Bihar Liquor Ban News: बिहार में लागू पूर्ण शराबबंदी को 10 साल पूरे होने के बाद अब इसकी प्रभावशीलता पर फिर से बहस तेज हो गई है। ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) ने दावा किया है कि शराबबंदी से सामाजिक लाभ अपेक्षा से कम मिले, जबकि राज्य को आर्थिक और प्रशासनिक स्तर पर बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। संगठन के अनुसार, बिहार सरकार ने पिछले एक दशक में करीब ₹60,000 करोड़ के उत्पाद शुल्क (Excise Duty) राजस्व का नुकसान झेला है। साथ ही अवैध शराब का कारोबार और तस्करी भी पूरी तरह खत्म नहीं हो सकी।
बिहार में कब लागू हुई थी शराबबंदी?
बिहार सरकार ने तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में 1 अप्रैल 2016 से देशी शराब और 5 अप्रैल 2016 से विदेशी शराब की बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध लागू किया था। यह फैसला महिलाओं, खासकर जीविका दीदियों की मांग पर लिया गया था। सरकार का उद्देश्य घरेलू हिंसा, अपराध और शराब की लत से जुड़े सामाजिक दुष्प्रभावों को कम करना था।
हालांकि, अब उद्योग संगठन BAI का कहना है कि 10 वर्षों के अनुभव के बाद इस नीति की व्यापक समीक्षा की जरूरत है।
BAI का दावा- शराबबंदी से नुकसान ज्यादा
भारत की प्रमुख बीयर कंपनियों का संगठन ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI), जिसमें एबी इनबेव, कार्ल्सबर्ग और यूनाइटेड ब्रुअरीज जैसी कंपनियां शामिल हैं, का कहना है कि बिहार में शराबबंदी अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर सकी।
BAI के महानिदेशक विनोद गिरी ने बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को लिखे पत्र में कहा कि राज्य को आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
उनके अनुसार, शराबबंदी के बावजूद शराब की खपत पूरी तरह बंद नहीं हुई, बल्कि इसका बड़ा हिस्सा अवैध नेटवर्क और तस्करी के जरिए संचालित होने लगा।
“शराब खत्म नहीं हुई, सिर्फ सरकार के नियंत्रण से बाहर चली गई”
BAI के पत्र में कहा गया है कि शराबबंदी ने वैध और नियंत्रित बाजार को समाप्त कर दिया, लेकिन अवैध शराब की समानांतर अर्थव्यवस्था तेजी से विकसित हो गई।
विनोद गिरी के अनुसार,
“शराब गायब नहीं हुई है, बल्कि सरकार के नियंत्रण से बाहर चली गई है। इससे अवैध कारोबार और तस्करी को बढ़ावा मिला है।”
संगठन का दावा है कि बिहार की सीमाओं से जुड़े राज्यों के जरिए शराब की तस्करी लगातार जारी है।
11.3 लाख केस और 17 लाख गिरफ्तारियां
ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक, वर्ष 2016 से अब तक शराबबंदी कानून के तहत:
- 11.3 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए।
- 17 लाख से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हुई।
- अवैध शराब की बरामदगी के मामले लगातार सामने आते रहे हैं।
संगठन का कहना है कि पुलिस और न्यायपालिका का बड़ा हिस्सा शराबबंदी कानून लागू कराने में व्यस्त रहता है, जबकि संगठित अवैध नेटवर्क लगातार सक्रिय हैं।
₹60,000 करोड़ के राजस्व नुकसान का दावा
BAI के अनुमान के अनुसार, बिहार सरकार ने पिछले 10 वर्षों में लगभग ₹60,000 करोड़ का उत्पाद शुल्क (Excise Revenue) खो दिया।
संगठन का कहना है कि इसका असर केवल सरकारी आय तक सीमित नहीं रहा, बल्कि:
- होटल उद्योग
- पर्यटन
- लॉजिस्टिक्स
- परिवहन
- आतिथ्य (Hospitality)
- सहायक उद्योग
जैसे कई क्षेत्रों पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ा।
BAI का यह भी कहना है कि बिहार पहले से ही देश के सबसे कम प्रति व्यक्ति आय वाले राज्यों में शामिल है और ऐसे में बड़े राजस्व स्रोत को छोड़ना वित्तीय दृष्टि से चुनौतीपूर्ण साबित हुआ।
BAI ने क्या सुझाव दिए?
ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने बिहार सरकार को शराबबंदी की जगह चरणबद्ध और सख्त नियामकीय मॉडल अपनाने का सुझाव दिया है। संगठन के प्रमुख प्रस्ताव इस प्रकार हैं:
- पहले चरण में केवल बीयर और वाइन जैसे कम अल्कोहल वाले पेय की सीमित अनुमति।
- बड़े शहरों और आर्थिक क्षेत्रों में नियंत्रित तरीके से शुरुआत।
- अल्कोहल प्रतिशत के आधार पर टैक्स प्रणाली लागू करना।
- नशामुक्ति और पुनर्वास कार्यक्रमों के लिए विशेष फंड बनाना।
- Women Welfare Cess के जरिए महिला सशक्तिकरण योजनाओं को वित्तीय सहायता देना।
- शराब उद्योग से जुड़े विनिर्माण क्षेत्र में 50% से अधिक रोजगार महिलाओं को देने का लक्ष्य।
सरकार की ओर से क्या प्रतिक्रिया?
फिलहाल बिहार सरकार की ओर से BAI के इस पत्र या सुझावों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। राज्य सरकार पहले भी कई बार यह कह चुकी है कि शराबबंदी से महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव आया है और अपराध तथा घरेलू हिंसा में कमी आई है।
हालांकि, शराबबंदी को लेकर समय-समय पर इसके आर्थिक प्रभाव, अवैध शराब कारोबार और कानून लागू करने की चुनौतियों पर बहस जारी रहती है।
निष्कर्ष
बिहार की शराबबंदी नीति एक दशक बाद फिर चर्चा के केंद्र में है। जहां राज्य सरकार इसे सामाजिक सुधार की दिशा में बड़ा कदम मानती रही है, वहीं ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया का दावा है कि इससे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले और राज्य को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस नीति की समीक्षा करती है या वर्तमान व्यवस्था को ही जारी रखती है।


