Biogas CBG Mission: भारत में पेट्रोल में एथनॉल ब्लेंडिंग की कहानी को ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी सफलताओं में गिना जाता है। जिस योजना को कभी धीमी गति, सीमित निवेश और सप्लाई से जुड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा था, उसी मॉडल को अब सरकार बायोगैस और खासकर Compressed Biogas (CBG) के क्षेत्र में दोहराने की तैयारी कर रही है। इसके लिए सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों के लिए CBG ब्लेंडिंग को अनिवार्य किया गया है।
इस कदम का असर सिर्फ गैस कंपनियों तक सीमित नहीं रहेगा। अगर CBG का उत्पादन और सप्लाई नेटवर्क उम्मीद के मुताबिक बढ़ता है, तो इसका फायदा किसानों, नगर निकायों, ऊर्जा कंपनियों और आम उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है। पराली, गोबर और गीले कचरे जैसी चीजें, जिन्हें अब तक बड़ी समस्या माना जाता रहा है, भविष्य में ऊर्जा उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल बन सकती हैं।
हाईलाइट्स
- सरकार ने सिटी गैस कंपनियों के लिए CBG ब्लेंडिंग का लक्ष्य तय किया है।
- CBG ब्लेंडिंग वित्त वर्ष 2025-26 में 1% से शुरू होकर 2028-29 तक 5% तक पहुंचाने का लक्ष्य है।
- सरकार एथनॉल ब्लेंडिंग की सफलता से मिले अनुभव को बायोगैस सेक्टर में इस्तेमाल करना चाहती है।
- पराली, गोबर और गीले कचरे से ऊर्जा उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है।
- CBG सेक्टर किसानों के लिए अतिरिक्त आय और शहरों के लिए बेहतर कचरा प्रबंधन का माध्यम बन सकता है।
एथनॉल ने दिखाया रास्ता, अब बायोगैस की बारी
भारत की ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा अभी भी आयातित पेट्रोलियम और गैस पर निर्भर है। ऐसे में घरेलू स्तर पर वैकल्पिक ईंधन तैयार करना सरकार की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।
एथनॉल ब्लेंडिंग इसका एक बड़ा उदाहरण है। एक समय पेट्रोल में एथनॉल मिलाने की योजना बेहद धीमी गति से आगे बढ़ रही थी। उत्पादन सीमित था, तेल कंपनियों की खरीद को लेकर अनिश्चितता थी और किसानों तथा डिस्टिलरी कंपनियों के लिए भी पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं था।
इसके बाद सरकार ने नीतिगत बदलाव किए। एथनॉल की खरीद के लिए बेहतर व्यवस्था, कीमतों से जुड़ी स्पष्टता और उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए वित्तीय सहायता जैसे कदमों ने पूरे सेक्टर को गति दी।
नतीजा यह हुआ कि पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य, जिसे पहले 2030 तक हासिल करने की योजना थी, भारत ने 2025-26 में ही हासिल कर लिया।
यही अनुभव अब CBG सेक्टर के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।
बायोगैस में क्या है सरकार का नया प्लान?
सरकार का फोकस अब Compressed Biogas यानी CBG पर है। यह ऐसी गैस है जिसे जैविक कचरे से तैयार किया जाता है और शुद्धिकरण के बाद प्राकृतिक गैस के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
इसके लिए सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन यानी CGD कंपनियों को अपनी CNG और PNG आपूर्ति में CBG शामिल करने के लिए लक्ष्य दिया गया है।
CBG ब्लेंडिंग का लक्ष्य वित्त वर्ष 2025-26 में 1 प्रतिशत से शुरू होकर 2026-27 में 2 प्रतिशत, 2027-28 में 3 प्रतिशत और 2028-29 तक 5 प्रतिशत तक पहुंचाने की दिशा में है।
इस नीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे CBG बनाने वाली कंपनियों को संभावित खरीदार का भरोसा मिलता है। यानी प्लांट लगाने वाला निवेशक सिर्फ गैस बनाने की चिंता नहीं करेगा, बल्कि उसे बाजार और ऑफटेक की बेहतर संभावना दिखाई देगी।
SATAT योजना क्यों नहीं पकड़ पाई रफ्तार?
CBG सेक्टर में सरकार का प्रयास नया नहीं है। वर्ष 2018 में SATAT यानी Sustainable Alternative Towards Affordable Transportation पहल शुरू की गई थी।
इसका उद्देश्य देश में बड़े पैमाने पर CBG प्लांट स्थापित करना और कृषि अवशेषों, गोबर तथा अन्य जैविक कचरे से वैकल्पिक ईंधन तैयार करना था।
लेकिन योजना के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां आ गईं।
सबसे बड़ी समस्या थी फीडस्टॉक यानी कच्चे माल की सप्लाई। एथनॉल के मामले में गन्ना, शीरा और अनाज जैसी सामग्री के लिए पहले से स्थापित कृषि और औद्योगिक सप्लाई चेन मौजूद थी। दूसरी तरफ बायोगैस प्लांट के लिए अलग-अलग इलाकों से रोजाना गोबर, पराली और गीला कचरा जुटाना पड़ता है।
कई जगह कचरा उपलब्ध होने के बावजूद उसे प्लांट तक पहुंचाने की लागत काफी अधिक हो सकती है। इसके अलावा कचरे की गुणवत्ता और नमी में अंतर होने से उत्पादन की क्षमता भी प्रभावित हो सकती है।
यही वजह रही कि शुरुआती उत्साह के बावजूद CBG सेक्टर उस गति से आगे नहीं बढ़ सका, जिसकी उम्मीद की गई थी।
अब CBG सेक्टर के लिए गेमचेंजर क्यों बन सकता है ब्लेंडिंग नियम?
किसी भी ऊर्जा परियोजना में उत्पादन क्षमता के साथ-साथ खरीदार की उपलब्धता बेहद महत्वपूर्ण होती है।
अगर कोई कंपनी करोड़ों रुपये खर्च करके CBG प्लांट लगाती है, लेकिन उत्पादित गैस खरीदने वाला निश्चित बाजार नहीं है, तो निवेश का जोखिम बढ़ जाता है।
अनिवार्य ब्लेंडिंग इसी समस्या को कम करने की कोशिश है।
जब CGD कंपनियों को निर्धारित मात्रा में CBG खरीदना और अपने नेटवर्क में शामिल करना होगा, तो CBG उत्पादकों को मांग का एक स्पष्ट आधार मिलेगा। इससे नए प्लांट लगाने, मौजूदा प्लांट की क्षमता बढ़ाने और कच्चे माल की सप्लाई चेन विकसित करने के लिए निवेश बढ़ सकता है।
यही वह मॉडल है जिसने एथनॉल सेक्टर में निवेश को गति देने में मदद की थी।
रिलायंस, अडाणी और GAIL जैसी कंपनियों की बढ़ेगी भूमिका
CBG सेक्टर में बड़े ऊर्जा समूहों की दिलचस्पी पहले से बढ़ रही है। Reliance Industries, Adani Enterprises और GAIL (India) जैसी कंपनियां गैस और वैकल्पिक ऊर्जा क्षेत्र में निवेश कर रही हैं।
बड़े कॉरपोरेट समूहों के आने से इस क्षेत्र में पूंजी, तकनीक और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित होने की संभावना बढ़ती है।
हालांकि, CBG सेक्टर की असली सफलता सिर्फ बड़े प्लांट लगाने से नहीं होगी। इसके लिए गांवों और शहरों से कच्चा माल नियमित रूप से जुटाने का मजबूत नेटवर्क भी जरूरी होगा।
पराली अब सिर्फ प्रदूषण की समस्या नहीं, कमाई का जरिया बन सकती है
हर साल फसल कटाई के बाद पराली जलाने से वायु प्रदूषण की समस्या बढ़ती है। खासकर उत्तर भारत के कई हिस्सों में यह लंबे समय से एक बड़ी चुनौती रही है।
अगर पराली को CBG प्लांट के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करने की व्यवस्था बड़े पैमाने पर बनती है, तो किसानों के लिए यह अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकती है।
किसानों के सामने विकल्प होगा कि फसल अवशेष को जलाने के बजाय उसे संग्रह करने वाली कंपनियों या बायोगैस प्लांट को बेचा जाए।
हालांकि इसके लिए खेत से पराली उठाने, उसे स्टोर करने और प्लांट तक पहुंचाने का खर्च कम करना जरूरी होगा। यदि यह लॉजिस्टिक्स मॉडल सफल होता है, तो एक तरफ किसानों को आर्थिक फायदा मिलेगा और दूसरी तरफ पराली जलाने से होने वाला प्रदूषण घट सकता है।
गोबर और नगर निगम का कचरा भी बनेगा ऊर्जा का स्रोत
CBG का एक बड़ा फायदा यह है कि इसके लिए सिर्फ कृषि अवशेषों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।
पशुपालन वाले इलाकों में गोबर का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसी तरह शहरों में निकलने वाला गीला और जैविक कचरा भी बायोगैस उत्पादन में इस्तेमाल किया जा सकता है।
आज कई शहरों के सामने ठोस कचरा प्रबंधन एक बड़ी चुनौती है। लैंडफिल में लगातार बढ़ता कचरा जमीन और पर्यावरण दोनों पर दबाव डालता है।
अगर गीले कचरे को अलग करके वैज्ञानिक तरीके से CBG प्लांट तक पहुंचाया जाए, तो कचरा प्रबंधन और ऊर्जा उत्पादन दोनों समस्याओं को एक साथ संबोधित किया जा सकता है।
क्या आम लोगों को भी मिलेगा फायदा?
CBG मिशन का असर सीधे तौर पर हर उपभोक्ता को तुरंत दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। लेकिन लंबे समय में इसके कई अप्रत्यक्ष फायदे हो सकते हैं।
भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक हिस्सा आयात के जरिए पूरा करना पड़ता है। घरेलू स्तर पर बायोगैस और CBG का उत्पादन बढ़ने से प्राकृतिक गैस और अन्य ईंधनों पर आयात निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
इससे देश के विदेशी मुद्रा खर्च पर भी दबाव कम हो सकता है। इसके अलावा घरेलू ऊर्जा स्रोतों का हिस्सा बढ़ने से लंबे समय में गैस की उपलब्धता और कीमतों में स्थिरता लाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि गैस की खुदरा कीमत केवल CBG ब्लेंडिंग से तय नहीं होती। अंतरराष्ट्रीय कीमतें, टैक्स, वितरण लागत और अन्य बाजार कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
एथनॉल मॉडल की कॉपी करना आसान नहीं
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि CBG सेक्टर के सामने एथनॉल की तुलना में ज्यादा जटिल चुनौतियां हैं।
एथनॉल के लिए देश में पहले से गन्ने और चीनी मिलों का बड़ा इकोसिस्टम मौजूद था। इसके मुकाबले बायोगैस का कच्चा माल बेहद बिखरा हुआ है।
एक गांव में गोबर उपलब्ध है, दूसरे क्षेत्र में धान की पराली, जबकि किसी शहर में बड़ी मात्रा में गीला कचरा मिल सकता है। इन सभी स्रोतों को एक कुशल सप्लाई चेन से जोड़ना जरूरी होगा।
इसके अलावा CBG प्लांट की लागत, जमीन, पानी, परिवहन, कच्चे माल की नियमित उपलब्धता और उत्पादित गैस की गुणवत्ता जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए सिर्फ ब्लेंडिंग अनिवार्य करने से सेक्टर की सारी समस्याएं खत्म नहीं होंगी। सरकार और कंपनियों को सप्लाई चेन, वित्तपोषण और स्थानीय स्तर पर कचरा संग्रह की व्यवस्था पर भी काम करना होगा।
भारत के लिए ‘ट्रिपल विन’ बन सकता है CBG
अगर सरकार की CBG नीति सफल होती है और एथनॉल की तरह उत्पादन क्षमता तेजी से बढ़ती है, तो इसका फायदा तीन स्तरों पर दिखाई दे सकता है।
पहला फायदा किसानों को मिल सकता है। पराली और दूसरे कृषि अवशेषों से अतिरिक्त आमदनी का रास्ता खुल सकता है।
दूसरा फायदा शहरों को होगा। गीले कचरे का वैज्ञानिक इस्तेमाल होने से लैंडफिल पर दबाव कम किया जा सकता है और कचरा प्रबंधन बेहतर हो सकता है।
तीसरा और सबसे बड़ा फायदा देश की ऊर्जा सुरक्षा को मिल सकता है। घरेलू स्तर पर तैयार CBG आयातित गैस और दूसरे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में योगदान दे सकता है।
यानी जिस कचरे को आज खर्च और प्रदूषण की समस्या माना जाता है, वही भविष्य में ऊर्जा और कमाई का स्रोत बन सकता है।
आगे की राह में सबसे बड़ी चुनौती क्या होगी?
CBG सेक्टर की सफलता का फैसला अब सिर्फ सरकारी नीति से नहीं होगा। असली परीक्षा जमीन पर होगी।
क्या किसानों से पराली नियमित रूप से जुटाई जा सकेगी? क्या नगर निकाय गीले कचरे को अलग करके प्लांट तक भेज पाएंगे? क्या CBG प्लांट लगातार पर्याप्त कच्चा माल हासिल कर सकेंगे? क्या गैस की गुणवत्ता और कीमत CGD कंपनियों के लिए प्रतिस्पर्धी रहेगी?
इन सवालों का जवाब आने वाले वर्षों में मिलेगा।
फिर भी CBG ब्लेंडिंग को अनिवार्य करने का फैसला सेक्टर के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव है। इससे पहले जहां प्लांट लगाने के बाद गैस बेचने की चिंता रहती थी, अब मांग को नीतिगत समर्थन मिल रहा है।
निष्कर्ष
भारत ने एथनॉल ब्लेंडिंग में जिस तरह नीति, निवेश और खरीद की गारंटी के जरिए एक सुस्त सेक्टर को तेजी से आगे बढ़ाया, अब उसी अनुभव को CBG के क्षेत्र में इस्तेमाल करने की कोशिश हो रही है।
गोबर, पराली और गीले कचरे को ईंधन में बदलने का यह मॉडल सफल हुआ तो यह सिर्फ ऊर्जा क्षेत्र की कहानी नहीं होगी। यह किसानों की आय, शहरों के कचरा प्रबंधन और देश की ऊर्जा सुरक्षा—तीनों को एक साथ प्रभावित कर सकता है।
हालांकि CBG के सामने सप्लाई चेन और लागत जैसी चुनौतियां बड़ी हैं, लेकिन अनिवार्य ब्लेंडिंग ने इस सेक्टर को वह मांग का भरोसा दिया है जिसकी उसे लंबे समय से जरूरत थी। आने वाले कुछ वर्षों में यह साफ होगा कि क्या भारत बायोगैस में भी एथनॉल जैसी बड़ी सफलता दोहरा पाता है।


