नई दिल्ली: अमेरिकी डॉलर को दुनिया की सबसे ताकतवर और प्रभावशाली करेंसी माना जाता है। ग्लोबल ट्रेड, विदेशी मुद्रा भंडार और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन में डॉलर का दबदबा लंबे समय से कायम है। यूरो भी दुनिया की प्रमुख मुद्राओं में शामिल है। लेकिन अगर बात चलन में मौजूद बैंक नोटों की संख्या यानी नोटों के सर्कुलेशन की करें, तो भारत की करेंसी इन दोनों से काफी आगे है।
RBI के डिप्टी गवर्नर शिरीष चंद्र मुर्मू के मुताबिक, भारत में चलन में मौजूद नोटों की संख्या अमेरिकी डॉलर के नोटों की तुलना में करीब तीन गुना और यूरो के नोटों की तुलना में लगभग छह गुना है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय रुपया डॉलर या यूरो से ज्यादा मूल्यवान या मजबूत करेंसी है। यहां तुलना केवल बैंक नोटों की संख्या के आधार पर है।
भारत में 176 अरब से ज्यादा नोट चलन में
शिरीष चंद्र मुर्मू ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में भारत हर साल अलग-अलग मूल्यवर्ग के करीब 28 से 30 अरब नोट छाप रहा है, जबकि लगभग 21 अरब नोटों को हर साल चलन से बाहर किया जाता है।
उन्होंने बताया कि फिलहाल भारत में करीब 176 अरब यानी 1,760 करोड़ बैंक नोट चलन में हैं। इसके मुकाबले पिछले साल के अंत में करीब 56 अरब अमेरिकी डॉलर के नोट और लगभग 30 अरब यूरो के नोट सर्कुलेशन में थे।
हालांकि नोटों की संख्या की तुलना करते समय एक महत्वपूर्ण बात ध्यान में रखना जरूरी है। अलग-अलग देशों में करेंसी नोटों के मूल्यवर्ग और लोगों के इस्तेमाल का तरीका अलग होता है। भारत में कम मूल्य वाले नोटों की संख्या काफी अधिक है। इसलिए समान मूल्य के लेनदेन के लिए भारत में दूसरे देशों की तुलना में ज्यादा नोटों की जरूरत पड़ सकती है।
7 अगस्त 2026 तक भारत में कितने नोट चलन में?
RBI के आंकड़ों के मुताबिक 7 अगस्त 2026 तक अलग-अलग मूल्यवर्ग के बैंक नोटों की स्थिति इस प्रकार थी:
| मूल्यवर्ग | मात्रा (करोड़ नोट) | मूल्य (₹ करोड़) |
|---|---|---|
| ₹2 और ₹5 | 1,10,185 | 4,230 |
| ₹10 | 2,82,148 | 28,215 |
| ₹20 | 1,43,165 | 28,633 |
| ₹50 | 1,10,323 | 55,161 |
| ₹100 | 2,80,206 | 2,80,206 |
| ₹200 | 1,06,688 | 2,13,377 |
| ₹500 | 7,25,577 | 36,28,775 |
| ₹2,000 | 265 | 5,298 |
| कुल | 17,58,735 | 42,43,896 |
इस आंकड़े में सबसे बड़ी हिस्सेदारी ₹500 के नोटों की है। करीब 7.26 लाख करोड़? नहीं, तालिका के अनुसार 7,25,577 करोड़ नोट यानी लगभग 72.56 अरब ₹500 के नोट चलन में हैं। इनका कुल मूल्य करीब ₹36.29 लाख करोड़ बैठता है।
इसके बाद ₹10 और ₹100 के नोटों की संख्या भी काफी बड़ी है। इससे पता चलता है कि भारत में कैश इकोनॉमी में छोटे और मध्यम मूल्यवर्ग के नोटों की अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
डिजिटल पेमेंट बढ़ा, फिर भी कैश की मांग क्यों बढ़ रही?
भारत में UPI और दूसरे डिजिटल पेमेंट माध्यमों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। इसके बावजूद नकदी की मांग कम नहीं हुई है। RBI के डिप्टी गवर्नर ने इसे ‘कैश पैराडॉक्स’ बताया।
दरअसल, डिजिटल पेमेंट बढ़ने के कारण रोजमर्रा के कई छोटे लेनदेन में कैश का इस्तेमाल घटा है। लेकिन दूसरी तरफ अर्थव्यवस्था के आकार में वृद्धि, महंगाई, आय में बढ़ोतरी और लोगों की नकदी रखने की जरूरत के कारण कुल करेंसी इन सर्कुलेशन लगातार बढ़ रही है।
मुर्मू के अनुसार, भारत में करेंसी इन सर्कुलेशन की मात्रा हाल के वर्षों में दोहरे अंकों की दर से बढ़ी है। यही वजह है कि केंद्रीय बैंक के लिए भविष्य में कितनी नकदी की जरूरत होगी, इसका अनुमान लगाना आसान नहीं है।
RBI कैसे लोगों तक पहुंचाता है करेंसी?
भारत में नोटों की छपाई के बाद उन्हें पूरे देश में पहुंचाना एक बड़ा लॉजिस्टिक्स ऑपरेशन है। RBI अपने 19 क्षेत्रीय कार्यालयों, कमर्शियल और कोऑपरेटिव बैंकों तथा सरकारी ट्रेजरी से जुड़े करेंसी चेस्ट के नेटवर्क के जरिए करेंसी का वितरण करता है।
इसके बाद बैंक शाखाओं, ATM, कैश डिस्पेंसर और बिजनेस करेस्पोंडेंट के माध्यम से नकदी आम लोगों तक पहुंचती है।
देशभर में 2.5 लाख से ज्यादा ATM और ग्रामीण तथा छोटे शहरों में बड़ी संख्या में बिजनेस करेस्पोंडेंट इस कैश डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का हिस्सा हैं।
नोटों की उम्र बढ़ाने पर RBI का फोकस
बड़ी मात्रा में नोट छापने, उन्हें देशभर में पहुंचाने और खराब नोटों को वापस लेने में काफी लागत आती है। इसलिए RBI नोटों की लाइफ बढ़ाने और करेंसी मैनेजमेंट की लागत कम करने के विकल्पों पर भी काम कर रहा है।
इसी दिशा में पॉलीमर जैसे ज्यादा टिकाऊ मटेरियल के इस्तेमाल की संभावनाओं पर ध्यान दिया जा रहा है। ज्यादा टिकाऊ नोट लंबे समय तक इस्तेमाल किए जा सकेंगे, जिससे बार-बार नोट छापने और उन्हें बदलने की जरूरत कम हो सकती है।
क्या ज्यादा नोट होने का मतलब रुपया ज्यादा ताकतवर है?
यहां सबसे जरूरी बात समझना जरूरी है कि नोटों की संख्या और करेंसी की ताकत दो अलग-अलग चीजें हैं।
अमेरिकी डॉलर का वैश्विक प्रभाव उसके अंतरराष्ट्रीय व्यापार में इस्तेमाल, रिजर्व करेंसी के रूप में भूमिका, वित्तीय बाजारों में स्वीकार्यता और अमेरिकी अर्थव्यवस्था की ताकत से जुड़ा है। इसी तरह यूरो भी यूरोजोन की बड़ी अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
भारत में नोटों की संख्या अधिक होने का मुख्य कारण यह है कि देश में करेंसी के कई मूल्यवर्ग हैं और कम मूल्य के नोटों का सर्कुलेशन काफी बड़ा है। इसलिए सिर्फ बैंक नोटों की संख्या के आधार पर रुपये को डॉलर या यूरो से ज्यादा मजबूत मानना सही नहीं होगा।
निष्कर्ष
भारत में डिजिटल पेमेंट क्रांति के बावजूद कैश की भूमिका अभी खत्म नहीं हुई है। देश में करीब 176 अरब बैंक नोटों का सर्कुलेशन इस बात को दिखाता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी की मांग अभी भी काफी मजबूत है।
दिलचस्प बात यह है कि नोटों की संख्या के मामले में रुपया अमेरिकी डॉलर और यूरो से काफी आगे है। लेकिन वैश्विक ताकत और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता के मामले में डॉलर की स्थिति अलग है। इसलिए ‘सर्कुलेशन में सबसे आगे’ और ‘सबसे ताकतवर करेंसी’ को एक ही पैमाने पर नहीं देखा जाना चाहिए।


