Ethanol Blended Diesel: भारत में पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा देने के बाद अब डीजल में भी इथेनॉल के इस्तेमाल की संभावनाओं पर चर्चा होती रही है। हालांकि, डीजल में इथेनॉल मिलाने का प्रयोग फिलहाल सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतर पाया है। सरकार की ओर से संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, वैज्ञानिक परीक्षणों के दौरान इथेनॉल मिलाने के बाद डीजल का फ्लैश पॉइंट निर्धारित सुरक्षा सीमा से काफी नीचे चला गया। इसी वजह से इस मिश्रण को तय सुरक्षा मानकों के अनुरूप नहीं पाया गया।
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने सोमवार को संसद में लिखित जवाब में डीजल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर सरकार की स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने बताया कि सरकारी तेल कंपनियों यानी OMCs ने अपने रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटरों के माध्यम से इस ईंधन का वैज्ञानिक परीक्षण किया था। परीक्षण में मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं के साथ वाहन निर्माताओं ने भी सहयोग किया।
डीजल में इथेनॉल ब्लेंडिंग का टेस्ट क्यों हुआ फेल?
डीजल में इथेनॉल मिलाने का उद्देश्य पेट्रोलियम ईंधन पर निर्भरता कम करना और देश में उपलब्ध इथेनॉल उत्पादन क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करना था। लेकिन परीक्षण के दौरान सबसे बड़ी समस्या फ्लैश पॉइंट को लेकर सामने आई।
फ्लैश पॉइंट वह न्यूनतम तापमान होता है जिस पर किसी तरल ईंधन से निकलने वाली वाष्प आग पकड़ने योग्य मिश्रण बना सकती है। ईंधन की सुरक्षा के लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण पैरामीटर माना जाता है।
सरकार के अनुसार, डीजल में इथेनॉल मिलाने के बाद इसका फ्लैश पॉइंट निर्धारित सीमा से काफी कम हो गया। इसका सीधा असर ईंधन की सुरक्षा पर पड़ता है। यही कारण रहा कि इथेनॉल-ब्लेंडेड डीजल आवश्यक सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं कर सका।
इस परीक्षण के नतीजे के बाद फिलहाल डीजल में इथेनॉल की नियमित ब्लेंडिंग शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ना आसान नहीं है।
सरकारी तेल कंपनियों ने किया था वैज्ञानिक परीक्षण
सरकार ने बताया कि डीजल में इथेनॉल के इस्तेमाल को लेकर सरकारी तेल कंपनियों ने अपने रिसर्च एंड डेवलपमेंट सेंटरों के माध्यम से परीक्षण किए थे। इन परीक्षणों में केवल तेल कंपनियां ही शामिल नहीं थीं, बल्कि मान्यता प्राप्त लैबोरेटरीज और वाहन निर्माताओं ने भी सहयोग किया।
इस तरह के परीक्षणों का मकसद यह पता लगाना था कि डीजल में इथेनॉल मिलाने के बाद ईंधन के प्रदर्शन, सुरक्षा और वाहनों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव में क्या बदलाव आता है।
हालांकि, फ्लैश पॉइंट में आई कमी सबसे महत्वपूर्ण बाधा बनकर सामने आई। सरकार के जवाब के मुताबिक, इसी कारण इस मिश्रण को मौजूदा सुरक्षा मानकों के अनुरूप नहीं माना गया।
क्या डीजल में आइसोब्यूटेनॉल मिलाया जा रहा है?
संसद में डीजल में इथेनॉल के अलावा आइसोब्यूटेनॉल की ब्लेंडिंग से जुड़ा सवाल भी पूछा गया था। सरकार ने स्पष्ट किया कि फिलहाल डीजल में आइसोब्यूटेनॉल की ब्लेंडिंग नहीं की जा रही है।
इसका मतलब है कि वर्तमान समय में डीजल में इथेनॉल या आइसोब्यूटेनॉल को बड़े पैमाने पर मिलाने की कोई नियमित व्यवस्था लागू नहीं है।
डीजल में किसी भी तरह के वैकल्पिक ईंधन को शामिल करने से पहले उसकी सुरक्षा, इंजन के प्रदर्शन, उत्सर्जन और लंबे समय तक इस्तेमाल के प्रभावों का परीक्षण जरूरी है। मौजूदा परीक्षण में फ्लैश पॉइंट से जुड़ी समस्या सामने आने के बाद सरकार का रुख फिलहाल सावधानी वाला दिखाई देता है।
पेट्रोल में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग के बाद अब आगे क्या?
भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग का सबसे बड़ा प्रयोग पेट्रोल के क्षेत्र में हुआ है। सरकार ने पेट्रोल में 20% तक इथेनॉल ब्लेंडिंग के लक्ष्य को आगे बढ़ाया है। अब सवाल यह है कि क्या भविष्य में पेट्रोल में इथेनॉल की मात्रा 20% से भी अधिक की जाएगी?
संसद में सरकार ने स्पष्ट किया कि फिलहाल पेट्रोल में 20% से ज्यादा इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर कोई फैसला नहीं किया गया है।
सरकार के अनुसार, यदि भविष्य में ब्लेंडिंग प्रतिशत बढ़ाने पर विचार किया जाता है तो इसके लिए विस्तृत वैज्ञानिक और तकनीकी अध्ययन किया जाएगा। इसमें वाहन निर्माताओं, तेल कंपनियों और रिसर्च संस्थानों की राय भी ली जाएगी।
इससे साफ है कि सरकार केवल इथेनॉल की उपलब्धता के आधार पर ब्लेंडिंग बढ़ाने के पक्ष में नहीं है। ईंधन की गुणवत्ता और वाहनों की तकनीकी क्षमता को भी ध्यान में रखा जाएगा।
OMCs खरीदेंगी 10.48 अरब लीटर इथेनॉल
इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम के तहत सरकारी तेल कंपनियां बड़े स्तर पर इथेनॉल की खरीद भी कर रही हैं। सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, OMCs ने सितंबर 2025 में 2025-26 के इथेनॉल सप्लाई ईयर के लिए करीब 10.5 अरब लीटर इथेनॉल खरीदने का पहला टेंडर जारी किया था।
इस टेंडर के जवाब में करीब 17.6 अरब लीटर इथेनॉल की पेशकश मिली। यानी तेल कंपनियों द्वारा मांगी गई मात्रा की तुलना में सप्लायर्स की ओर से काफी अधिक इथेनॉल उपलब्ध कराने की पेशकश की गई।
इसके बाद कुल 378 रजिस्टर्ड सप्लायर्स को लगभग 10.485 अरब लीटर इथेनॉल आवंटित किया गया।
यह आंकड़ा बताता है कि देश में इथेनॉल उत्पादन क्षमता में पिछले कुछ वर्षों में काफी विस्तार हुआ है। सरकार अब इस अतिरिक्त उत्पादन क्षमता को अलग-अलग क्षेत्रों में इस्तेमाल करने के विकल्प तलाश रही है।
कुकिंग फ्यूल के तौर पर भी इथेनॉल पर नजर
इथेनॉल को केवल वाहनों के ईंधन में मिलाने तक सीमित नहीं रखा जा रहा है। सरकार इसके इस्तेमाल को खाना पकाने के ईंधन के रूप में भी तलाश रही है।
सरकार का मानना है कि यदि इथेनॉल को कुकिंग फ्यूल के रूप में व्यवहारिक और सुरक्षित तरीके से इस्तेमाल किया जा सके तो इससे देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है।
भारत खाना पकाने के लिए LPG पर काफी निर्भर है। ऐसे में वैकल्पिक ईंधन के रूप में इथेनॉल का इस्तेमाल होने पर लंबे समय में LPG आयात पर निर्भरता कम करने का विकल्प मिल सकता है।
हालांकि, कुकिंग फ्यूल के तौर पर इथेनॉल के इस्तेमाल से पहले भी सुरक्षा, स्टोरेज, वितरण, उपकरणों की अनुकूलता और लागत जैसे कई पहलुओं का अध्ययन करना होगा।
इथेनॉल उत्पादन बढ़ने से सरकार को क्या फायदा?
इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ने और अन्य कृषि आधारित स्रोतों से तैयार किया जाता है। भारत में इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम का एक उद्देश्य किसानों और चीनी उद्योग के लिए अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराना भी रहा है।
जब पेट्रोल में इथेनॉल की मांग बढ़ती है तो देश में उत्पादित इथेनॉल के लिए एक बड़ा घरेलू बाजार तैयार होता है। इससे पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर निर्भरता कम करने और विदेशी मुद्रा की बचत करने में भी मदद मिल सकती है।
हालांकि, इथेनॉल की उपलब्धता बढ़ने के साथ उसका इस्तेमाल कहां और किस मात्रा में किया जाए, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है। डीजल में किए गए परीक्षण से पता चलता है कि हर प्रकार के पेट्रोलियम ईंधन के साथ इथेनॉल को एक ही तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
डीजल और पेट्रोल में इथेनॉल का अंतर समझना जरूरी
पेट्रोल और डीजल दोनों पेट्रोलियम आधारित ईंधन हैं, लेकिन उनकी रासायनिक विशेषताएं और इंजन में काम करने का तरीका अलग होता है। इसलिए पेट्रोल में सफल ब्लेंडिंग का मतलब यह नहीं है कि वही अनुपात डीजल में भी सुरक्षित या प्रभावी होगा।
इथेनॉल की प्रकृति और डीजल की विशेषताओं के बीच अंतर के कारण मिश्रण की स्थिरता, सुरक्षा और इंजन प्रदर्शन जैसे पहलुओं पर अलग से परीक्षण करना पड़ता है।
यही वजह है कि डीजल में इथेनॉल ब्लेंडिंग के लिए व्यापक वैज्ञानिक जांच की गई। लेकिन फिलहाल फ्लैश पॉइंट से जुड़ी समस्या के कारण यह प्रयोग सुरक्षा मानकों पर सफल नहीं हो पाया है।
क्या भविष्य में डीजल में इथेनॉल इस्तेमाल हो सकता है?
फिलहाल उपलब्ध सरकारी जानकारी के आधार पर डीजल में इथेनॉल की नियमित ब्लेंडिंग शुरू करने का कोई संकेत नहीं है। मौजूदा परीक्षण में सुरक्षा से जुड़ी महत्वपूर्ण खामी सामने आई है।
हालांकि, इसका अर्थ यह भी नहीं है कि भविष्य में इस विकल्प पर कभी विचार नहीं किया जा सकता। यदि तकनीक में सुधार होता है, मिश्रण की स्थिरता और सुरक्षा संबंधी समस्याओं का समाधान निकलता है और नए वैज्ञानिक परीक्षण सकारात्मक परिणाम देते हैं, तो आगे इस दिशा में फिर से अध्ययन किया जा सकता है।
लेकिन किसी भी नए ईंधन मिश्रण को बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले उसके सुरक्षा मानकों को पूरा करना सबसे महत्वपूर्ण शर्त होगी।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है इथेनॉल?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करता है। ऐसे में घरेलू स्तर पर उपलब्ध वैकल्पिक ईंधन का इस्तेमाल बढ़ाना सरकार की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इथेनॉल ब्लेंडिंग से पेट्रोल की मांग का कुछ हिस्सा वैकल्पिक स्रोत से पूरा किया जा सकता है। इसके अलावा कृषि क्षेत्र, चीनी उद्योग और इथेनॉल उत्पादकों के लिए भी यह एक बड़ा बाजार तैयार करता है।
लेकिन डीजल के मामले में हालिया परीक्षण यह भी बताता है कि वैकल्पिक ईंधन को अपनाने से पहले सुरक्षा और तकनीकी मानकों को प्राथमिकता देना जरूरी है।
सरकार का रुख क्या है?
संसद में दिए गए जवाब से फिलहाल सरकार का रुख काफी स्पष्ट है। डीजल में इथेनॉल ब्लेंडिंग का परीक्षण किया गया, लेकिन फ्लैश पॉइंट में कमी के कारण मिश्रण तय सुरक्षा मानकों को पूरा नहीं कर पाया। वहीं, डीजल में आइसोब्यूटेनॉल की ब्लेंडिंग भी फिलहाल नहीं की जा रही है।
दूसरी ओर, पेट्रोल में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग के बाद उससे आगे बढ़ने का फैसला अभी नहीं हुआ है। भविष्य में इस पर वैज्ञानिक और तकनीकी अध्ययन तथा संबंधित हितधारकों से सलाह के बाद विचार किया जाएगा।
साथ ही, सरकार इथेनॉल के नए इस्तेमाल की संभावनाएं भी तलाश रही है। इसमें कुकिंग फ्यूल के रूप में इसका इस्तेमाल एक अहम विकल्प हो सकता है।
निष्कर्ष
डीजल में इथेनॉल ब्लेंडिंग को लेकर किए गए परीक्षण ने फिलहाल एक महत्वपूर्ण चुनौती सामने रखी है। फ्लैश पॉइंट का तय सुरक्षा सीमा से नीचे जाना इस प्रयोग के असफल होने की प्रमुख वजह बनी है। इसलिए डीजल में इथेनॉल की नियमित ब्लेंडिंग फिलहाल संभव नहीं दिख रही है।
वहीं, पेट्रोल में 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग के बाद आगे की रणनीति पर सरकार अभी अध्ययन और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर फैसला करेगी। दूसरी तरफ, देश में बढ़ती इथेनॉल उत्पादन क्षमता को देखते हुए सरकार इसके इस्तेमाल के नए रास्ते तलाश रही है, जिसमें कुकिंग फ्यूल भी शामिल है।
कुल मिलाकर, भारत की इथेनॉल नीति अब केवल पेट्रोल में ब्लेंडिंग तक सीमित नहीं रह गई है। लेकिन किसी भी नए इस्तेमाल के लिए सुरक्षा, तकनीकी व्यवहार्यता और उपभोक्ता हित सबसे महत्वपूर्ण आधार बने रहेंगे।


