े संगठित पोल्ट्री कारोबार पर कितना व्यापक हो सकता है।
मक्का और सोयाबीन मील क्यों हैं इतने महत्वपूर्ण?
पोल्ट्री फीड को आसान भाषा में समझें तो मक्का मुर्गियों को ऊर्जा देता है, जबकि सोयाबीन मील प्रोटीन का प्रमुख स्रोत है। इसलिए दोनों की कीमतें पोल्ट्री फार्म की लागत तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
यदि मक्का और सोयाबीन मील दोनों महंगे बने रहते हैं, तो किसानों के लिए उत्पादन लागत कम करना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा दवाइयां, बिजली, श्रम, परिवहन और अन्य परिचालन खर्च भी कुल लागत में शामिल होते हैं।
यानी अंडे या चिकन की कीमत सिर्फ फार्म से बाजार तक पहुंचने के दौरान तय नहीं होती। इसके पीछे फीड, मौसम, उत्पादन, सप्लाई और बाजार की मांग जैसे कई कारक काम करते हैं।
आगे क्या हो सकता है?
पोल्ट्री सेक्टर के लिए सबसे अहम बात आने वाली फसल और मक्के की उपलब्धता होगी। यदि नई फसल के बाद मक्के की सप्लाई बढ़ती है और कीमतों पर दबाव कम होता है, तो फीड की लागत में राहत मिल सकती है।
लेकिन अगर एथेनॉल सहित दूसरे क्षेत्रों से मक्के की मांग मजबूत बनी रहती है, तो पोल्ट्री किसानों की लागत पर दबाव बना रह सकता है। ऐसे में अंडे और चिकन की कीमतों में राहत आने की रफ्तार भी सीमित हो सकती है।
कुल मिलाकर, अंडे और चिकन की महंगाई के पीछे सिर्फ खुदरा दुकानदारों या स्थानीय सप्लाई की भूमिका नहीं है। इसकी जड़ पोल्ट्री सेक्टर की उत्पादन लागत में है। मक्का और सोयाबीन मील महंगे होने से फीड महंगा हुआ, फीड महंगा होने से पोल्ट्री फार्म की लागत बढ़ी और इसका असर अंततः उपभोक्ता कीमतों पर दिखाई दिया।


