भारत और चीन के बीच रिश्तों में सुधार की कोशिशों के बावजूद कारोबारी मोर्चे पर नई चुनौतियां सामने आती दिख रही हैं। भारतीय कंपनियों के अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों के लिए चीन का बिजनेस वीजा हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है। इसका असर सिर्फ यात्राओं तक सीमित नहीं है, बल्कि कई कंपनियों को अपनी अहम कारोबारी बैठकों का स्थान बदलना पड़ रहा है।
दूसरी तरफ रूस से कच्चे तेल की खरीद के मामले में भी भारत पर दबाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। चीन की ओर से रूसी तेल की खरीदारी बढ़ाए जाने से भारतीय रिफाइनरों के लिए रूस से अपेक्षाकृत सस्ता कच्चा तेल हासिल करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। ऐसे में भारत के सामने कारोबारी और ऊर्जा, दोनों मोर्चों पर एक साथ मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।
भारतीय अधिकारियों के लिए चीन का बिजनेस वीजा हुआ मुश्किल
चीन ने भारतीय कंपनियों के अधिकारियों, इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों, सेल्स टीम और मैनेजमेंट से जुड़े लोगों के लिए बिजनेस वीजा प्रक्रिया में सख्ती बढ़ाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ ऐसी कंपनियां भी इस परेशानी से प्रभावित हो रही हैं, जिनके चीन के साथ लंबे समय से कारोबारी संबंध रहे हैं।
वीजा मिलने में देरी का सीधा असर कंपनियों के कामकाज पर पड़ रहा है। कई भारतीय अधिकारियों को चीन जाने के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ रहा है। कुछ मामलों में दो महीने से अधिक समय तक वीजा नहीं मिलने की बात सामने आई है।
इसका असर खास तौर पर उन कंपनियों पर पड़ रहा है, जिनका कारोबार चीन में मौजूद सप्लायर, मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर, टेक्नोलॉजी पार्टनर या ट्रेड नेटवर्क पर निर्भर है।
चीन में होने वाली बिजनेस मीटिंग अब दूसरे देशों में
वीजा संबंधी दिक्कतों के कारण भारतीय कंपनियों ने चीन में होने वाली कई जरूरी बैठकों के लिए वैकल्पिक रास्ता अपनाना शुरू कर दिया है। अब सिंगापुर, थाईलैंड, मलेशिया और हांगकांग जैसे स्थानों पर कारोबारी बैठकें आयोजित की जा रही हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, एक प्रमुख चीनी स्मार्टफोन कंपनी को अपने ट्रेड पार्टनर्स के साथ होने वाली बैठक शेनझेन से थाईलैंड शिफ्ट करनी पड़ी। वजह यह बताई गई कि भारत से आने वाले कई प्रतिभागियों को समय पर चीनी वीजा नहीं मिल पाया।
इसी तरह चीनी स्मार्टफोन ब्रांड रियलमी भी अपनी आगामी फेस्टिव ट्रेड मीटिंग को चीन से थाईलैंड ले जाने पर विचार कर रही है। इससे संकेत मिलता है कि वीजा संबंधी बाधाएं अब कंपनियों के नियमित कारोबारी कार्यक्रमों को भी प्रभावित करने लगी हैं।
भारतीय कंपनियों के साथ चीनी कंपनियों को भी परेशानी
चीन की वीजा नीति में सख्ती का असर केवल भारतीय कंपनियों के अधिकारियों तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। भारत में काम करने वाली चीनी कंपनियों के भारतीय कर्मचारियों को भी चीन जाने के लिए बिजनेस वीजा हासिल करने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
एक बड़े भारतीय ऑटो पार्ट्स निर्माता ने चीनी कंपनियों के साथ टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप से संबंधित बैठकों को सिंगापुर में आयोजित करना शुरू कर दिया है। वहीं, एक बड़ी भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनी को भी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के लिए वीजा नहीं मिलने के बाद कुछ बैठकें सिंगापुर और हांगकांग में आयोजित करनी पड़ीं।
एक प्रमुख कॉन्ट्रैक्ट इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी के सीईओ ने दावा किया कि चीनी बिजनेस वीजा के रिजेक्शन की दर करीब 95 फीसदी तक पहुंच गई है। उनका कहना है कि दोबारा आवेदन करने के बाद भी मंजूरी आसानी से नहीं मिल रही है।
अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर भारत और चीन के बीच सप्लाई चेन, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े कारोबारी संबंधों पर पड़ सकता है।
गलवान संघर्ष के बाद पहले ही बिगड़े थे रिश्ते
भारत और चीन के कारोबारी रिश्तों में मौजूदा तनाव को 2020 के गलवान संघर्ष के बाद की परिस्थितियों के संदर्भ में देखा जा रहा है। गलवान में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के संबंधों में व्यापक तनाव आया था।
इसके बाद भारत ने कई चीनी मोबाइल ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया और चीन से आने वाले निवेश की जांच तथा मंजूरी प्रक्रिया को भी कड़ा किया। प्रेस नोट 3 के तहत चीन से आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी FDI के लिए कई मामलों में सरकारी मंजूरी की आवश्यकता बनी हुई है।
हालांकि, दोनों देशों के बीच व्यापार पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। चीन अभी भी भारत के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सोलर उपकरण, केमिकल्स और कई औद्योगिक सामानों का बड़ा सप्लायर है। यही वजह है कि कारोबारी संबंधों में आने वाली किसी भी बड़ी बाधा का असर भारतीय कंपनियों की लागत और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।
अब रूसी तेल पर भी चीन से बढ़ी चुनौती
भारत के लिए दूसरी बड़ी चिंता रूस से मिलने वाला कच्चा तेल है। यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी देशों की पाबंदियों के बाद भारत ने रूसी तेल की खरीद बढ़ाई थी। रूस से मिलने वाला डिस्काउंटेड क्रूड भारतीय रिफाइनरियों के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा है।
लेकिन अब रूस से चीन की बढ़ती तेल खरीद भारतीय रिफाइनरों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकती है। खासकर ऐसे समय में जब मध्य-पूर्व से कच्चे तेल की सप्लाई में व्यवधान और भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित कर रहे हैं।
भारत के लिए रूस से सस्ता क्रूड हासिल करना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे रिफाइनिंग लागत को नियंत्रित करने और घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव कम रखने में मदद मिल सकती है।
रूस से चीन की तेल खरीद पर क्या कहता है Kpler का अनुमान?
कमोडिटी एनालिस्ट फर्म Kpler के अनुमान के मुताबिक, अगस्त में चीन की समुद्री रास्ते से रूस से कच्चे तेल की खरीद करीब 12.5 लाख बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है। जुलाई में यह आंकड़ा करीब 14.23 लाख बैरल प्रतिदिन था।
जुलाई और अगस्त दोनों महीने अप्रैल के बाद रूस से चीन के समुद्री तेल आयात के मजबूत महीनों में शामिल रहे हैं। मध्य-पूर्व से तेल की सप्लाई में व्यवधान के बीच चीन की रिफाइनरियां रूस से अधिक कच्चा तेल खरीदकर अपनी जरूरत पूरी करने की कोशिश कर रही हैं।
चीन की बढ़ती मांग का असर वैश्विक स्तर पर रूसी क्रूड की उपलब्धता और कीमतों पर पड़ सकता है। अगर चीन और दूसरे बड़े खरीदार रूस से ज्यादा तेल खरीदते हैं, तो भारतीय रिफाइनरों के लिए आकर्षक कीमतों पर कच्चा तेल हासिल करने की प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
भारत का रूस से कच्चे तेल का आयात घटा
Kpler के अनुमान के मुताबिक, अगस्त में भारत का रूस से कुल कच्चे तेल का आयात करीब 18.7 लाख बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है। जुलाई में यह लगभग 27.9 लाख बैरल प्रतिदिन और जून में करीब 27.3 लाख बैरल प्रतिदिन था।
इस तरह अगस्त में भारत के रूसी क्रूड आयात में जुलाई की तुलना में उल्लेखनीय गिरावट दिखाई दे रही है।
रूस के यूरोपीय बंदरगाहों से भारत को मिलने वाले कच्चे तेल की मात्रा भी अगस्त में करीब 18.2 लाख बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है। यह जुलाई के मुकाबले लगभग 30 फीसदी या करीब 7.7 लाख बैरल प्रतिदिन कम है।
भारत के कुल क्रूड आयात पर भी असर
रूसी तेल की कम आवक का असर भारत के कुल कच्चे तेल आयात के आंकड़ों में भी नजर आ रहा है। अगस्त में भारत का कुल क्रूड आयात करीब 41.7 लाख बैरल प्रतिदिन रहने का अनुमान है।
यह ईरान संघर्ष शुरू होने के बाद सबसे निचले स्तरों में से एक है। जुलाई में भारत का कुल कच्चा तेल आयात करीब 50.6 लाख बैरल प्रतिदिन था।
इस गिरावट के पीछे कई अंतरराष्ट्रीय और कारोबारी कारण हो सकते हैं। मध्य-पूर्व में तनाव, समुद्री मार्गों पर जोखिम, रूस से तेल की उपलब्धता और वैश्विक रिफाइनिंग मांग जैसे कारक भारत के क्रूड सोर्सिंग पैटर्न को प्रभावित कर रहे हैं।
भारत के लिए दोहरी चुनौती क्यों महत्वपूर्ण है?
चीन की ओर से बिजनेस वीजा में सख्ती और रूस से बढ़ती तेल खरीद को अलग-अलग घटनाओं के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन दोनों का असर भारतीय कारोबार पर पड़ सकता है।
पहली चुनौती सप्लाई चेन और कारोबारी संचालन से जुड़ी है। यदि भारतीय कंपनियों के अधिकारी चीन नहीं जा पाते हैं, तो टेक्नोलॉजी पार्टनरशिप, सप्लायर मीटिंग, प्रोडक्ट डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी बातचीत प्रभावित हो सकती है। कंपनियों को बैठकों के लिए तीसरे देशों का रुख करना पड़ रहा है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ सकती हैं।
दूसरी चुनौती ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी है। रूस भारत के लिए कच्चे तेल का महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है। ऐसे में चीन की ओर से रूसी क्रूड की मजबूत खरीद भारतीय रिफाइनरों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ा सकती है।
भारत के सामने क्या विकल्प हैं?
बदलते हालात में भारत के लिए अपनी सप्लाई चेन को अधिक विविध बनाना अहम हो सकता है। कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करने के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया और अन्य विनिर्माण केंद्रों में विकल्प तलाश सकती हैं।
ऊर्जा के मोर्चे पर भी भारत को रूस के साथ-साथ मध्य-पूर्व, अमेरिका और अन्य तेल उत्पादक देशों से आयात के विकल्प खुले रखने होंगे। इससे किसी एक देश या क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता का जोखिम कम किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, चीन की वीजा सख्ती और रूसी तेल की खरीद में उसकी सक्रियता भारत के सामने अलग-अलग तरह की चुनौतियां पेश कर रही है। आने वाले समय में इन घटनाक्रमों का असर भारत-चीन व्यापार, भारतीय कंपनियों की सप्लाई चेन और देश की ऊर्जा रणनीति पर कितना पड़ता है, इस पर बाजार और उद्योग जगत की नजर रहेगी।


