Sridhar Vembu Post: जोहो के फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने वर्क कल्चर को लेकर एक अहम सवाल उठाया है। उनका कहना है कि किसी कंपनी में सिर्फ नियम, मीट्रिक्स और ऊपर से आने वाले निर्देशों पर निर्भर रहना कर्मचारियों की पहल करने की क्षमता को कमजोर कर सकता है। वहीं, कर्मचारियों को पूरी आजादी देने वाली संस्कृति में असहमति और अनिश्चितता बढ़ सकती है।
नई दिल्ली: किसी भी कंपनी की सफलता सिर्फ उसके कारोबार, तकनीक या वित्तीय प्रदर्शन पर निर्भर नहीं करती। कंपनी के अंदर किस तरह का वर्क कल्चर है और कर्मचारी किस तरीके से फैसले लेते हैं, इसका भी संगठन की दिशा पर बड़ा असर पड़ता है। जोहो के फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने इसी मुद्दे पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी राय साझा की है।
वेम्बू ने अपनी पोस्ट में कंपनियों में काम करने के दो अलग-अलग तरीकों की तुलना की। एक तरफ ऐसी व्यवस्था है जहां कर्मचारी वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों और तय लक्ष्यों के आधार पर काम करते हैं। दूसरी तरफ ऐसी संस्कृति है जहां कर्मचारी खुद पहल करते हैं, निर्णय लेते हैं और जरूरत पड़ने पर अपने साथियों के फैसलों पर सवाल भी उठाते हैं।
उनके मुताबिक दोनों तरह की व्यवस्थाओं के अपने फायदे और कमियां हैं। लेकिन संगठन को एक साथ पूरी तरह अनुशासित और पूरी तरह पहल करने वाला बनाने की कोशिश कई बार उल्टा असर डाल सकती है।
क्या कर्मचारी सिर्फ निर्देश का इंतजार करते हैं?
On org culture: Do people wait for instructions from the top? Or do they seize the initiative and run?
Highly metric driven orgs tend to produce the "wait for instructions from the top" culture and there is more predictability and certainty in that culture. Unless the top always…
— Sridhar Vembu (@svembu) August 24, 2026 श्रीधर वेम्बू ने अपने विचार में सबसे पहले यह सवाल उठाया कि किसी संगठन में कर्मचारी किस तरह काम करते हैं। क्या वे हर महत्वपूर्ण काम के लिए ऊपर से निर्देश आने का इंतजार करते हैं या फिर समस्या देखकर खुद उसका समाधान तलाशने की कोशिश करते हैं?
पहले मॉडल में काम करने का तरीका अपेक्षाकृत स्पष्ट होता है। वरिष्ठ अधिकारी लक्ष्य तय करते हैं और कर्मचारी उन लक्ष्यों को पूरा करने पर ध्यान देते हैं। ऐसे संगठन में यह अनुमान लगाना आसान हो सकता है कि आने वाले समय में किस तरह के काम किए जाएंगे और किस दिशा में टीम आगे बढ़ेगी।
इस व्यवस्था में अनुशासन, प्रक्रिया और मापने योग्य प्रदर्शन को काफी महत्व दिया जाता है। मीट्रिक्स के आधार पर यह देखा जा सकता है कि टीम ने कितना काम किया, लक्ष्य कितना पूरा हुआ और प्रदर्शन में कितना सुधार आया।
लेकिन वेम्बू के मुताबिक, समस्या तब पैदा हो सकती है जब कर्मचारी हर निर्णय के लिए ऊपर से निर्देश मिलने का इंतजार करने लगें।
मीट्रिक्स पर ज्यादा निर्भरता का क्या असर?
आज के दौर में कंपनियां अपने प्रदर्शन को मापने के लिए अलग-अलग तरह के आंकड़ों और मीट्रिक्स का इस्तेमाल करती हैं। बिक्री, उत्पादकता, ग्राहक संख्या, समयसीमा और दूसरे लक्ष्य किसी संगठन के कामकाज को समझने में मदद करते हैं।
हालांकि, श्रीधर वेम्बू का तर्क है कि अगर किसी कंपनी में मीट्रिक्स और ऊपर से आने वाले निर्देशों पर जरूरत से ज्यादा जोर हो जाए, तो कर्मचारियों की स्वतंत्र सोच प्रभावित हो सकती है।
ऐसी स्थिति में कर्मचारी यह सोच सकते हैं कि उनका काम सिर्फ दिए गए लक्ष्य को पूरा करना है। अगर किसी समस्या का सामना होता है तो वे खुद फैसला लेने के बजाय वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश का इंतजार कर सकते हैं।
इसका एक फायदा यह हो सकता है कि कंपनी के काम करने के तरीके में एकरूपता बनी रहे। लेकिन दूसरी तरफ, अगर शीर्ष नेतृत्व का फैसला सही नहीं है तो संगठन के बाकी हिस्से भी उसी दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
यानी एक ऐसी व्यवस्था जिसमें हर कोई अनुशासन के साथ ऊपर से मिले निर्देशों का पालन कर रहा हो, वह बाहर से बेहद व्यवस्थित दिखाई दे सकती है। लेकिन अगर मूल दिशा ही गलत हो जाए तो पूरा संगठन उसी गलती को बड़े स्तर पर दोहरा सकता है।
पहल करने वाली संस्कृति में असहमति भी होती है
वेम्बू ने इसके विपरीत ऐसी कार्य संस्कृति का भी जिक्र किया जिसमें कर्मचारियों को खुद निर्णय लेने और पहल करने की अधिक स्वतंत्रता होती है।
ऐसे संगठन में कर्मचारी किसी समस्या के समाधान के लिए हमेशा वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश का इंतजार नहीं करते। वे अपने स्तर पर फैसला ले सकते हैं, नए तरीके आजमा सकते हैं और अपने साथियों के विचारों से असहमत भी हो सकते हैं।
बाहर से देखने पर ऐसी कंपनी कई बार कम व्यवस्थित या कुछ हद तक अव्यवस्थित नजर आ सकती है। अलग-अलग कर्मचारी अलग-अलग राय रखते हैं और किसी फैसले पर बहस भी हो सकती है।
लेकिन वेम्बू के मुताबिक, इसी तरह की असहमति और बहस कई बार संगठन को बेहतर फैसले तक पहुंचने में मदद कर सकती है।
ऐसी संस्कृति में कर्मचारियों के बीच यह भावना बनी रहती है कि मौजूदा तरीका अंतिम या पूरी तरह सही नहीं है। बाजार, ग्राहक और बाहरी परिस्थितियां भी कंपनी को अपने फैसलों पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर सकती हैं।
‘हर स्मार्ट प्रोग्रामर को दूसरे का कोड खराब लगता है’
श्रीधर वेम्बू ने अपने विचार को समझाने के लिए प्रोग्रामर्स का उदाहरण भी दिया। उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज में कहा कि एक स्मार्ट प्रोग्रामर जब दूसरे प्रोग्रामर का कोड देखता है तो अक्सर उसे लगता है कि वह इससे बेहतर कोड लिख सकता है।
यह उदाहरण दरअसल कर्मचारियों के बीच मौजूद असहमति और आत्मविश्वास को दर्शाता है।
अगर किसी कर्मचारी को अपने विचार रखने, मौजूदा तरीके पर सवाल उठाने और बेहतर विकल्प सुझाने की आजादी है तो संगठन में बहस होना स्वाभाविक है। हर व्यक्ति एक ही राय रखे, यह जरूरी नहीं है।
ऐसे माहौल में प्रबंधन के लिए सभी कर्मचारियों को एक ही दिशा में बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। लेकिन दूसरी तरफ, लगातार सवाल उठाने और नए विकल्प तलाशने की आदत संगठन में नई सोच को भी बढ़ावा दे सकती है।
अनुशासन बनाम पहल का असली सवाल क्या है?
वेम्बू की पोस्ट का सबसे अहम हिस्सा यही विरोधाभास है। एक कंपनी चाहती है कि उसके कर्मचारी अनुशासन के साथ काम करें, तय लक्ष्य हासिल करें और प्रक्रियाओं का पालन करें। वहीं कंपनी यह भी चाहती है कि कर्मचारी समस्याओं को पहचानें, खुद फैसले लें और नई चीजें आजमाएं।
दोनों उम्मीदें सुनने में अच्छी लगती हैं, लेकिन इनके बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है।
अगर कर्मचारियों पर बहुत ज्यादा नियंत्रण रखा जाए तो वे जोखिम लेने या नई पहल करने से बच सकते हैं। उन्हें लग सकता है कि गलती करने पर सवाल उठेगा, इसलिए बेहतर है कि वे केवल वही करें जो उन्हें बताया गया है।
दूसरी तरफ, अगर कर्मचारियों को पूरी स्वतंत्रता दे दी जाए और कोई स्पष्ट दिशा या जवाबदेही न हो, तो संगठन में असहमति और अनिश्चितता बढ़ सकती है। अलग-अलग टीमें अलग दिशा में काम कर सकती हैं और सामूहिक लक्ष्य प्रभावित हो सकते हैं।
यही वह जगह है जहां श्रीधर वेम्बू का विचार महत्वपूर्ण हो जाता है।
दोनों संस्कृतियों को पूरी तरह मिलाना भी आसान नहीं
वेम्बू ने अपनी पोस्ट में कहा कि उनके अनुभव में दोनों तरह की संस्कृतियों को एक साथ पूरी तरह मिलाने की कोशिश सबसे खराब परिणाम दे सकती है।
अगर कोई कंपनी एक ही समय में खुद को ‘बहुत अनुशासित’ और ‘पूरी तरह पहल करने वाली’ बनाना चाहती है, तो दोनों व्यवस्थाओं की कमियां सामने आ सकती हैं।
मसलन, कंपनी कर्मचारियों से कह सकती है कि वे खुद निर्णय लें और नए विचार सामने रखें। लेकिन साथ ही हर कदम पर कड़े नियम, लक्ष्य और ऊपर से आने वाले निर्देश लागू कर दिए जाएं। ऐसी स्थिति में कर्मचारी यह समझ नहीं पाते कि वास्तव में उनसे अपेक्षा क्या है।
क्या उन्हें निर्देशों का पालन करना है या फिर अपनी समझ के आधार पर फैसला लेना है?
यही विरोधाभास किसी संगठन में भ्रम पैदा कर सकता है।
मजबूत वर्क कल्चर के लिए स्पष्टता जरूरी
श्रीधर वेम्बू की बात को केवल ‘अनुशासन अच्छा है या पहल’ के सवाल तक सीमित नहीं किया जा सकता। उनका विचार इस बात की ओर इशारा करता है कि कंपनी को अपने कर्मचारियों से यह स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें किस स्तर तक खुद निर्णय लेने की आजादी है।
अनुशासन का मतलब केवल ऊपर से आए हर आदेश का पालन करना नहीं होना चाहिए। इसी तरह, स्वतंत्रता का मतलब यह भी नहीं कि संगठन में कोई साझा दिशा या जिम्मेदारी न हो।
एक कर्मचारी को अगर यह पता हो कि किन मामलों में उसे खुद फैसला लेना है और किन मामलों में वरिष्ठ अधिकारी से सलाह लेनी है, तो काम करने की प्रक्रिया ज्यादा स्पष्ट हो सकती है।
वहीं, कर्मचारियों को अपनी राय रखने और किसी मौजूदा प्रक्रिया में सुधार का सुझाव देने की जगह मिलना भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
कंपनी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है सही संतुलन
श्रीधर वेम्बू की पोस्ट का मूल संदेश यही है कि वर्क कल्चर का कोई एक मॉडल हर संगठन के लिए सही नहीं हो सकता।
एक तरफ बहुत अधिक नियंत्रण कर्मचारियों की पहल को सीमित कर सकता है। दूसरी तरफ बहुत अधिक स्वतंत्रता संगठन के अंदर असहमति और अनिश्चितता बढ़ा सकती है।
कंपनी के लिए चुनौती यह तय करने की है कि उसे किस तरह का माहौल चाहिए और उसके कर्मचारियों को कितनी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए।
खासकर तेजी से बदलते बाजार में केवल ऊपर से आने वाले निर्देशों पर निर्भर रहना जोखिम पैदा कर सकता है। वहीं, बिना किसी स्पष्ट दिशा के हर कर्मचारी का अपनी तरह से काम करना भी संगठन के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।
श्रीधर वेम्बू का यह विचार इसी बारीक अंतर को सामने रखता है। उनके मुताबिक, कंपनी को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि कर्मचारी नियमों का कितना पालन कर रहे हैं या मीट्रिक्स कितने अच्छे हैं। यह भी देखना जरूरी है कि क्या कर्मचारी सोच रहे हैं, सवाल पूछ रहे हैं, पहल कर रहे हैं और बेहतर रास्ते तलाश रहे हैं।
यानी किसी संगठन की मजबूती केवल इस बात से तय नहीं होती कि वहां कितने नियम हैं। यह भी मायने रखता है कि उन नियमों के बीच कर्मचारियों को सोचने और सही समय पर निर्णय लेने की कितनी जगह मिलती है।


