नई दिल्ली: देश में बैंकों के फंसे हुए कर्ज (NPA) की समस्या से निपटने और दिवालिया कंपनियों का जल्द समाधान करने के लिए लागू किया गया दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (Insolvency and Bankruptcy Code-IBC) अब अपने सबसे बड़े उद्देश्य—तेजी से कर्ज वसूली—में कमजोर पड़ता दिख रहा है। हालात ऐसे हैं कि जहां कानून में 180 दिनों के भीतर मामलों का समाधान करने का प्रावधान है, वहीं अब एक केस को निपटाने में औसतन 744 दिन, यानी लगभग दो साल लग रहे हैं।
लोकसभा में वित्त एवं कॉरपोरेट मामलों की मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा दिए गए आंकड़ों से यह भी सामने आया है कि IBC के तहत कर्ज वसूली की दर लगातार घट रही है। शुरुआती वर्षों में जहां बकाया राशि का 54-55% तक रिकवरी हो रही थी, वहीं अब यह घटकर सिर्फ 20% रह गई है। हालांकि सरकार अब भी इस कानून को अपने मूल उद्देश्यों की दृष्टि से सफल मानती है।
IBC के तहत कर्ज वसूली में लगातार गिरावट
वित्त मंत्री के लिखित जवाब के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में IBC के तहत 233 मामलों का समाधान हुआ। इन मामलों से 42,003 करोड़ रुपये की वसूली हुई, जो कुल बकाया राशि का केवल 20% थी।
इसके मुकाबले:
- 2024-25: 259 मामलों में 54,604 करोड़ रुपये की वसूली, रिकवरी दर 37%
- 2017-18: 18 मामलों में 3,807 करोड़ रुपये की वसूली, रिकवरी दर 54%
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि समय के साथ मामलों की संख्या बढ़ी है, लेकिन बैंकों और वित्तीय संस्थानों को मिलने वाली वास्तविक रिकवरी लगातार कम होती गई है।
क्या है IBC और क्यों बनाया गया था?
Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) को वर्ष 2016 में लागू किया गया था। इसका उद्देश्य उन कंपनियों का समयबद्ध समाधान करना था जो अपने कर्ज का भुगतान करने में असफल हो जाती हैं।
इस कानून के तहत:
- कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू होती है।
- एक रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल कंपनी का नियंत्रण संभालता है।
- कंपनी के लिए नए खरीदार या निवेशक की तलाश की जाती है।
- समाधान नहीं मिलने पर कंपनी की परिसंपत्तियां बेचकर कर्जदाताओं को भुगतान किया जाता है।
इस व्यवस्था से बैंकिंग प्रणाली में फंसे कर्ज को कम करने और निवेशकों का विश्वास बढ़ाने की उम्मीद की गई थी।
180 दिन का नियम, लेकिन औसतन 744 दिन लग रहे
IBC में किसी भी मामले का समाधान 180 दिनों के भीतर करने का प्रावधान है। विशेष परिस्थितियों में 90 दिनों का अतिरिक्त समय भी दिया जा सकता है। यानी अधिकतम लगभग 270 दिनों में प्रक्रिया पूरी होनी चाहिए।
लेकिन वास्तविक स्थिति इससे काफी अलग है।
| वित्त वर्ष | औसत समाधान अवधि |
|---|---|
| 2024-25 | 713 दिन |
| 2025-26 | 744 दिन |
यानी अब एक मामला तय समय सीमा से लगभग तीन गुना अधिक समय ले रहा है।
आखिर क्यों बढ़ रही है देरी?
विशेषज्ञों के अनुसार IBC प्रक्रिया में देरी के पीछे कई कारण हैं।
- राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) में लंबित मामलों का बढ़ता बोझ।
- बार-बार कानूनी चुनौतियां और अपील।
- कई कंपनियों के लिए उपयुक्त खरीदार नहीं मिलना।
- परिसंपत्तियों का मूल्य समय के साथ घट जाना।
- जटिल मामलों में लंबी बातचीत और समाधान प्रक्रिया।
इन कारणों से समाधान में देरी होती है और अंततः बैंकों को कम रिकवरी मिलती है।
बैंकों और निवेशकों के लिए क्यों है चिंता?
जब किसी दिवालिया कंपनी का समाधान वर्षों तक लंबित रहता है तो उसकी परिसंपत्तियों का मूल्य धीरे-धीरे घटने लगता है। इससे कंपनी बेचने पर मिलने वाली रकम कम हो जाती है और बैंकों को भी अपने बकाया कर्ज का बड़ा हिस्सा नहीं मिल पाता।
इसका असर केवल बैंकों पर ही नहीं बल्कि उन निवेशकों पर भी पड़ता है, जिनका पैसा बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली में लगा होता है।
सरकार का क्या कहना है?
लोकसभा में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्वीकार किया कि रिकवरी प्रतिशत में गिरावट आई है, लेकिन सरकार का मानना है कि IBC ने भारतीय बैंकिंग प्रणाली में अनुशासन स्थापित किया है और दिवालिया मामलों के समाधान के लिए एक पारदर्शी व्यवस्था उपलब्ध कराई है।
सरकार पिछले आठ वर्षों में इस कानून में कई संशोधन भी कर चुकी है ताकि प्रक्रिया को अधिक प्रभावी और तेज बनाया जा सके। हालांकि ताजा आंकड़े बताते हैं कि समाधान की गति और रिकवरी दर दोनों में अभी भी सुधार की जरूरत है।
आगे की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि IBC को पहले जैसा प्रभावी बनाना है तो NCLT में लंबित मामलों को तेजी से निपटाना, न्यायाधिकरणों की क्षमता बढ़ाना और समाधान प्रक्रिया को अधिक समयबद्ध बनाना होगा। तभी बैंकिंग क्षेत्र में फंसे कर्ज की समस्या कम होगी और निवेशकों का भरोसा मजबूत रह सकेगा।


