US Sanctions on Iran Impact on India: अमेरिका के ईरान पर लगाए गए नए और कड़े आर्थिक प्रतिबंधों ने ग्लोबल एनर्जी मार्केट की चिंता बढ़ा दी है। भारत भले ही सीधे ईरान से कच्चा तेल नहीं खरीदता, लेकिन चीन की रणनीति और ग्लोबल सप्लाई पर दबाव बढ़ने से भारत का क्रूड इंपोर्ट बिल, पेट्रोल-डीजल की कीमतें और महंगाई प्रभावित हो सकती है।
US Sanctions on Iran: अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाते हुए नए और कड़े प्रतिबंधों का ऐलान किया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने इसे ईरान की अर्थव्यवस्था पर बड़ा दबाव बनाने वाला कदम बताया है। इन प्रतिबंधों का असर केवल ईरान तक सीमित रहने की आशंका नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल बाजार पर भी पड़ सकता है।
भारत के लिए स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारत के आयात बिल और अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।
सीधे ईरान से नहीं, चीन के रास्ते बढ़ सकती है भारत की परेशानी
भारत ईरान से सीधे बड़े पैमाने पर कच्चा तेल आयात नहीं करता, इसलिए अमेरिकी प्रतिबंधों का सीधा असर भारतीय तेल आपूर्ति पर सीमित रहने की उम्मीद है। हालांकि, असली चुनौती चीन की तरफ से आ सकती है।
एनर्जी इंटेलिजेंस फर्म Kpler के मुताबिक, चीन ईरान से हर महीने औसतन 5 से 8 लाख बैरल प्रतिदिन के स्तर पर तेल खरीदता है। यदि अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चीन को ईरान के अलावा दूसरे देशों से ज्यादा तेल खरीदना पड़ा, तो वह उन अंतरराष्ट्रीय बाजारों में ज्यादा सक्रिय हो सकता है जहां से भारत भी क्रूड खरीदता है।
इससे ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल की मांग बढ़ सकती है। मांग और सप्लाई के बीच अंतर बढ़ने पर ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी आ सकती है। इसका असर भारत के कुल तेल आयात बिल पर पड़ेगा।
क्या रूस से भारत को मिल सकता है सहारा?
रूस भारत के लिए कच्चे तेल का एक अहम सप्लायर बना हुआ है। फिलहाल भारत अपनी जरूरत का लगभग 50% कच्चा तेल रूस से खरीद रहा है।
हालांकि, विशेषज्ञों के मुताबिक रूस भी अपनी मौजूदा क्षमता के हिसाब से भारत को बड़ी मात्रा में तेल की आपूर्ति कर रहा है। यदि ग्लोबल मार्केट में सप्लाई और ज्यादा टाइट होती है, तो रूसी क्रूड पर मिलने वाली छूट कम हो सकती है।
छूट कम होने का मतलब है कि भारतीय रिफाइनरीज को रूसी तेल के लिए पहले की तुलना में ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। इससे पेट्रोलियम कंपनियों की लागत और मार्जिन पर भी दबाव बन सकता है।
महंगा हो सकता है तेल का मालभाड़ा और इंश्योरेंस
मिडिल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर सिर्फ क्रूड की कीमतों तक सीमित नहीं है। तेल की ढुलाई यानी शिपिंग, फ्रेट और इंश्योरेंस लागत भी बढ़ सकती है।
होर्मुज जलडमरूमध्य और आसपास के प्रमुख समुद्री मार्गों पर तनाव बढ़ने की स्थिति में जहाजों को लंबा रूट अपनाना पड़ सकता है। इससे यात्रा का समय, ईंधन खर्च और मालभाड़ा बढ़ जाता है।
वहीं, जोखिम वाले समुद्री क्षेत्रों में टैंकरों के लिए वॉर-रिस्क इंश्योरेंस प्रीमियम भी काफी बढ़ सकता है। ऐसे में भारत को दूर के बाजारों से क्रूड मंगाने पर तेल की वास्तविक लागत केवल कच्चे तेल की कीमत से तय नहीं होगी, बल्कि उसमें फ्रेट, इंश्योरेंस और वर्किंग कैपिटल का खर्च भी जुड़ जाएगा।
पेट्रोल-डीजल से लेकर LPG तक पड़ सकता है असर
अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड लगातार महंगा होता है, तो भारत के लिए कच्चे तेल का आयात बिल बढ़ जाएगा। इसका असर देश के चालू खाता घाटे यानी Current Account Deficit पर पड़ सकता है।
क्रूड महंगा होने की स्थिति में डॉलर की मांग बढ़ सकती है और भारतीय रुपये पर दबाव आ सकता है। रुपया कमजोर होने पर विदेश से खरीदे जाने वाले कच्चे तेल की लागत रुपये के लिहाज से और बढ़ जाती है।
इसका असर पेट्रोल और डीजल के अलावा LPG, एविएशन फ्यूल, ट्रांसपोर्टेशन, मैन्युफैक्चरिंग और रोजमर्रा की वस्तुओं की लागत पर भी पड़ सकता है।
यानी अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में तेजी का असर केवल पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने से सामान की ढुलाई की लागत बढ़ती है और इसका असर धीरे-धीरे दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है।
भारत-ईरान व्यापार पर कितना असर?
भारत और ईरान के बीच प्रत्यक्ष तेल व्यापार पहले ही काफी सीमित है। 2018 में अमेरिका द्वारा ईरान पर प्रतिबंध बढ़ाए जाने के बाद भारत ने मई 2019 से ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया था।
हालांकि, दोनों देशों के बीच अन्य व्यापारिक संबंध अभी भी मौजूद हैं। भारत ईरान को बासमती चावल का बड़ा निर्यात करता है। अप्रैल-जून 2026 के दौरान भारत से ईरान को करीब 103 मिलियन डॉलर का बासमती निर्यात हुआ।
अगर क्षेत्रीय तनाव के कारण यूएई के जरिए होने वाले भुगतान, शिपिंग या फ्रेट रूट प्रभावित होते हैं, तो भारतीय निर्यातकों को लॉजिस्टिक्स से जुड़ी कुछ परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
दवा क्षेत्र पर भी बहुत बड़ा सीधा असर पड़ने की संभावना नहीं है, क्योंकि ईरान ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी घरेलू फार्मा मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाई है।
क्या भारत में तुरंत बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम?
अमेरिकी प्रतिबंधों का मतलब यह नहीं है कि भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तुरंत बढ़ जाएंगी। घरेलू ईंधन की कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय क्रूड के अलावा तेल कंपनियों की कीमत नीति, टैक्स, रुपये की विनिमय दर और सरकार के फैसलों जैसे कई कारकों का असर होता है।
लेकिन यदि प्रतिबंधों के कारण लंबे समय तक ग्लोबल क्रूड सप्लाई पर दबाव रहता है और ब्रेंट की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो भारत के लिए पेट्रोलियम आयात महंगा हो सकता है। ऐसी स्थिति में आने वाले समय में घरेलू ईंधन कीमतों और महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका जरूर रहेगी।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध भारत की तेल आपूर्ति को सीधे तौर पर बंद नहीं करेंगे। भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम सेकंड-ऑर्डर इफेक्ट का है।
अगर चीन ईरान से मिलने वाले तेल की भरपाई के लिए ग्लोबल मार्केट से ज्यादा क्रूड खरीदता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की मांग बढ़ सकती है। इसके साथ शिपिंग, फ्रेट और इंश्योरेंस लागत में बढ़ोतरी होती है, तो भारत का कुल इंपोर्ट बिल और बढ़ सकता है।
ऐसे में आने वाले दिनों में क्रूड ऑयल की कीमत, रुपये की चाल और अंतरराष्ट्रीय सप्लाई स्थिति भारत में पेट्रोल-डीजल और महंगाई के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकेतक होंगे।


