प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से ‘शक्ति की सप्तधारा’ का ऐलान किया। विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकार ने जिन सात क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है, उनमें मैन्युफैक्चरिंग पावर को सबसे पहले रखा गया है। इसके अलावा एग्रीकल्चर एंड फूड प्रोसेसिंग, टेक्नोलॉजी एंड इनोवेशन, गति शक्ति, रक्षा शक्ति, ग्रीन एंड ब्लू इकॉनमी और सॉफ्ट पावर शामिल हैं।
मैन्युफैक्चरिंग को पहली प्राथमिकता मिलने की वजह साफ है। भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है, लेकिन वैश्विक उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी अभी चीन के मुकाबले काफी कम है। ऐसे में 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए देश को सिर्फ सेवाओं और असेंबली पर निर्भर रहने के बजाय वास्तविक मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करनी होगी।
चीन से कितना पीछे है भारत?
नीति आयोग की ‘Key Sectors to Position India as a Global Manufacturing Hub’ रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के कुल GVA में मैन्युफैक्चरिंग की हिस्सेदारी करीब 17.5% है। यह हिस्सेदारी पिछले दो दशकों में लगभग 16 से 18% के दायरे में रही है।
वहीं, वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू में भारत की हिस्सेदारी 1995 में करीब 1.5% थी, जो 2023 में बढ़कर लगभग 3.2% हो गई। यानी भारत ने प्रगति जरूर की है, लेकिन चीन की रफ्तार और पैमाना कहीं ज्यादा बड़ा रहा।
इसी अवधि में वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू में चीन की हिस्सेदारी करीब 5% से बढ़कर लगभग 32% हो गई। यही वजह है कि भारत के लिए चीन के स्तर तक पहुंचना बड़ी चुनौती है।
हालांकि, लक्ष्य केवल चीन से आगे निकलना नहीं है। भारत के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वह ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाए और जरूरी उत्पादों व कंपोनेंट्स के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता घटाए।
12 सेक्टरों में भारत के पास बड़ी क्षमता
नीति आयोग ने CRISIL Intelligence के साथ मिलकर 62 मैन्युफैक्चरिंग सेक्टरों का अध्ययन किया है। इसमें 12 ऐसे सेक्टर पहचाने गए हैं, जिनमें भारत वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है।
इनमें ऑटोमोबाइल, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, टेक्सटाइल, डिफेंस, स्टील, टेलीकॉम उपकरण, सोलर PV और फूड प्रोसेसिंग जैसे क्षेत्र शामिल हैं।
रिपोर्ट में खास तौर पर केमिकल्स, टेक्सटाइल, टेलीकॉम एवं नेटवर्क उपकरण और सोलर PV जैसे क्षेत्रों की क्षमता पर जोर दिया गया है।
केमिकल सेक्टर में बड़ा मौका
भारत के लिए केमिकल मैन्युफैक्चरिंग एक बड़ा अवसर बन सकता है। अनुमान है कि FY2030 तक देश में केमिकल की खपत 290 से 310 अरब डॉलर तक पहुंच सकती है।
इस बढ़ती मांग का फायदा उठाने के लिए उत्पादन क्षमता में करीब 14% सालाना वृद्धि की जरूरत होगी। यदि भारत घरेलू मांग के साथ-साथ निर्यात बाजार को भी साध लेता है, तो यह सेक्टर मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ का बड़ा इंजन बन सकता है।
टेक्सटाइल में ताकत, लेकिन चुनौतियां भी
टेक्सटाइल सेक्टर में भारत पहले से ही मजबूत स्थिति में है। 2024 में भारत दुनिया का छठा सबसे बड़ा टेक्सटाइल और अपैरल एक्सपोर्टर रहा।
लेकिन ग्लोबल बाजार में चीन, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा के लिए भारत को उत्पादकता बढ़ाने की जरूरत है। इसके साथ ही मैन-मेड फाइबर का उत्पादन बढ़ाना और MSME इकाइयों को आधुनिक तकनीक से लैस करना भी जरूरी होगा।
टेलीकॉम उपकरण में चीन पर निर्भरता बड़ी चुनौती
टेलीकॉम उपकरण भारत की मैन्युफैक्चरिंग रणनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण सेक्टर है, लेकिन यहां चीन पर निर्भरता अभी भी काफी ज्यादा है।
2020-24 के दौरान भारत का टेलीकॉम उपकरण निर्यात करीब 0.6 से 1 अरब डॉलर सालाना रहा, जबकि आयात लगभग 4 से 5 अरब डॉलर का था। रिपोर्ट के मुताबिक, महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के लिए भारत की 80% से अधिक निर्भरता चीन पर है।
यही वह क्षेत्र है जहां घरेलू कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाना भारत की सप्लाई चेन सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
सोलर में क्षमता बढ़ी, लेकिन कंपोनेंट्स में निर्भरता
सोलर मैन्युफैक्चरिंग में भारत ने पिछले कुछ वर्षों में तेज प्रगति की है। अगस्त 2025 तक देश में सोलर मॉड्यूल मैन्युफैक्चरिंग क्षमता 100 GW तक पहुंच गई थी।
लेकिन केवल मॉड्यूल बनाने से भारत पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन जाता। सोलर सेल, वेफर और दूसरे महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के लिए आयात पर निर्भरता अभी भी चुनौती है।
इसलिए अगला कदम मॉड्यूल असेंबली से आगे बढ़कर पूरी सोलर वैल्यू चेन को भारत में विकसित करना होगा।
इलेक्ट्रॉनिक्स में भारत ने लगाई बड़ी छलांग
इलेक्ट्रॉनिक्स और खासकर स्मार्टफोन मैन्युफैक्चरिंग में भारत की स्थिति पिछले एक दशक में तेजी से बदली है।
2024-25 में देश में करीब 11.3 लाख करोड़ रुपये के स्मार्टफोन बने। इसके मुकाबले 2014-15 में यह आंकड़ा करीब 1.9 लाख करोड़ रुपये था।
यह वृद्धि भारत की बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को दिखाती है। लेकिन असली चुनौती अभी बाकी है। सेमीकंडक्टर, डिस्प्ले, PCB, मेमोरी और अन्य महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स में आयात निर्भरता को कम करना होगा।
यानी भारत को सिर्फ मोबाइल फोन असेंबल करने वाला देश नहीं, बल्कि मोबाइल की पूरी सप्लाई चेन तैयार करने वाला मैन्युफैक्चरिंग बेस बनना होगा।
फार्मा में मजबूत भारत, API में चीन पर निर्भरता
फार्मास्युटिकल सेक्टर में भारत दुनिया की प्रमुख ताकतों में शामिल है। भारतीय कंपनियां 200 से ज्यादा देशों को दवाओं का निर्यात करती हैं।
लेकिन इस सेक्टर में भी एक कमजोर कड़ी है—API यानी Active Pharmaceutical Ingredients और कुछ जरूरी इंटरमीडिएट्स के लिए चीन पर निर्भरता।
अगर भारत को फार्मा में अपनी स्थिति और मजबूत करनी है तो दवाओं के अंतिम उत्पाद के साथ-साथ API और जरूरी कच्चे माल का घरेलू उत्पादन भी बढ़ाना होगा।
असेंबली से आगे बढ़ना सबसे बड़ी जरूरत
भारत की मैन्युफैक्चरिंग कहानी में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या देश केवल अंतिम उत्पादों की असेंबली करेगा या उन उत्पादों के पीछे की पूरी वैल्यू चेन भी भारत में विकसित करेगा।
मोबाइल फोन, इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल, बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में मशीनरी, चिप, मोटर, बैटरी सेल, PCB, सेंसर और दूसरे कंपोनेंट्स का स्थानीय उत्पादन बढ़ाना होगा।
इसके लिए सिर्फ फैक्ट्रियां लगाना पर्याप्त नहीं है। भारत को कम लागत, बेहतर गुणवत्ता, आधुनिक तकनीक, कुशल श्रम और तेज लॉजिस्टिक्स का मजबूत इकोसिस्टम तैयार करना होगा।
भारत के सामने क्या हैं बड़ी चुनौतियां?
मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की राह में भारत के सामने कई चुनौतियां हैं।
- घरेलू सप्लाई चेन को मजबूत करना
- महत्वपूर्ण कंपोनेंट्स के आयात पर निर्भरता घटाना
- MSME को आधुनिक तकनीक और पूंजी उपलब्ध कराना
- लॉजिस्टिक्स लागत कम करना
- कुशल श्रमिकों की संख्या बढ़ाना
- रिसर्च एंड डेवलपमेंट पर निवेश बढ़ाना
- वैश्विक कंपनियों को भारत में पूरी वैल्यू चेन स्थापित करने के लिए आकर्षित करना
- गुणवत्ता और लागत के मामले में चीन तथा अन्य एशियाई देशों से प्रतिस्पर्धा करना
‘शक्ति की सप्तधारा’ में मैन्युफैक्चरिंग को पहली जगह क्यों?
प्रधानमंत्री मोदी के विकसित भारत@2047 के विजन में मैन्युफैक्चरिंग को पहली प्राथमिकता मिलने के पीछे रोजगार, निर्यात, निवेश और रणनीतिक आत्मनिर्भरता जैसे कई कारण हैं।
मैन्युफैक्चरिंग बढ़ने से केवल फैक्ट्रियों की संख्या नहीं बढ़ती, बल्कि उससे लॉजिस्टिक्स, इंजीनियरिंग, पैकेजिंग, कच्चे माल, मशीनरी, वित्त और सर्विस सेक्टर में भी रोजगार और कारोबार के अवसर पैदा होते हैं।
इसके अलावा मजबूत घरेलू उत्पादन भारत को वैश्विक संकट के समय बाहरी सप्लाई चेन के झटकों से बचाने में मदद कर सकता है।
चीन को पीछे छोड़ना नहीं, निर्भरता घटाना ज्यादा जरूरी
भारत के लिए चीन से मुकाबला निश्चित रूप से बड़ी चुनौती है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग की सफलता का पैमाना सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि भारत चीन को कब पीछे छोड़ता है।
असल लक्ष्य होना चाहिए कि भारत ग्लोबल वैल्यू चेन में अपनी हिस्सेदारी तेजी से बढ़ाए, महत्वपूर्ण उत्पादों और कंपोनेंट्स का घरेलू उत्पादन करे और दुनिया की कंपनियों के लिए एक भरोसेमंद मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर बने।
‘शक्ति की सप्तधारा’ में मैन्युफैक्चरिंग को सबसे पहले स्थान देकर सरकार ने इसी दिशा में एक स्पष्ट संकेत दिया है। अब चुनौती इस विजन को जमीन पर उतारने की है। अगर भारत बड़े पैमाने पर उत्पादन, तकनीक, कौशल, इंफ्रास्ट्रक्चर और घरेलू सप्लाई चेन में लगातार निवेश करता है, तो 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में मैन्युफैक्चरिंग सबसे बड़े इंजन में से एक साबित हो सकती है।


