Crude Oil Price: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और समुद्री रास्तों में बढ़ते जोखिम के बीच कच्चे तेल की कीमतों में जोरदार तेजी देखने को मिल रही है। पिछले दो हफ्तों में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 10 डॉलर प्रति बैरल बढ़ चुकी है और यह 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है। हालांकि, भारतीय रिफाइनर्स के लिए कच्चे तेल की वास्तविक लागत इससे भी ज्यादा हो सकती है।
दरअसल, ग्लोबल बेंचमार्क कीमत बढ़ने के साथ-साथ फिजिकल मार्केट में उपलब्ध कच्चे तेल की सप्लाई पर भी दबाव बढ़ गया है। खाड़ी और पश्चिमी अफ्रीका से आने वाले कच्चे तेल के लिए सप्लायर्स प्रीमियम मांग रहे हैं। दूसरी ओर, भारतीय रिफाइनर्स को पहले रूस से मिलने वाला सस्ता तेल अब उतनी बड़ी छूट पर उपलब्ध नहीं हो रहा है। वेनेजुएला के तेल पर भी डिस्काउंट काफी कम हो गया है।
भारतीय रिफाइनर्स के लिए तेल क्यों महंगा हो रहा है?
पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने का सबसे बड़ा असर समुद्री सप्लाई पर पड़ा है। होर्मुज स्ट्रेट और लाल सागर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ने से तेल की आवाजाही प्रभावित हुई है। इससे फिजिकल मार्केट में उपलब्ध बैरल पर दबाव बढ़ा है।
इंडस्ट्री से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, सप्लायर्स अब जोखिम के हिसाब से अतिरिक्त प्रीमियम मांग रहे हैं। एक रिफाइनरी एग्जीक्यूटिव ने बताया कि लगभग हर ट्रेडर प्रीमियम मांग रहा है।
खाड़ी के सप्लायर्स क्षेत्रीय दुबई-ओमान बेंचमार्क से करीब 3-4 डॉलर प्रति बैरल अतिरिक्त कीमत मांग रहे हैं। वहीं, दुबई-ओमान बेंचमार्क खुद ब्रेंट की तुलना में करीब 6-7 डॉलर प्रति बैरल प्रीमियम पर कारोबार कर रहा है। इस तरह भारतीय रिफाइनर्स के लिए खाड़ी से मिलने वाले कच्चे तेल की प्रभावी लागत ब्रेंट से करीब 10 डॉलर प्रति बैरल अधिक हो सकती है।
भारत पर कितना पड़ेगा असर?
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का करीब 90 फीसदी हिस्सा आयात करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल पर पड़ता है।
अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से भारत का सालाना आयात बिल करीब 2 अरब डॉलर यानी लगभग 18,000 करोड़ रुपये बढ़ सकता है।
इसका असर सिर्फ सरकारी आयात बिल तक सीमित नहीं रहता। लंबे समय तक कच्चा तेल महंगा रहने पर पेट्रोल-डीजल, परिवहन लागत, माल ढुलाई और कई दूसरी वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।
सऊदी अरामको की कीमतों से भी नहीं मिल रही बड़ी राहत
भारतीय रिफाइनर्स के लिए सऊदी अरब से मिलने वाला तेल भी फिलहाल आसान विकल्प नहीं है। सऊदी अरामको अलग-अलग ग्रेड के लिए आधिकारिक बिक्री कीमतें तय करता है, लेकिन समुद्री मार्गों में बढ़ते व्यवधान के कारण टर्म-कॉन्ट्रैक्ट के जरिए मिलने वाली सप्लाई पर दबाव है।
ऐसे में भारतीय कंपनियां स्पॉट मार्केट का सहारा ले रही हैं। लेकिन यहां उन्हें ट्रेडर्स से ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। समुद्री मार्ग में जोखिम बढ़ने के कारण कारोबारी अपने अतिरिक्त जोखिम की भरपाई प्रीमियम के जरिए करना चाहते हैं।
भारत अब कहां से खरीद रहा है कच्चा तेल?
खाड़ी से सप्लाई महंगी और सीमित होने के बीच भारतीय रिफाइनर्स अपने आयात स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश कर रहे हैं।
भारत अमेरिका, ब्राजील और गुयाना जैसे देशों से ज्यादा कच्चा तेल खरीदने की कोशिश कर रहा है। इसका उद्देश्य खाड़ी देशों से आने वाली सप्लाई में संभावित कमी को पूरा करना और महंगे पश्चिमी अफ्रीकी ग्रेड पर निर्भरता कम करना है।
हालांकि, दूसरे देशों से तेल खरीदना भी पूरी तरह आसान नहीं है। लंबी दूरी, शिपिंग लागत, बीमा खर्च और समुद्री मार्गों में बढ़ते जोखिम के कारण किसी भी वैकल्पिक स्रोत से मिलने वाला तेल भी महंगा पड़ सकता है।
रूसी तेल का फायदा भी खत्म होता दिख रहा
कुछ समय पहले भारतीय रिफाइनर्स के लिए रूसी कच्चा तेल एक बड़ा फायदा था। पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद रूस ने कई खरीदारों को अपने तेल पर आकर्षक डिस्काउंट दिए। भारत ने इसी वजह से रूसी तेल का आयात काफी बढ़ाया।
लेकिन अब रूसी तेल पर मिलने वाली छूट काफी कम हो गई है। इसके पीछे बढ़ते प्रतिबंधात्मक दबाव और रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर संभावित कार्रवाई की आशंका अहम है।
अगर रूसी तेल पर डिस्काउंट पूरी तरह खत्म होता है, तो भारतीय रिफाइनर्स के पास सस्ते रूसी बैरल का विकल्प पहले जैसा नहीं रहेगा। इससे उन्हें महंगे मध्य-पूर्वी या अन्य देशों के कच्चे तेल पर ज्यादा निर्भर होना पड़ सकता है।
वेनेजुएला से भी सस्ता तेल मिलना मुश्किल
वेनेजुएला का कच्चा तेल भी भारतीय रिफाइनर्स के लिए एक वैकल्पिक स्रोत रहा है। लेकिन इस तेल पर मिलने वाला डिस्काउंट भी कम हुआ है। ऐसे में रूस और वेनेजुएला दोनों से मिलने वाले सस्ते बैरल का फायदा सीमित होने से भारतीय कंपनियों की औसत क्रूड लागत बढ़ सकती है।
यानी एक तरफ ग्लोबल बेंचमार्क तेजी से ऊपर जा रहा है और दूसरी तरफ उन स्रोतों से मिलने वाला डिस्काउंट भी घट रहा है, जिनसे भारतीय रिफाइनर्स अपनी औसत खरीद लागत को नियंत्रित कर सकते थे।
जुलाई की शुरुआत से बिल्कुल बदल गई तस्वीर
कच्चे तेल के बाजार की मौजूदा स्थिति जुलाई की शुरुआत से काफी अलग है। उस समय अमेरिका और ईरान के बीच समझौते के बाद ब्रेंट स्पॉट की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गई थी। इससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों को राहत की उम्मीद जगी थी।
लेकिन इसके बाद पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने और सप्लाई को लेकर चिंताएं बढ़ने के साथ कीमतों में तेजी आई। पिछले सप्ताह ब्रेंट स्पॉट की कीमत 93 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर भी चली गई।
इस तरह कुछ ही समय में कच्चे तेल के बाजार में करीब 20 डॉलर प्रति बैरल की तेजी देखने को मिली है।
अमेरिका का दबाव बढ़ा तो और मुश्किल होगी
रूसी तेल की खरीद को लेकर अमेरिकी दबाव भी भारतीय रिफाइनर्स के लिए चिंता का विषय है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सीनेट में एक ऐसा विधेयक पारित किया गया है जिसमें रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का प्रावधान बताया गया है।
यदि इस तरह के कदम आगे बढ़ते हैं और रूसी तेल की खरीद प्रभावित होती है, तो वैश्विक बाजार में उपलब्ध सप्लाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ने की आशंका है।
भारत के लिए चुनौती इसलिए ज्यादा बड़ी है क्योंकि देश की ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक आयातित कच्चे तेल पर निर्भर हैं।
महंगा क्रूड तो पेट्रोल-डीजल पर क्या असर?
कच्चे तेल की कीमत में तेजी का असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर तुरंत और पूरी तरह दिखाई देना जरूरी नहीं है। तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय कीमतों के साथ-साथ रिफाइनिंग मार्जिन, रुपये की विनिमय दर, टैक्स और अन्य लागतों को भी ध्यान में रखती हैं।
लेकिन अगर क्रूड लंबे समय तक 90 डॉलर से ऊपर बना रहता है, भारतीय रुपया कमजोर होता है और आयात लागत बढ़ती है, तो घरेलू ईंधन कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
इसका व्यापक असर परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत पर भी पड़ सकता है। पेट्रोल-डीजल महंगा होने की स्थिति में माल ढुलाई महंगी हो सकती है, जिसका असर रोजमर्रा की कई वस्तुओं की कीमतों पर अप्रत्यक्ष रूप से पड़ता है।
आगे क्या होगा?
भारतीय रिफाइनर्स के सामने फिलहाल तीन बड़ी चुनौतियां हैं—महंगा ग्लोबल क्रूड, सप्लाई के लिए बढ़ता प्रीमियम और रूसी तथा वेनेजुएला के तेल पर घटती छूट।
अगर पश्चिम एशिया में तनाव जल्द कम नहीं हुआ और होर्मुज स्ट्रेट या लाल सागर से जुड़ी सप्लाई बाधाएं बनी रहीं, तो फिजिकल क्रूड मार्केट में प्रीमियम और बढ़ सकता है।
ऐसे माहौल में भारत को अमेरिका, ब्राजील और गुयाना जैसे वैकल्पिक स्रोतों से खरीद बढ़ाने, सप्लाई रूट में विविधता लाने और रणनीतिक तेल भंडार का बेहतर इस्तेमाल करने की जरूरत होगी।
फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यही है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में सिर्फ कच्चा तेल महंगा नहीं हुआ है, बल्कि भारतीय रिफाइनर्स के लिए उपलब्ध कई प्रमुख ग्रेड की वास्तविक लागत भी ग्लोबल बेंचमार्क से काफी ऊपर जा रही है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसका असर भारत के आयात बिल से लेकर ईंधन कीमतों और महंगाई तक दिखाई दे सकता है।


