Cancer in Children: बच्चे के बार-बार बीमार पड़ने पर माता-पिता अक्सर इसे मौसम बदलने, वायरल संक्रमण या सामान्य कमजोरी से जोड़कर देखते हैं। ज्यादातर मामलों में ऐसा होना सामान्य भी है। लेकिन यदि बुखार बार-बार लौट रहा हो, लगातार हड्डियों या जोड़ों में दर्द हो, बिना चोट के शरीर पर नीले निशान पड़ रहे हों या कोई असामान्य गांठ नजर आ रही हो, तो इसे लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ऐसे लक्षण कई सामान्य बीमारियों में भी दिखाई दे सकते हैं, लेकिन कुछ मामलों में ये गंभीर बीमारी का संकेत हो सकते हैं।
बच्चों में होने वाला कैंसर वयस्कों के कैंसर से कई मायनों में अलग होता है। इनमें ल्यूकीमिया यानी रक्त कैंसर सबसे आम कैंसर माना जाता है। इसके अलावा ब्रेन ट्यूमर, लिम्फोमा, किडनी और आंख से जुड़े कुछ कैंसर भी बच्चों में देखे जाते हैं। अच्छी बात यह है कि कई बाल कैंसर का इलाज संभव है और समय पर बीमारी की पहचान होने पर बच्चों के स्वस्थ होने की संभावना काफी बेहतर हो सकती है।
हाल ही में The Lancet Regional Health – Southeast Asia में प्रकाशित एक अध्ययन ने दक्षिण एशिया में बच्चों में कैंसर के बोझ पर ध्यान आकर्षित किया। अध्ययन के मुताबिक, सार्क देशों में बच्चों के कैंसर के करीब 69 प्रतिशत मामले भारत में सामने आते हैं। भारत की बड़ी आबादी के साथ-साथ जांच और उपचार की उपलब्धता में अंतर भी इस आंकड़े को प्रभावित कर सकता है। वहीं, जागरूकता की कमी और इलाज तक देर से पहुंचने के कारण कुछ मामलों में बीमारी की पहचान देर से होने की आशंका रहती है।
बच्चों में कैंसर आखिर क्यों होता है?
बच्चों में कैंसर का कोई एक कारण नहीं होता। ज्यादातर मामलों में यह कहना संभव नहीं होता कि बच्चे को कैंसर किस वजह से हुआ। कैंसर तब विकसित होता है जब शरीर की कुछ कोशिकाओं में ऐसे आनुवंशिक बदलाव हो जाते हैं, जिनके कारण वे सामान्य तरीके से बढ़ने और विभाजित होने के बजाय अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं।
बचपन में शरीर तेजी से विकसित होता है और नई कोशिकाएं लगातार बनती रहती हैं। इसी प्रक्रिया के दौरान कभी-कभी कोशिकाओं के आनुवंशिक पदार्थ में बदलाव हो सकते हैं। अधिकांश बदलाव शरीर की सामान्य प्रक्रियाओं से नियंत्रित हो जाते हैं, लेकिन कुछ बदलाव कोशिकाओं के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं।
राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट एंड रिसर्च सेंटर के हेमेटोलॉजिस्ट और बोन मैरो ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. नरेंद्र अग्रवाल के अनुसार, बच्चों में कैंसर के ज्यादातर मामलों में कोई एक स्पष्ट कारण सामने नहीं आता। इसलिए बच्चे को कैंसर होने पर माता-पिता को खुद को इसके लिए दोषी नहीं मानना चाहिए।
क्या प्रदूषण और बदलती लाइफस्टाइल भी जिम्मेदार हैं?
प्रदूषण, खानपान, रसायनों का संपर्क और पर्यावरणीय बदलाव बच्चों की सेहत को लेकर चिंता जरूर बढ़ाते हैं। हालांकि, बच्चों में होने वाले कैंसर को केवल बदलती जीवनशैली या खानपान की वजह से जोड़ना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
कुछ खास कैंसर में पर्यावरणीय कारकों की भूमिका हो सकती है, लेकिन हर बच्चे के मामले में यही कारण हो, ऐसा जरूरी नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जिन क्षेत्रों में कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी दिखाई देती है, वहां हवा, पानी, मिट्टी और अन्य पर्यावरणीय कारकों पर वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना जरूरी है।
इसके अलावा आज कैंसर की जांच और पहचान पहले के मुकाबले बेहतर हुई है। ज्यादा बच्चे अस्पतालों और विशेषज्ञ कैंसर केंद्रों तक पहुंच रहे हैं। इसलिए कुछ मामलों में अधिक संख्या सामने आने का मतलब यह भी हो सकता है कि बीमारी पहले की तुलना में बेहतर तरीके से पहचानी जा रही है।
बच्चों में ल्यूकीमिया सबसे आम क्यों है?
ल्यूकीमिया बच्चों में होने वाले सबसे आम कैंसर में शामिल है। यह रक्त बनाने वाली कोशिकाओं और अस्थि मज्जा से जुड़ी बीमारी है।
बच्चों में शरीर के विकास के दौरान नई रक्त कोशिकाएं तेजी से बनती हैं। अस्थि मज्जा इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसी दौरान किसी कोशिका के आनुवंशिक पदार्थ में बदलाव होने पर उसके सामान्य विकास और विभाजन की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है।
यदि असामान्य कोशिकाएं तेजी से बढ़ने लगें और सामान्य रक्त कोशिकाओं के निर्माण को प्रभावित करें, तो ल्यूकीमिया विकसित हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि किसी एक खानपान की आदत या माता-पिता की किसी गलती से बच्चे को ल्यूकीमिया हुआ है।
बच्चों में कैंसर के कौन-कौन से लक्षण दिखाई दे सकते हैं?
बाल कैंसर की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके शुरुआती संकेत कई बार सामान्य संक्रमण या दूसरी आम बीमारियों जैसे लगते हैं। इसलिए किसी एक लक्षण को देखकर कैंसर का निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए।
फिर भी कुछ संकेत ऐसे हैं जिनके लगातार बने रहने या बार-बार लौटने पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है:
- बार-बार या लंबे समय तक बुखार रहना
- बिना स्पष्ट कारण बहुत ज्यादा थकान या कमजोरी
- बार-बार संक्रमण होना
- शरीर में खून की कमी के संकेत
- बिना चोट के शरीर पर नीले या बैंगनी निशान पड़ना
- नाक या मसूड़ों से बार-बार खून आना
- हड्डियों या जोड़ों में लगातार दर्द
- वजन कम होना या भूख में असामान्य कमी
- पेट में असामान्य गांठ या सूजन
- गर्दन, बगल या शरीर के अन्य हिस्सों में असामान्य गांठ
- आंख की पुतली में फोटो खींचने पर सफेद चमक दिखाई देना
- अचानक भेंगापन या आंखों से जुड़ी असामान्य समस्या
इनमें से किसी भी लक्षण का होना अपने आप में कैंसर की पुष्टि नहीं करता। वायरल संक्रमण, एनीमिया, चोट, अन्य संक्रमण और कई सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं में भी ऐसे संकेत दिखाई दे सकते हैं।
लेकिन अगर कोई लक्षण लगातार बना हुआ है, बार-बार वापस आ रहा है या सामान्य इलाज के बाद भी ठीक नहीं हो रहा, तो बच्चे को बाल रोग विशेषज्ञ को दिखाना बेहतर है।
पेट में गांठ और आंख में सफेद चमक क्यों महत्वपूर्ण हैं?
बच्चों में कुछ कैंसर अपेक्षाकृत खास संकेतों के साथ सामने आ सकते हैं। उदाहरण के लिए, पेट में बिना दर्द की असामान्य गांठ कुछ किडनी से जुड़े बाल कैंसर का संकेत हो सकती है।
इसी तरह आंख की पुतली में सामान्य लाल प्रतिबिंब के बजाय फोटो में सफेद चमक दिखाई देना, या अचानक भेंगापन जैसी समस्या आंख से जुड़े कैंसर समेत कुछ गंभीर स्थितियों का संकेत हो सकती है।
हालांकि, इन संकेतों के कई अन्य कारण भी हो सकते हैं। इसलिए घबराने के बजाय जल्द से जल्द विशेषज्ञ से जांच करवाना अधिक महत्वपूर्ण है।
क्या बच्चों में कैंसर को रोका जा सकता है?
वर्तमान चिकित्सा जानकारी के अनुसार बच्चों में होने वाले ज्यादातर कैंसर को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि कई बाल कैंसर कोशिकाओं में होने वाले आनुवंशिक बदलावों से जुड़े होते हैं, जिनका पहले से अनुमान लगाना या रोकना संभव नहीं होता।
इसका मतलब यह भी है कि बच्चे को कैंसर होने के लिए माता-पिता की किसी एक आदत या गलती को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
फिर भी बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए कुछ सामान्य कदम महत्वपूर्ण हैं:
- बच्चे को संतुलित और पौष्टिक आहार दें।
- टीकाकरण समय पर करवाएं।
- धूम्रपान के धुएं और अनावश्यक रसायनों के संपर्क से बचाएं।
- साफ-सुथरा और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराएं।
- बच्चे की सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं का समय पर इलाज करवाएं।
- लंबे समय से बने असामान्य लक्षणों को नजरअंदाज न करें।
इन उपायों का उद्देश्य कैंसर की गारंटी के साथ रोकथाम करना नहीं है, बल्कि बच्चे के समग्र स्वास्थ्य को बेहतर रखना है।
समय पर पहचान क्यों है सबसे जरूरी?
बच्चों में कैंसर के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात है कि बीमारी की पहचान में अनावश्यक देरी न हो। शुरुआती लक्षण सामान्य बीमारी जैसे लग सकते हैं, इसलिए माता-पिता को हर बुखार या दर्द को कैंसर समझकर घबराने की जरूरत नहीं है।
लेकिन यदि लक्षण असामान्य हैं, लगातार बने हुए हैं या बार-बार लौट रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। डॉक्टर बच्चे की स्थिति के आधार पर शारीरिक जांच और आवश्यक टेस्ट की सलाह दे सकते हैं।
डॉ. नरेंद्र अग्रवाल के मुताबिक, ल्यूकीमिया समेत बच्चों में होने वाले कई कैंसर का इलाज संभव है और कई बच्चे इलाज के बाद पूरी तरह स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। इसलिए कैंसर के नाम से डरने के बजाय समय पर विशेषज्ञ की सलाह और सही जांच पर ध्यान देना सबसे महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
बच्चों में कैंसर के पीछे अक्सर कोई एक स्पष्ट कारण नहीं होता और ज्यादातर मामलों में माता-पिता इसके लिए जिम्मेदार नहीं होते। ल्यूकीमिया बच्चों में सबसे आम कैंसर है और इसके लक्षण शुरुआत में सामान्य संक्रमण जैसे दिखाई दे सकते हैं।
बार-बार बुखार, लगातार हड्डियों का दर्द, बिना चोट के नीले निशान, असामान्य रक्तस्राव, शरीर में गांठ या आंख में सफेद चमक जैसे संकेतों को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इनका मतलब कैंसर होना जरूरी नहीं है, लेकिन ऐसे लक्षण बने रहने पर डॉक्टर से जांच करवाना समझदारी है। समय पर पहचान और उचित उपचार कई बच्चों के लिए बेहतर परिणाम का रास्ता खोल सकता है।
डिस्क्लेमर: यह लेख सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के उद्देश्य से तैयार किया गया है। इसमें दी गई जानकारी किसी डॉक्टर की व्यक्तिगत चिकित्सा सलाह, निदान या उपचार का विकल्प नहीं है। बच्चे में कोई असामान्य या लगातार बना हुआ लक्षण दिखाई देने पर योग्य बाल रोग विशेषज्ञ या संबंधित चिकित्सा विशेषज्ञ से सलाह लें।


