नई दिल्ली: प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव यानी PLI स्कीम के जरिए एक दर्जन से अधिक सेक्टर में मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के बाद केंद्र सरकार अब चार अहम क्षेत्रों के लिए अलग रणनीति तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसका मकसद भारत में उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ निर्यात को मजबूत करना और वैश्विक बाजार में चीन जैसी बड़ी मैन्यूफैक्चरिंग ताकतों से मुकाबला करना है।
नीति आयोग ने केमिकल्स, टेक्सटाइल, पीवी सोलर और टेलीकॉम नेटवर्क उपकरण को उन चार प्रमुख सेक्टर के रूप में चिन्हित किया है, जहां भारत के पास उत्पादन और निर्यात बढ़ाने की बड़ी संभावनाएं हैं। आयोग ने इन क्षेत्रों को लेकर सरकार को कई अहम सुझाव दिए हैं।
चीन की रणनीति का अध्ययन कर तैयार हुई सिफारिश
नीति आयोग ने चीन और वियतनाम जैसे देशों की मैन्यूफैक्चरिंग नीतियों का अध्ययन करने के बाद भारत के लिए कई उपाय सुझाए हैं। इनमें उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल पर सीमा शुल्क में बदलाव, माल ढुलाई पर सब्सिडी, कम ब्याज दर पर लोन और स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहन जैसे कदम शामिल हैं।
इसके अलावा कुछ कंपनियों को सीमित अवधि के लिए टैक्स में राहत देने की भी सिफारिश की गई है। सरकार का फोकस ऐसे उत्पादों के निर्माण पर भी रहेगा, जिनके लिए भारत ने पहले ही व्यापार समझौते किए हैं या जिन देशों के साथ भविष्य में व्यापार समझौते होने की संभावना है।
सूत्रों के मुताबिक, नीति आयोग की सिफारिशों के आधार पर संबंधित मंत्रालयों के साथ मिलकर उद्योग संवर्धन एवं आंतरिक व्यापार विभाग (DPIIT) नीति का मसौदा तैयार कर रहा है।
किन 4 सेक्टर पर रहेगा सबसे ज्यादा फोकस?
नई रणनीति में चार सेक्टर प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- केमिकल्स: घरेलू उत्पादन बढ़ाकर आयात पर निर्भरता घटाने और निर्यात बढ़ाने पर जोर।
- टेक्सटाइल: वैश्विक टेक्सटाइल सप्लाई चेन में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश।
- पीवी सोलर: सोलर मैन्यूफैक्चरिंग में भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की योजना।
- टेलीकॉम नेटवर्क उपकरण: 5G और अगली पीढ़ी के नेटवर्क उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना।
इन सेक्टरों का चयन वैश्विक उत्पादन में इनके महत्व, भारत में उत्पादन बढ़ाने की क्षमता और इससे मिलने वाले आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर किया गया है।
विदेशी कंपनियों के लिए भी खुल सकता है रास्ता
नीति आयोग की सिफारिशों में विदेशी कंपनियों को भारत में निवेश के लिए विशेष प्रोत्साहन देने की बात भी सामने आई है। सरकार ऐसी व्यवस्था तैयार कर सकती है, जिससे अनुभवी विदेशी कंपनियां भारतीय कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर के जरिए भारत में उत्पादन शुरू कर सकें।
इस मॉडल में विदेशी कंपनियों की तकनीक और विशेषज्ञता का इस्तेमाल भारतीय कंपनियों की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए किया जा सकता है। नीति आयोग ने इसके लिए चीन के मॉडल का उदाहरण भी दिया है, जहां विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी के जरिए कई क्षेत्रों में घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता विकसित की गई।
चीन की सब्सिडी से मुकाबला करना बड़ी चुनौती
नीति आयोग के मुताबिक, वैश्विक निर्यात बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ रही है, लेकिन चीन की मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता अब भी काफी मजबूत है। चीन अपनी कंपनियों को श्रम, बिजली और मशीनरी जैसी लागत पर अलग-अलग तरह की सहायता देता है।
रिपोर्ट में टेलीकॉम नेटवर्क उपकरणों का उदाहरण दिया गया है। चीन में इस क्षेत्र की कंपनियों को श्रम लागत पर करीब 2 प्रतिशत और बिजली लागत पर करीब 1 प्रतिशत की सब्सिडी दी जाती है। मशीनरी खरीदने पर भी करीब 3 प्रतिशत की सहायता का उल्लेख किया गया है।
इसके मुकाबले भारत में इन लागतों पर इस तरह की सीधी सब्सिडी सीमित है। रिसर्च और विकास के मामले में भी दोनों देशों के बीच अंतर बताया गया है। टेलीकॉम और नेटवर्क उपकरणों के अनुसंधान के लिए भारत में करीब 0.15 प्रतिशत की सब्सिडी के मुकाबले चीन में यह करीब 2 प्रतिशत बताई गई है।
30 साल में चीन ने कैसे बढ़ाई अपनी मैन्यूफैक्चरिंग हिस्सेदारी?
नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग में चीन की हिस्सेदारी 1995 में करीब 5 प्रतिशत थी, जो 2023 तक बढ़कर लगभग 32 प्रतिशत हो गई।
इसी अवधि में वैश्विक मैन्यूफैक्चरिंग में भारत की हिस्सेदारी करीब 1.5 प्रतिशत से बढ़कर 3.2 प्रतिशत हुई। आंकड़े बताते हैं कि भारत ने प्रगति तो की है, लेकिन चीन की तुलना में मैन्यूफैक्चरिंग क्षमता और वैश्विक हिस्सेदारी बढ़ाने की गति अभी काफी पीछे है।
किन कंपनियों और सेक्टर को मिल सकता है फायदा?
अगर सरकार नीति आयोग की सिफारिशों को लागू करती है तो सबसे बड़ा फायदा इन चार सेक्टर में काम करने वाली घरेलू मैन्यूफैक्चरिंग कंपनियों को मिल सकता है। कच्चे माल की लागत घटने, सस्ता कर्ज मिलने, लॉजिस्टिक्स सपोर्ट और टैक्स राहत से कंपनियों की उत्पादन लागत कम हो सकती है।
विदेशी कंपनियों के भारत में निवेश और भारतीय कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर से नई तकनीक, पूंजी और वैश्विक सप्लाई चेन तक पहुंच भी बढ़ सकती है। इसका फायदा खासतौर पर उन कंपनियों को मिल सकता है जो घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात पर भी फोकस कर रही हैं।
PLI के बाद अगला बड़ा कदम?
सरकार ने PLI के जरिए मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्युटिकल्स, ऑटोमोबाइल समेत कई क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की है। अब चार रणनीतिक सेक्टर पर केंद्रित यह प्रस्ताव उसी नीति को अगले स्तर तक ले जाने की कोशिश माना जा सकता है।
अगर कच्चे माल की लागत, वित्तीय सहायता, टैक्स प्रोत्साहन और विदेशी निवेश से जुड़े सुझाव प्रभावी तरीके से लागू होते हैं, तो भारत की मैन्यूफैक्चरिंग प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। साथ ही, निर्यात बाजार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने और चीन पर कुछ क्षेत्रों में निर्भरता कम करने में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि, अंतिम नीति और उसके तहत मिलने वाले लाभ सरकार के औपचारिक फैसले के बाद ही स्पष्ट होंगे।


