Life Insurance Claim: जीवन बीमा का मकसद किसी व्यक्ति की असमय मृत्यु के बाद उसके परिवार को आर्थिक सुरक्षा देना होता है। लेकिन कई बार बीमा कंपनियां पॉलिसीधारक की ओर से दी गई जानकारी में कथित गड़बड़ी या जानकारी छिपाने का आरोप लगाकर डेथ क्लेम खारिज कर देती हैं। ऐसा ही एक मामला तेलंगाना राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के सामने आया, जहां 1 करोड़ रुपये के लाइफ इंश्योरेंस क्लेम को लेकर विवाद हुआ।
मामले में बीमा कंपनी ने आरोप लगाया था कि पॉलिसीधारक ने पहले के एक बीमा आवेदन और उससे जुड़ी जानकारी का खुलासा नहीं किया था। हालांकि, उपभोक्ता आयोग ने कहा कि महज आशंका या आरोप के आधार पर इतना बड़ा क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता। कंपनी को यह ठोस रूप से साबित करना होगा कि पॉलिसीधारक ने जानबूझकर महत्वपूर्ण जानकारी छिपाई थी।
क्या है 1 करोड़ रुपये के डेथ क्लेम का पूरा मामला?
मामला केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी रामदास विसलावथ से जुड़ा है। उन्होंने अक्टूबर 2019 में Tata AIA Life Insurance से 1 करोड़ रुपये का ‘संपूर्ण रक्षा’ प्लान लिया था। पॉलिसी में उनकी पत्नी को नॉमिनी बनाया गया था।
मई 2021 में कोविड-19 संक्रमण के कारण रामदास विसलावथ की मृत्यु हो गई। इसके बाद उनकी पत्नी ने बीमा कंपनी के सामने 1 करोड़ रुपये के डेथ क्लेम के लिए आवेदन किया।
क्लेम की जांच के दौरान Tata AIA को पता चला कि पॉलिसी लेने से पहले रामदास ने ICICI Prudential Life Insurance के पास भी 1 करोड़ रुपये की पॉलिसी के लिए आवेदन किया था। कंपनी के अनुसार, मेडिकल जांच के बाद उस पुराने प्रस्ताव को आगे के लिए स्थगित कर दिया गया था।
Tata AIA के प्रपोजल फॉर्म में यह सवाल भी शामिल था कि क्या इससे पहले किसी बीमा कंपनी ने बीमा प्रस्ताव को अस्वीकार या स्थगित किया है। रामदास ने इस सवाल का जवाब ‘नहीं’ दिया था।
बीमा कंपनी ने क्यों खारिज किया 1 करोड़ का क्लेम?
Tata AIA ने पुराने बीमा आवेदन की जानकारी को महत्वपूर्ण तथ्य माना। कंपनी का तर्क था कि यदि उसे पहले वाले बीमा प्रस्ताव के स्थगित होने की जानकारी होती तो वह पॉलिसी जारी करने से पहले जोखिम का अलग तरीके से आकलन कर सकती थी।
इसी आधार पर कंपनी ने डेथ क्लेम को खारिज कर दिया। इतना ही नहीं, पॉलिसी को शुरुआत से ही रद्द कर दिया गया और जमा किया गया प्रीमियम वापस कर दिया गया।
यानी परिवार को जिस 1 करोड़ रुपये की बीमा राशि से आर्थिक सुरक्षा मिलने की उम्मीद थी, वह रकम कंपनी के फैसले के कारण अटक गई।
परिवार ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया
बीमा कंपनी के फैसले के बाद मृतक के परिवार ने मामले को जिला उपभोक्ता आयोग के सामने उठाया। बाद में मामला तेलंगाना राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (TSCDRC) तक पहुंचा।
राज्य आयोग ने मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों की जांच की। आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी यह पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सकी कि पॉलिसीधारक को यह जानकारी थी कि ICICI Prudential ने उसके पुराने बीमा प्रस्ताव को स्थगित किया था या मेडिकल जांच में कोई ऐसी स्थिति सामने आई थी, जिसे उसे अनिवार्य रूप से बताना चाहिए था।
आयोग ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि Tata AIA ने पॉलिसी जारी करने से पहले खुद पॉलिसीधारक का मेडिकल परीक्षण कराया था और उसके बाद पॉलिसी जारी की गई थी।
सिर्फ शक के आधार पर क्लेम खारिज नहीं किया जा सकता
इस मामले में उपभोक्ता आयोग का सबसे अहम निष्कर्ष यही रहा कि बीमा कंपनी को जानबूझकर जानकारी छिपाने का ठोस सबूत देना होगा।
किसी पुराने बीमा आवेदन का स्थगित होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पॉलिसीधारक ने जानबूझकर धोखा देने या महत्वपूर्ण तथ्य छिपाने की कोशिश की थी। इसके लिए कंपनी को यह स्थापित करना होगा कि संबंधित व्यक्ति को उस तथ्य की जानकारी थी और उसने जानबूझकर उसे छिपाया।
आयोग ने यह भी ध्यान दिया कि रामदास की मृत्यु कोविड-19 के कारण हुई थी। आयोग के सामने ऐसा पर्याप्त प्रमाण नहीं था जिससे यह साबित हो कि जिस कथित पिछली मेडिकल स्थिति को लेकर विवाद किया जा रहा था, उसका कोविड-19 से हुई मृत्यु से कोई सीधा संबंध था।
Tata AIA को 1 करोड़ रुपये देने का आदेश
तेलंगाना राज्य उपभोक्ता आयोग ने जिला आयोग के आदेश को बरकरार रखते हुए Tata AIA Life Insurance को 1 करोड़ रुपये का डेथ क्लेम देने का निर्देश दिया।
इसके अलावा कंपनी को क्लेम राशि पर 9 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा। आयोग ने परिवार को हुई परेशानी के लिए 50,000 रुपये का मुआवजा और 10,000 रुपये कानूनी खर्च के रूप में देने का भी आदेश दिया।
इस तरह बीमा कंपनी पर सिर्फ 1 करोड़ रुपये का मूल क्लेम ही नहीं, बल्कि ब्याज और अतिरिक्त मुआवजे की जिम्मेदारी भी डाली गई।
बीमा पॉलिसी लेते समय इन बातों का रखें ध्यान
यह मामला उन लोगों के लिए भी महत्वपूर्ण है जो लाइफ इंश्योरेंस खरीद रहे हैं। बीमा प्रस्ताव भरते समय पुरानी पॉलिसी, मेडिकल हिस्ट्री, बीमारी, पहले के बीमा आवेदन और अन्य जरूरी सवालों का जवाब पूरी ईमानदारी और सावधानी से देना चाहिए।
किसी भी जानकारी को मामूली समझकर छिपाना आगे चलकर क्लेम विवाद की वजह बन सकता है। साथ ही, अगर बीमा कंपनी क्लेम खारिज करती है तो पॉलिसीधारक के परिवार को कंपनी से क्लेम रिजेक्शन का लिखित कारण मांगना चाहिए और जरूरत पड़ने पर संबंधित उपभोक्ता आयोग में शिकायत की जा सकती है।
Tata AIA फैसले को आगे चुनौती दे सकती है
हालांकि, यह मामला अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। Tata AIA ने संकेत दिया है कि वह तेलंगाना राज्य उपभोक्ता आयोग के फैसले को नई दिल्ली स्थित National Consumer Disputes Redressal Commission (NCDRC) में चुनौती देने पर विचार कर रही है।
कंपनी का पक्ष है कि पुराने बीमा प्रस्ताव के स्थगित होने और उससे जुड़े मेडिकल निष्कर्षों की जानकारी महत्वपूर्ण थी और पॉलिसीधारक को इसका खुलासा करना चाहिए था।
इसलिए फिलहाल राज्य आयोग का यह फैसला परिवार के पक्ष में है, लेकिन आगे की कानूनी प्रक्रिया में मामले पर अंतिम स्थिति बदल भी सकती है।
क्या सीख मिलती है?
इस मामले से सबसे बड़ी सीख यह है कि डेथ क्लेम खारिज करने के लिए सिर्फ जानकारी छिपाने का आरोप पर्याप्त नहीं है। बीमा कंपनी को यह साबित करना होगा कि पॉलिसीधारक ने जानबूझकर कोई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाया था और वह तथ्य बीमा जोखिम के आकलन के लिए वास्तव में महत्वपूर्ण था।
वहीं, बीमा खरीदने वालों के लिए भी जरूरी है कि प्रपोजल फॉर्म में पूछे गए हर सवाल का सही और पूरा जवाब दें तथा पुराने बीमा आवेदन और मेडिकल रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी को लेकर किसी तरह की अस्पष्टता न रखें।


