US Debt Crisis: पश्चिम एशिया में ईरान को लेकर बढ़ते सैन्य तनाव के बीच अमेरिका की आर्थिक स्थिति भी चिंता का विषय बनती जा रही है। एक ओर युद्ध अभियानों पर अरबों डॉलर खर्च हो रहे हैं तो दूसरी ओर अमेरिकी सरकार का कुल कर्ज रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। पिछले एक साल में अमेरिकी कर्ज में 3.2 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी हुई है, यानी औसतन हर महीने करीब 209 अरब डॉलर का नया कर्ज जुड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यही रफ्तार जारी रही तो अमेरिका का कुल कर्ज 2030 से पहले 50 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंच सकता है।
अमेरिका का कुल कर्ज 39.4 ट्रिलियन डॉलर के पार
ताजा आंकड़ों के अनुसार अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज (National Debt) बढ़कर 39.4 ट्रिलियन डॉलर हो चुका है। यह दुनिया में किसी भी देश का सबसे बड़ा सरकारी कर्ज है।
बीते 12 महीनों में इसमें 3.2 ट्रिलियन डॉलर का इजाफा हुआ है। वहीं 2020 के बाद से अब तक कुल कर्ज में 16.3 ट्रिलियन डॉलर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
अगर पिछले छह वर्षों का औसत देखें तो अमेरिका का कर्ज हर साल लगभग 2.5 ट्रिलियन डॉलर बढ़ा है। इसी गति से बढ़ोतरी जारी रही तो अगले कुछ वर्षों में यह आंकड़ा 50 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
हर महीने 209 अरब डॉलर बढ़ रहा कर्ज
सालाना 2.5 ट्रिलियन डॉलर की औसत बढ़ोतरी का मतलब है कि अमेरिका पर हर महीने लगभग 209 अरब डॉलर का अतिरिक्त कर्ज जुड़ रहा है।
यह स्थिति इसलिए भी गंभीर मानी जा रही है क्योंकि सरकार को विकास परियोजनाओं के साथ-साथ पुराने कर्ज पर ब्याज चुकाने के लिए भी लगातार नई उधारी लेनी पड़ रही है।
ब्याज भुगतान बना सबसे बड़ी चुनौती
अमेरिका की वित्तीय स्थिति पर सबसे बड़ा दबाव अब ब्याज भुगतान का है।
- 2020 से ब्याज भुगतान करीब 140% बढ़ चुका है।
- वार्षिक ब्याज भुगतान 711 अरब डॉलर से बढ़कर 1.22 ट्रिलियन डॉलर पहुंच गया है।
- यह अमेरिकी राष्ट्रीय बजट का लगभग 15% हिस्सा है।
- ब्याज भुगतान अब अमेरिका की GDP के करीब 3.2% के बराबर पहुंच चुका है, जो 1970 के दशक के बाद सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ब्याज दरें ऊंची बनी रहीं तो आने वाले वर्षों में सरकार की वित्तीय स्थिति पर और अधिक दबाव पड़ सकता है।
ट्रंप प्रशासन की कोशिशों का नहीं दिखा असर
सरकारी खर्च कम करने और राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए ट्रंप प्रशासन ने कई कदम उठाने की बात कही थी। हालांकि अब तक कर्ज की रफ्तार पर कोई बड़ा असर देखने को नहीं मिला है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि टैक्स में कटौती, बढ़ता रक्षा खर्च और लगातार बढ़ता बजट घाटा कर्ज बढ़ने के प्रमुख कारण बने हुए हैं।
ईरान से बढ़ता तनाव और बढ़ सकता है खर्च
पश्चिम एशिया में ईरान को लेकर सैन्य तनाव फिर बढ़ गया है। हाल के दिनों में अमेरिका ने ईरानी ठिकानों पर कई सैन्य कार्रवाई की है, जिससे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ी है।
विश्लेषकों के अनुसार सैन्य अभियानों के कारण रक्षा खर्च में लगातार इजाफा हो रहा है। इससे सरकार के वित्तीय दबाव में और बढ़ोतरी हो सकती है।
रिपोर्टों के मुताबिक पहले हुए सैन्य अभियान के दौरान अमेरिका ने रक्षा ऑपरेशन पर करीब 113 अरब डॉलर खर्च किए थे। यदि मौजूदा तनाव लंबा चलता है तो यह खर्च और बढ़ सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों पर भी असर
ईरान से जुड़े तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी दिखाई दे रहा है।
- पिछले एक सप्ताह में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 11% की तेजी आई।
- तेल एक महीने के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया।
- महंगे तेल से दुनिया भर में महंगाई बढ़ने की आशंका फिर तेज हो गई है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पश्चिम एशिया में संघर्ष लंबा खिंचता है तो तेल की कीमतों में और उछाल देखने को मिल सकता है।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इसलिए वहां का बढ़ता कर्ज पूरी वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर असर डाल सकता है।
यदि ब्याज भुगतान लगातार बढ़ता रहा और सरकार को अधिक उधारी लेनी पड़ी, तो:
- अमेरिकी बॉन्ड बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।
- वैश्विक ब्याज दरों पर असर पड़ सकता है।
- निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता घट सकती है।
- उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह प्रभावित हो सकता है।
निष्कर्ष
अमेरिका इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रहा है। एक तरफ पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और रक्षा खर्च का दबाव है, वहीं दूसरी ओर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका सरकारी कर्ज और उस पर बढ़ता ब्याज वित्तीय स्थिति को और कठिन बना रहा है। यदि आने वाले वर्षों में राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के लिए यह एक दीर्घकालिक आर्थिक चुनौती बन सकती है।


