नई दिल्ली: भारत के एविएशन सेक्टर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। केंद्र सरकार एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को अपनी खुद की एयरलाइन शुरू करने की अनुमति देने पर विचार कर रही है। यदि इस प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो अडानी ग्रुप और जीएमआर एयरपोर्ट्स जैसी कंपनियों के लिए एयरलाइन बिजनेस में उतरने का रास्ता खुल जाएगा। इससे भारतीय विमानन बाजार में लंबे समय से बने इंडिगो और एयर इंडिया के दबदबे को चुनौती मिल सकती है।
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक नागरिक उड्डयन मंत्रालय मौजूदा नियमों में बदलाव पर चर्चा कर रहा है। फिलहाल एयरपोर्ट ऑपरेटर्स किसी एयरलाइन में 10% से अधिक हिस्सेदारी नहीं रख सकते, लेकिन सरकार इस सीमा में ढील देने पर विचार कर रही है।
क्या है मौजूदा नियम?
वर्तमान नियमों के अनुसार, कोई भी एयरपोर्ट ऑपरेटर किसी एयरलाइन में 10% से अधिक हिस्सेदारी नहीं रख सकता। यह व्यवस्था हितों के टकराव (Conflict of Interest) से बचने के लिए बनाई गई थी ताकि एयरपोर्ट संचालक अपनी एयरलाइन को अनुचित लाभ न दे सकें।
अब सरकार इस नियम में संशोधन कर एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को सीधे एयरलाइन शुरू करने या उसमें नियंत्रक हिस्सेदारी रखने की अनुमति देने पर विचार कर रही है। हालांकि इसके लिए कानून मंत्रालय और केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी आवश्यक होगी।
अडानी और GMR को कैसे होगा फायदा?
अगर नीति में बदलाव होता है तो देश के सबसे बड़े एयरपोर्ट ऑपरेटर्स में शामिल अडानी ग्रुप और GMR एयरपोर्ट्स को सबसे बड़ा फायदा मिल सकता है।
- अडानी ग्रुप मुंबई एयरपोर्ट सहित देश के आठ प्रमुख एयरपोर्ट का संचालन करता है।
- GMR एयरपोर्ट्स दिल्ली एयरपोर्ट समेत पांच प्रमुख एयरपोर्ट का प्रबंधन करती है।
इन कंपनियों के पास पहले से एयरपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑपरेशनल अनुभव है। ऐसे में एयरलाइन बिजनेस में उतरना उनके लिए रणनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है।
इंडिगो और एयर इंडिया का दबदबा
भारतीय घरेलू विमानन बाजार में फिलहाल दो कंपनियों का लगभग एकाधिकार जैसा माहौल है।
- इंडिगो की घरेलू बाजार हिस्सेदारी करीब 66.3% है।
- एयर इंडिया ग्रुप के साथ मिलाकर दोनों कंपनियों की कुल हिस्सेदारी लगभग 90% तक पहुंच चुकी है।
इस वजह से नए खिलाड़ियों के लिए बाजार में जगह बनाना मुश्किल हो गया है। सरकार का मानना है कि नए ऑपरेटर्स के आने से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और यात्रियों को बेहतर सेवाएं तथा अधिक विकल्प मिल सकते हैं।
क्यों जरूरी माना जा रहा है यह बदलाव?
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय एविएशन सेक्टर में कई एयरलाइंस बंद हो चुकी हैं।
- जेट एयरवेज का संचालन बंद हो गया।
- गो फर्स्ट (पूर्व में गो एयर) भी परिचालन बंद कर चुकी है।
- स्पाइसजेट वित्तीय चुनौतियों से जूझ रही है।
- आकासा एयर अभी विस्तार के शुरुआती चरण में है।
इन परिस्थितियों में बाजार सीमित खिलाड़ियों के हाथ में सिमट गया है। सरकार चाहती है कि नए निवेशक और कंपनियां इस सेक्टर में आएं ताकि प्रतिस्पर्धा बढ़े और बाजार अधिक संतुलित बने।
क्या हो सकती हैं चुनौतियां?
हालांकि इस प्रस्ताव के साथ कुछ चिंताएं भी जुड़ी हुई हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई एयरपोर्ट ऑपरेटर अपनी एयरलाइन भी चलाएगा तो वह अपनी उड़ानों को बेहतर स्लॉट, पार्किंग बे या अन्य सुविधाओं में प्राथमिकता दे सकता है। इससे अन्य एयरलाइनों के लिए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।
ऐसे में सरकार को नई नीति के साथ मजबूत नियामकीय व्यवस्था भी तैयार करनी होगी ताकि सभी एयरलाइनों के लिए समान अवसर सुनिश्चित किए जा सकें।
भारत का एविएशन सेक्टर तेजी से बढ़ रहा
भारत आज दुनिया का चौथा सबसे बड़ा एविएशन मार्केट बन चुका है और आने वाले वर्षों में इसकी रफ्तार और तेज होने की उम्मीद है।
सरकार का लक्ष्य 2047 तक देश में एयरपोर्ट्स की संख्या बढ़ाकर 350 करना है। वहीं इंटरनेशनल एयर ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन (IATA) का अनुमान है कि 2044 तक भारत में हवाई यात्रियों की संख्या 425 मिलियन और बढ़ जाएगी।
तेजी से बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार नए एयरलाइन ऑपरेटर्स को बाजार में लाने के विकल्प तलाश रही है ताकि भविष्य में यात्रियों को बेहतर कनेक्टिविटी और प्रतिस्पर्धी किराए का लाभ मिल सके।
क्या बदल सकता है भारतीय विमानन बाजार?
यदि सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी देती है तो भारतीय एविएशन सेक्टर में नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है। अडानी ग्रुप और GMR जैसी बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के एयरलाइन बिजनेस में आने से इंडिगो और एयर इंडिया के लंबे समय से चले आ रहे दबदबे को चुनौती मिल सकती है। हालांकि इसके साथ निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए सरकार को मजबूत नियम और निगरानी तंत्र भी लागू करना होगा।


