UPSC Success Story: 26 साल के एक यूपीएससी अभ्यर्थी ने चार प्रयासों के बाद सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी छोड़ने का फैसला किया। 2023, 2024 और 2025 में वह मुख्य परीक्षा तक पहुंचे, लेकिन इस साल प्रारंभिक परीक्षा भी पास नहीं कर सके। इसके बाद उन्होंने अपनी किताबें, नोट्स और टेस्ट पेपर कबाड़ी को बेच दिए। इन किताबों के बदले मिले 464 रुपये उन्होंने मंदिर में दान कर दिए।
यूपीएससी की तैयारी सिर्फ एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी नहीं होती। कई अभ्यर्थी इसके लिए अपनी नौकरी, समय, रिश्ते और निजी जिंदगी तक दांव पर लगा देते हैं। ऐसी ही कहानी 26 साल के एक अभ्यर्थी की है, जिन्होंने चार प्रयासों के बाद अब सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी छोड़ने का फैसला किया है।
2023, 2024 और 2025 में वह लगातार यूपीएससी की मुख्य परीक्षा तक पहुंचे, लेकिन अंतिम सफलता हासिल नहीं कर सके। इस साल स्थिति और मुश्किल हो गई, जब वह प्रारंभिक परीक्षा भी पास नहीं कर पाए। इसके बाद उन्होंने वर्षों से संभालकर रखी अपनी किताबें, नोट्स और टेस्ट पेपर कबाड़ी को बेच दिए।
पहली नजर में यह पुरानी किताबों को बेचने का एक सामान्य फैसला लग सकता है, लेकिन इन किताबों के साथ उनके जीवन के कई महत्वपूर्ण साल और यादें जुड़ी थीं।
NCERT से शुरू हुआ था UPSC का सफर
उनकी यूपीएससी यात्रा की शुरुआत NCERT की किताबों से हुई थी। धीरे-धीरे तैयारी आगे बढ़ी तो लाक्ष्मीकांत जैसी चर्चित किताबें, टेस्ट पेपर, नोट्स और दूसरी अध्ययन सामग्री भी उनके संग्रह का हिस्सा बनती गई।
इन किताबों के हर पन्ने के साथ उनकी मेहनत की कोई न कोई कहानी जुड़ी थी। कभी सुबह जल्दी उठकर पढ़ाई करना, कभी देर रात तक उत्तर लिखना और फिर उन्हें दोबारा जांचकर सुधारना—यह सब उनकी तैयारी का हिस्सा रहा।
इसी वजह से उनके लिए किताबें महज कागज का ढेर नहीं थीं। वे उनके यूपीएससी सफर, उम्मीदों और कई वर्षों की मेहनत की निशानी थीं।
नौकरी का मौका छोड़ा, रिश्ता भी टूट गया
यूपीएससी की तैयारी के दौरान उन्होंने सिर्फ समय ही नहीं गंवाया, बल्कि कई बड़े निजी फैसले भी लिए।
अभ्यर्थी के मुताबिक, 2022 में उन्होंने अच्छी सैलरी वाली नौकरी का प्रस्ताव ठुकरा दिया था। उस समय उन्हें विश्वास था कि सिविल सेवा में उनका भविष्य बन सकता है। इसके अलावा करीब चार साल पुराना रिश्ता भी इस दौरान खत्म हो गया।
इस तरह यूपीएससी की तैयारी ने उनकी जिंदगी के कई हिस्सों को प्रभावित किया। हालांकि, वह यह भी कहते हैं कि नौकरी छोड़ने के फैसले का उन्हें पूरी तरह पछतावा नहीं है।
वर्षों की मेहनत का दाम निकला सिर्फ 464 रुपये
जब उन्होंने अपनी किताबों और पढ़ाई की सामग्री को कबाड़ी को बेचने का फैसला किया, तो पूरी सामग्री का वजन किया गया। इसके बदले उन्हें 464 रुपये मिले।
किसी व्यक्ति ने यह भी कहा कि शायद इन किताबों के 600 रुपये तक मिल सकते थे। लेकिन उस समय उनके लिए 100 या 200 रुपये का अंतर मायने नहीं रखता था।
उनके लिए असली बात यह थी कि जिन किताबों से उन्होंने अपने सपने को पूरा करने की उम्मीद की थी, अब उनका यूपीएससी सफर वहीं खत्म हो चुका था।
कबाड़ी के तराजू पर किताबों का वजन जरूर हुआ, लेकिन उन किताबों के पीछे लगे वर्षों के समय, मेहनत और भावनाओं की कोई कीमत तय नहीं हो सकती थी।
464 रुपये लेकर मंदिर पहुंच गए
किताबें बेचने से मिले 464 रुपये उन्होंने अपने पास रखने के बजाय मंदिर में दान कर दिए।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह दान किसी अगले प्रयास में सफलता पाने की उम्मीद से नहीं किया गया था। उनके मुताबिक, अब उनके लिए ‘अगली बार’ जैसा कुछ नहीं है।
यही बात इस पूरी घटना को और भावुक बना देती है। यह सिर्फ किताबें बेचने की कहानी नहीं थी, बल्कि एक ऐसे सपने को पीछे छोड़ने का फैसला था, जिसके लिए उन्होंने अपनी जिंदगी के कई साल समर्पित किए थे।
UPSC की तैयारी में सिर्फ परीक्षा नहीं, जिंदगी भी जुड़ जाती है
यूपीएससी देश की सबसे कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक मानी जाती है। हर साल बड़ी संख्या में युवा सिविल सेवा में जाने का सपना लेकर परीक्षा देते हैं। कई अभ्यर्थी प्रारंभिक परीक्षा के बाद बाहर हो जाते हैं, जबकि कुछ मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू तक पहुंचने के बावजूद अंतिम सूची में जगह नहीं बना पाते।
इस अभ्यर्थी की कहानी इसी संघर्ष का एक अलग पहलू दिखाती है। उन्होंने चार प्रयासों में लगातार मेहनत की और तीन बार मुख्य परीक्षा तक पहुंचे। इसके बावजूद मनचाहा परिणाम नहीं मिलने के बाद उन्होंने इस अध्याय को बंद करने का फैसला किया।
सोशल मीडिया पर लोगों ने साझा किए अपने अनुभव
कहानी सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कई यूपीएससी अभ्यर्थियों और पूर्व उम्मीदवारों ने अपनी प्रतिक्रियाएं साझा कीं। लोगों ने कहा कि इस परीक्षा की तैयारी में बिताए वर्षों का मानसिक और भावनात्मक दबाव वही व्यक्ति समझ सकता है, जिसने खुद यह सफर जिया हो।
कई लोगों ने उन्हें आगे की जिंदगी के लिए शुभकामनाएं दीं और यह बात भी कही कि किसी एक परीक्षा में मिली असफलता को पूरी जिंदगी की असफलता नहीं माना जाना चाहिए।
दरअसल, किसी प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम किसी व्यक्ति की पूरी क्षमता या भविष्य तय नहीं करता। चार प्रयासों के बाद यूपीएससी का सफर खत्म करने वाले इस अभ्यर्थी की कहानी भी यही याद दिलाती है कि कभी-कभी किसी सपने को छोड़ना हार मानना नहीं, बल्कि जिंदगी के अगले अध्याय की शुरुआत करना भी हो सकता है।


