नई दिल्ली: भारत के सैटेलाइट इंटरनेट सेक्टर में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। रिलायंस जियो ने लो अर्थ ऑर्बिट (LEO) में करीब 1,600 सैटेलाइट तैनात करने की अपनी महत्वाकांक्षी योजना के लिए महत्वपूर्ण तकनीकी मंजूरी हासिल कर ली है। यह कदम एलन मस्क की Starlink जैसी वैश्विक सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं को चुनौती देने की दिशा में भारत की सबसे बड़ी पहल माना जा रहा है।
स्पेस रेगुलेटर IN-SPACe ने जियो की प्रस्तावित सैटेलाइट प्रणाली का तकनीकी मूल्यांकन करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर के LEO कॉन्स्टेलेशन के बराबर माना है। इसके बाद केंद्र सरकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऑर्बिटल स्लॉट और आवश्यक रेगुलेटरी प्रक्रियाओं में कंपनी को सहयोग दे सकती है।
Highlights
- जियो को 1,600 LEO सैटेलाइट प्रोजेक्ट के लिए तकनीकी मंजूरी मिली।
- भारत में 20 से अधिक ग्राउंड स्टेशन स्थापित किए जाएंगे।
- 4.5-5 Tbps तक इंटरनेट क्षमता देने का प्रस्ताव।
- भारत का पहला घरेलू LEO सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन बनने की दिशा में बड़ा कदम।
- स्टारलिंक और अमेजन जैसी विदेशी कंपनियों को मिलेगी कड़ी चुनौती।
क्या है जियो का सैटेलाइट इंटरनेट प्रोजेक्ट?
रिलायंस जियो पृथ्वी की निचली कक्षा (Low Earth Orbit) में लगभग 1,600 सैटेलाइट तैनात करने की योजना पर काम कर रहा है। इन सैटेलाइट्स के जरिए देशभर में हाई-स्पीड इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी, खासकर उन इलाकों में जहां फाइबर नेटवर्क या मोबाइल कनेक्टिविटी सीमित है।
कंपनी ने इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (ITU) में आवश्यक फाइलिंग और ऑर्बिटल अधिकार हासिल करने के लिए सरकार से सहयोग भी मांगा है।
IN-SPACe, ISRO और DoT ने किया तकनीकी मूल्यांकन
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जियो के प्रस्ताव का मूल्यांकन IN-SPACe, ISRO और दूरसंचार विभाग (DoT) के वायरलेस प्लानिंग एंड कोऑर्डिनेशन (WPC) विंग ने संयुक्त रूप से किया।
तकनीकी जांच में यह पाया गया कि जियो का प्रस्ताव वैश्विक LEO सैटेलाइट सिस्टम के मानकों के अनुरूप है। हालांकि इस विषय पर रिलायंस जियो और IN-SPACe की ओर से आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
स्टारलिंक को मिलेगी सीधी चुनौती
वर्तमान में एलन मस्क की कंपनी Starlink दुनिया की सबसे बड़ी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा प्रदाताओं में शामिल है। कंपनी के पास 10,000 से अधिक सक्रिय सैटेलाइट हैं और कई देशों में उसकी सेवाएं उपलब्ध हैं।
लेकिन वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच कई देश विदेशी सैटेलाइट नेटवर्क पर निर्भरता कम करने की रणनीति अपना रहे हैं। ऐसे में भारत का अपना घरेलू LEO नेटवर्क राष्ट्रीय सुरक्षा और डिजिटल संप्रभुता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्षमता के मामले में भी जियो आगे
सूत्रों के अनुसार, रिलायंस जियो ने भारत में 4.5 से 5 टेराबिट प्रति सेकंड (Tbps) इंटरनेट क्षमता देने का प्रस्ताव रखा है।
तुलना करें तो:
| कंपनी | प्रस्तावित क्षमता |
|---|---|
| रिलायंस जियो | 4.5-5 Tbps |
| Amazon Kuiper | लगभग 3 Tbps |
| Starlink (भारत के लिए स्वीकृत) | लगभग 600 Gbps |
यह क्षमता भविष्य में लाखों ग्राहकों को हाई-स्पीड इंटरनेट उपलब्ध कराने में मदद कर सकती है।
देशभर में बनेंगे 20 से ज्यादा ग्राउंड स्टेशन
सैटेलाइट नेटवर्क को संचालित करने के लिए रिलायंस जियो 20 से 22 ग्राउंड स्टेशन स्थापित करने की योजना बना रही है। ये स्टेशन सैटेलाइट और धरती के बीच डेटा ट्रांसमिशन का प्रमुख माध्यम होंगे।
मजबूत ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर की मदद से नेटवर्क की विश्वसनीयता और स्पीड दोनों बेहतर होंगी।
कौन-कौन सी सेवाएं देगा जियो?
जियो का प्रस्ताव केवल ब्रॉडबैंड इंटरनेट तक सीमित नहीं है। कंपनी कई तरह की सैटेलाइट आधारित सेवाएं शुरू करने की तैयारी कर रही है, जिनमें शामिल हैं:
- हाई-स्पीड सैटेलाइट ब्रॉडबैंड
- मोबाइल टावरों के लिए सेल्युलर बैकहॉल
- डायरेक्ट-टू-डिवाइस (D2D) सैटेलाइट कनेक्टिविटी
- दूरदराज के इलाकों में इंटरनेट सेवाएं
- आपदा प्रबंधन और आपातकालीन संचार सेवाएं
राष्ट्रीय सुरक्षा को मिलेगा फायदा
स्पेस रेगुलेटर का मानना है कि भारत का अपना LEO सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन केवल व्यावसायिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक रक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण होगा।
घरेलू सैटेलाइट नेटवर्क बनने से विदेशी नेटवर्क पर निर्भरता कम होगी और संवेदनशील संचार सेवाओं को अधिक सुरक्षित बनाया जा सकेगा। भविष्य में यह रक्षा, समुद्री निगरानी, सीमावर्ती क्षेत्रों और आपदा प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभा सकता है।
भारत के डिजिटल भविष्य के लिए क्यों है अहम?
भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में दूरदराज के गांवों, पहाड़ी क्षेत्रों और सीमावर्ती इलाकों तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाना बड़ी चुनौती है। LEO सैटेलाइट नेटवर्क इस चुनौती का समाधान बन सकता है।
यदि जियो की यह परियोजना तय समय पर पूरी होती है, तो भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा जिनके पास अपना घरेलू लो अर्थ ऑर्बिट सैटेलाइट कॉन्स्टेलेशन होगा। इससे देश में डिजिटल कनेक्टिविटी, रणनीतिक स्वावलंबन और सैटेलाइट इंटरनेट बाजार में प्रतिस्पर्धा को नई दिशा मिल सकती है।


