लेखक: धीरज कश्यप (लेखक एवं पत्रकार)
जब भी हम किसी पेड़ की छाया में बैठते हैं, शुद्ध हवा में सांस लेते हैं या मीठे फल का स्वाद चखते हैं, तब यह एहसास होता है कि पेड़ केवल प्रकृति का हिस्सा नहीं, बल्कि हमारे जीवन का आधार हैं। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण, घटते भूजल स्तर और तेजी से कम हो रही हरियाली जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है, तब वृक्षारोपण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व की अनिवार्य शर्त बन गया है। इसी सोच को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य से भारत में “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान की शुरुआत की गई, जिसने पर्यावरण संरक्षण को भावनात्मक जुड़ाव और जनभागीदारी के साथ जोड़कर एक नई दिशा दी है।
माँ के सम्मान से जुड़ा पर्यावरण संरक्षण का संदेश
विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नई दिल्ली के बुद्ध जयंती पार्क में पीपल का पौधा लगाकर “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान का शुभारंभ किया। इस पहल का उद्देश्य प्रत्येक नागरिक को अपनी माँ के सम्मान में कम-से-कम एक पौधा लगाने के लिए प्रेरित करना और पर्यावरण संरक्षण को जन आंदोलन का रूप देना है।
प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर केवल भारतवासियों ही नहीं, बल्कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों और दुनिया भर के लोगों से भी इस अभियान से जुड़ने की अपील की। उनका संदेश स्पष्ट था कि जिस प्रकार माँ जीवन देती है, उसी प्रकार प्रकृति भी जीवन का आधार है। इसलिए माँ और प्रकृति—दोनों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का सबसे सुंदर माध्यम एक पेड़ लगाना हो सकता है।
भावनाओं से जुड़ा अभियान बना जन आंदोलन
इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पर्यावरण संरक्षण को भावनाओं से जोड़ा गया है। जब कोई व्यक्ति अपनी माँ के नाम पर पौधा लगाता है, तो वह केवल एक पेड़ नहीं लगाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल और स्वस्थ पर्यावरण की नींव रखता है।
देशभर में इस अभियान को व्यापक जनसमर्थन मिला। केंद्र और राज्य सरकारों के विभिन्न विभाग, विद्यालय, महाविद्यालय, राष्ट्रीय सेवा योजना (NSS), स्वयंसेवी संस्थाएँ, पंचायतें, धार्मिक संगठन, उद्योग जगत तथा लाखों नागरिक इसमें सक्रिय रूप से भाग ले रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने भी विभिन्न राज्यों में वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित किए, जिससे यह अभियान लगातार एक व्यापक जन आंदोलन का रूप लेता जा रहा है।
पर्यावरण संरक्षण में सामाजिक संगठनों की भूमिका
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) तथा उससे प्रेरित अनेक सेवा संगठनों ने भी वर्षों से पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने 12 अक्टूबर 2024 (विजयादशमी) के अपने संबोधन में “पंच परिवर्तन” का आह्वान किया था, जिसमें पर्यावरण संरक्षण को पाँच प्रमुख विषयों में शामिल किया गया।
संघ से प्रेरित पर्यावरण भारती संगठन वर्ष 1994 से वृक्षारोपण, जल संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरण जागरूकता के क्षेत्र में कार्य कर रहा है। संगठन का उद्देश्य केवल पौधे लगाना नहीं, बल्कि समाज में प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना है।
उत्तर प्रदेश का 35 करोड़ पौधारोपण अभियान
12 जुलाई 2026 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने “एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के तहत विशाल वृक्षारोपण महाअभियान का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि धरती माँ का स्वास्थ्य सुरक्षित रखना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। धरती हमें अन्न, जल, फल, औषधियाँ और जीवन के लिए आवश्यक सभी संसाधन प्रदान करती है, इसलिए उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हमारा नैतिक दायित्व है।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जहाँ अधिक पेड़ और घने वन होते हैं, वहाँ नदियाँ अधिक समय तक प्रवाहित रहती हैं क्योंकि वृक्ष भूजल पुनर्भरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी उद्देश्य से उत्तर प्रदेश में 35 करोड़ पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
पेड़ क्यों हैं जीवन का आधार?
पेड़ केवल ऑक्सीजन ही नहीं देते, बल्कि मानव जीवन और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, तापमान नियंत्रित करते हैं, वर्षा चक्र को संतुलित बनाए रखते हैं, मिट्टी के कटाव को रोकते हैं और हजारों जीव-जंतुओं को आश्रय प्रदान करते हैं।
आज जब देश के अनेक शहर वायु प्रदूषण और बढ़ते तापमान से जूझ रहे हैं, तब वृक्षारोपण सबसे प्रभावी प्राकृतिक समाधान माना जा रहा है। वैज्ञानिकों का भी मानना है कि यदि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करना है तो बड़े पैमाने पर पौधारोपण और मौजूदा वनों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।
भारतीय संस्कृति में वृक्षों का महत्व
भारतीय संस्कृति में वृक्षों को सदैव पूजनीय माना गया है। वेद, पुराण और उपनिषदों में पीपल, बरगद, नीम, बेल, तुलसी और आंवले जैसे वृक्षों की महिमा का विस्तृत वर्णन मिलता है। इनकी पूजा केवल धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण का संदेश भी देती है।
भारतीय परंपरा हमें सिखाती है कि वृक्षों का सम्मान करना और उनका संरक्षण करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है। यही कारण है कि भारत में वृक्षारोपण को सामाजिक और धार्मिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण माना जाता है।
घर में कौन-से पेड़ लगाना बेहतर?
पर्यावरण और स्वास्थ्य की दृष्टि से घर के आँगन या बगीचे में नीम, आंवला, अमरूद, आम, अनार, नींबू, सहजन (मोरिंगा), करी पत्ता और अशोक जैसे पौधे लगाए जा सकते हैं। तुलसी को घर के मुख्य द्वार, आँगन या बालकनी में रखना लाभकारी माना जाता है।
वहीं पीपल, बरगद और पाकड़ जैसे विशाल वृक्षों को घर की नींव या दीवार के पास नहीं लगाना चाहिए क्योंकि उनकी जड़ें समय के साथ भवन को नुकसान पहुँचा सकती हैं। ऐसे वृक्ष पार्कों, विद्यालयों, मंदिर परिसरों, खेतों की मेड़ों और खुले सार्वजनिक स्थानों के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं।
सरकार की हरित भारत की दिशा में पहल
“एक पेड़ माँ के नाम” अभियान के साथ-साथ भारत सरकार राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम, ग्रीन इंडिया मिशन, नगर वन योजना, CAMPA, नमामि गंगे के तहत नदी किनारे वृक्षारोपण तथा मिशन LiFE (Lifestyle for Environment) जैसी अनेक योजनाओं के माध्यम से हरित क्षेत्र बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण को मजबूत करने का प्रयास कर रही है।
मानसून के दौरान देशभर में करोड़ों पौधे लगाए जाते हैं, जिससे वन एवं वृक्ष आवरण बढ़ाने में सहायता मिल रही है।
वन क्षेत्र और भारत की उपलब्धि
भारत विश्व के सबसे अधिक वन क्षेत्र वाले देशों में नौवें स्थान पर है, जबकि वन क्षेत्र में वार्षिक शुद्ध वृद्धि के मामले में तीसरे स्थान पर आता है। वर्तमान में देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 25 प्रतिशत भाग वन एवं वृक्ष आवरण से आच्छादित है। यह उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन बढ़ती आबादी और शहरीकरण को देखते हुए अभी और प्रयासों की आवश्यकता है।
भूजल संकट और वृक्षों की भूमिका
आज भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक लगातार गिरता भूजल स्तर है। अत्यधिक भूजल दोहन, अनियमित वर्षा, जल संरक्षण की कमी और तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है।
इस समस्या का समाधान भी प्रकृति में ही छिपा है। वर्षा जल संचयन (रेन वाटर हार्वेस्टिंग), तालाबों और झीलों का संरक्षण, अधिक से अधिक वृक्षारोपण, जल का विवेकपूर्ण उपयोग तथा ड्रिप एवं स्प्रिंकलर जैसी आधुनिक सिंचाई प्रणालियों को अपनाकर इस संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन से लड़ने का सबसे सरल उपाय
वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, वायु प्रदूषण और जैव विविधता के नुकसान जैसी चुनौतियों से निपटने में पेड़ सबसे प्रभावी प्राकृतिक हथियार हैं। वृक्ष कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर ऑक्सीजन छोड़ते हैं, वातावरण को ठंडा रखते हैं, भूजल का पुनर्भरण करते हैं और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखते हैं।
निष्कर्ष
“एक पेड़ माँ के नाम” केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि प्रकृति, संस्कृति और संवेदनाओं को जोड़ने वाला राष्ट्रीय संकल्प है। यदि प्रत्येक नागरिक अपनी माँ के नाम पर केवल एक पौधा लगाए और उसकी नियमित देखभाल करने का संकल्प ले, तो आने वाले वर्षों में भारत अधिक हरित, स्वच्छ और जल-संपन्न राष्ट्र बन सकता है।
एक छोटा-सा पौधा भविष्य की सबसे बड़ी विरासत बन सकता है। आइए, हम सभी अपनी माँ के सम्मान में एक पेड़ अवश्य लगाएँ, उसकी देखभाल करें और आने वाली पीढ़ियों को हरियाली, स्वच्छ पर्यावरण और सुरक्षित भविष्य का अमूल्य उपहार दें।

— धीरज कश्यप
लेखक एवं स्वतंत्र पत्रकार


