Ethanol Production: भारत में पेट्रोल में इथेनॉल की ब्लेंडिंग बढ़ाने की सरकारी नीति का मकसद कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना, विदेशी मुद्रा बचाना और किसानों को फसल का बेहतर मूल्य दिलाना है। लेकिन अब इसी नीति के दूसरे पहलुओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। गन्ने और चावल जैसे कृषि उत्पादों का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में बढ़ने के बीच चीनी की कीमतों में तेज उछाल आया है, जबकि भारतीय चावल की निर्यात कीमतें भी करीब एक साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं।
सरकार इथेनॉल पर क्यों दे रही है इतना जोर?
मोदी सरकार या फिर अनपढ़ सरकार..
ये लोग Foreign Exchange बचाने के लिए गन्ने से Ethanol बना रहे थे। अब देश में चीनी की कमी हो गई है और सिर्फ 17 दिनों में दाम ₹20 बढ़ गए हैं।
अब हालात ऐसे हो गए हैं कि वही Foreign Exchange फूंक कर चीनी Import करने की नौबत आ गई है। ये सरकार है या… pic.twitter.com/XjvFTAK7bk
— Arvind Kejriwal (@ArvindKejriwal) August 20, 2026 भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से पेट्रोल में इस्तेमाल होने वाले पेट्रोलियम की मात्रा को कम करने में मदद मिलती है। सरकार का जोर पेट्रोल में इथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाने पर है।
इथेनॉल के इस्तेमाल के पीछे तीन प्रमुख उद्देश्य बताए जाते हैं। पहला, कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करना। दूसरा, विदेशी मुद्रा की बचत करना और तीसरा, कार्बन उत्सर्जन को कम करना। इसके अलावा इथेनॉल के लिए कृषि उत्पाद खरीदने से किसानों को भी अतिरिक्त बाजार मिलता है।
इथेनॉल बनाने के लिए गन्ने के रस और शीरे के अलावा मक्का तथा टूटे हुए चावल जैसे फीडस्टॉक का भी इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि जैसे-जैसे इथेनॉल उत्पादन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे खाद्य फसलों के इस्तेमाल को लेकर भी बहस तेज हो रही है।
गन्ने से इथेनॉल और महंगी चीनी का कनेक्शन क्या है?
इथेनॉल उत्पादन में गन्ने के इस्तेमाल को लेकर सबसे बड़ा सवाल चीनी की उपलब्धता का है। गन्ने से चीनी बनाने के बजाय उसका एक हिस्सा इथेनॉल उत्पादन की ओर जाने पर चीनी बनाने के लिए उपलब्ध कच्चे माल में कमी आ सकती है।
मौजूदा समय में चीनी की कीमतों में तेजी ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है। रिपोर्टों के मुताबिक, पिछले करीब 15 दिनों में खुदरा बाजार में चीनी की कीमत लगभग 48 रुपये प्रति किलो से बढ़कर 62-65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। यानी कीमत में करीब 14-17 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी देखी गई है।
चीनी महंगी होने का असर सिर्फ घर के किचन तक सीमित नहीं रहता। चाय, मिठाई, दूध से जुड़े उत्पाद, चॉकलेट, बिस्किट, जूस और अन्य खाद्य पदार्थों की लागत पर भी इसका असर पड़ सकता है।
चीनी मिलों को जल्द पेराई शुरू करने की सलाह
बढ़ती कीमतों के बीच सरकार ने चीनी मिलों से पेराई सीजन सामान्य समय से पहले शुरू करने को कहा है। उद्देश्य बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों पर दबाव कम करना है।
हालांकि, नई फसल की उपलब्धता, गन्ने की स्थिति और मिलों की परिचालन क्षमता जैसे कई कारक यह तय करेंगे कि चीनी की सप्लाई कितनी तेजी से बढ़ती है।
सरकार ने बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए थोक व्यापारियों की स्टॉक लिमिट को भी सख्त किया है। जिन विक्रेताओं की मासिक बिक्री 10 टन से अधिक है, उन्हें निर्धारित नियमों के तहत सीमित अवधि का ही स्टॉक रखने की अनुमति होगी।
चावल पर भी बढ़ रहा दबाव
इथेनॉल नीति को लेकर चर्चा सिर्फ चीनी तक सीमित नहीं है। चावल के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इथेनॉल उत्पादन में टूटे हुए चावल का इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में जब खाद्य बाजार में चावल की मांग बढ़ती है या सप्लाई प्रभावित होती है, तो इसके दाम पर दबाव बढ़ सकता है।
हाल की रिपोर्टों के अनुसार भारतीय चावल की निर्यात कीमतें करीब एक साल के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई हैं। सीमित आपूर्ति, नई फसल को लेकर चिंता और अफ्रीकी देशों की मांग ने कीमतों को समर्थन दिया है।
वियतनाम के चावल की कीमतों में भी लगातार तेजी दर्ज की गई है। इससे पता चलता है कि चावल बाजार पर केवल घरेलू नीतियों का नहीं, बल्कि वैश्विक सप्लाई, मौसम और अंतरराष्ट्रीय मांग का भी असर पड़ रहा है।
क्या इथेनॉल ही महंगाई की वजह है?
यहां तस्वीर को थोड़ा व्यापक नजरिए से देखना जरूरी है। चीनी या चावल की कीमतों में तेजी को केवल इथेनॉल उत्पादन की वजह मानना सही नहीं होगा।
चीनी की कीमत पर गन्ने का उत्पादन, मौसम, मानसून, मिलों की पेराई, घरेलू खपत, निर्यात नीति और सरकारी स्टॉक जैसे कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। इसी तरह चावल की कीमतों पर घरेलू उत्पादन, निर्यात मांग, सरकारी नीतियां, मौसम और वैश्विक बाजार की स्थिति असर डालती है।
फिर भी, इथेनॉल के लिए खाद्य फसलों के इस्तेमाल का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यदि किसी कृषि उत्पाद की बड़ी मात्रा ऊर्जा उत्पादन में जाने लगे तो खाद्य और ईंधन के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा हो सकती है।
विदेशी मुद्रा बचाने की नीति बनाम खाद्य सुरक्षा
इथेनॉल नीति का मूल उद्देश्य भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। कच्चे तेल का आयात घटने से विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है। लेकिन इसके साथ खाद्य सुरक्षा का संतुलन बनाए रखना भी जरूरी है।
अगर गन्ने का बड़ा हिस्सा चीनी की बजाय इथेनॉल में चला जाता है और घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता घटती है, तो भविष्य में आयात की जरूरत पैदा हो सकती है। इसी तरह खाद्य उपयोग वाले चावल या मक्का की बड़ी मात्रा ईंधन उत्पादन में जाने पर कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
यही वह संतुलन है जिस पर इथेनॉल नीति को लेकर बहस हो रही है।
केजरीवाल ने भी सरकार पर साधा निशाना
चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी केंद्र सरकार की इथेनॉल नीति पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए सरकार पर निशाना साधते हुए तर्क दिया कि विदेशी मुद्रा बचाने के लिए गन्ने से इथेनॉल बनाया जा रहा है, लेकिन अगर इससे घरेलू बाजार में चीनी की कमी होती है और बाद में चीनी का आयात करना पड़ता है, तो नीति के आर्थिक लाभ पर सवाल उठेंगे।
हालांकि, यह राजनीतिक आरोप है और इथेनॉल नीति का वास्तविक प्रभाव समझने के लिए उत्पादन, खपत, कीमत और आयात-निर्यात के आंकड़ों को साथ में देखना जरूरी है।
आगे क्या चुनौती?
भारत के सामने असली चुनौती इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने और खाद्य कीमतों को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन बनाने की है। पेट्रोल में इथेनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाने से ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है, लेकिन इसके लिए ऐसे फीडस्टॉक पर अधिक जोर देना महत्वपूर्ण होगा जिनसे खाद्य आपूर्ति पर कम दबाव पड़े।
साथ ही, गन्ना, मक्का और चावल की उपलब्धता, खाद्य कीमतों और इथेनॉल उत्पादन की जरूरतों के बीच नियमित निगरानी जरूरी होगी।
निष्कर्ष: इथेनॉल नीति को केवल पेट्रोल की कीमत या कच्चे तेल के आयात के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। इसका सीधा संबंध कृषि, खाद्य सुरक्षा, किसान आय, चीनी और अनाज की कीमतों से भी है। ऐसे में सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना होगी कि ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की कोशिश में आम लोगों की खाद्य जरूरतों और कीमतों पर अनावश्यक दबाव न पड़े।


