भारत में एल्युमिनियम स्क्रैप के बढ़ते आयात को लेकर उद्योग जगत ने सरकार से सख्त कदम उठाने की मांग की है। एल्युमिनियम एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAI) का कहना है कि यदि जल्द गुणवत्ता मानक लागू नहीं किए गए, तो भारत निम्न गुणवत्ता वाले एल्युमिनियम स्क्रैप का बड़ा डंपिंग ग्राउंड बन सकता है। एसोसिएशन ने BIS गुणवत्ता मानकों को तत्काल लागू करने, ग्रेड-आधारित HSN कोड लागू करने और लो-ग्रेड स्क्रैप पर आयात शुल्क बढ़ाने की मांग की है। उद्योग का मानना है कि इससे घरेलू विनिर्माण, उपभोक्ता सुरक्षा और ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को मजबूती मिलेगी।
सरकार से सख्त नियम लागू करने की मांग
एल्युमिनियम एसोसिएशन ऑफ इंडिया (AAI) ने वित्त मंत्रालय और खान मंत्रालय को ज्ञापन सौंपकर लंबे समय से लंबित BIS (भारतीय मानक ब्यूरो) के स्क्रैप गुणवत्ता मानकों को तुरंत अधिसूचित करने की अपील की है। संगठन का कहना है कि बिना गुणवत्ता जांच के निम्न स्तर का स्क्रैप आयात होने से भारतीय उद्योग की प्रतिस्पर्धा और उत्पादों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
क्यों बढ़ी चिंता?
AAI के अनुसार, एल्युमिनियम अब केवल एक धातु नहीं बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था का रणनीतिक संसाधन बन चुका है। इसकी मांग बिजली, परिवहन, इंफ्रास्ट्रक्चर, रक्षा, एयरोस्पेस, इलेक्ट्रॉनिक्स, पैकेजिंग, घरेलू बर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में घटिया स्क्रैप का अनियंत्रित आयात देश के लिए जोखिम पैदा कर सकता है।
AAI की प्रमुख मांगें
- BIS स्क्रैप गुणवत्ता मानकों को तत्काल अधिसूचित किया जाए।
- एल्युमिनियम स्क्रैप (HS 7602) के लिए ग्रेड-आधारित HSN कोड लागू किए जाएं।
- ग्रेड-3 से ग्रेड-7 तक के निम्न गुणवत्ता वाले स्क्रैप पर आयात शुल्क 7.5% किया जाए।
- नए नियम लागू होने तक 2.5% बेसिक कस्टम ड्यूटी (BCD) जारी रखी जाए।
- देश में स्क्रैप कलेक्शन और रीसाइक्लिंग नेटवर्क को मजबूत किया जाए, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो।
दूसरे देशों के उदाहरण भी दिए
एसोसिएशन का कहना है कि कई देश पहले ही अपने एल्युमिनियम उद्योग की सुरक्षा के लिए कड़े कदम उठा चुके हैं। अमेरिका ने सेक्शन-232 के तहत एल्युमिनियम उत्पादों पर शुल्क बढ़ाकर 50% कर दिया है। वहीं यूरोपीय संघ (EU) कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM) जैसे उपाय लागू कर रहा है। चीन और मलेशिया जैसे देश भी केवल उच्च गुणवत्ता वाले एल्युमिनियम स्क्रैप के आयात की अनुमति देते हैं।
AAI का दावा है कि कई देश अपने यहां बेहतर गुणवत्ता वाला स्क्रैप रोककर कम गुणवत्ता वाला स्क्रैप भारत जैसे बाजारों में भेज रहे हैं। यदि भारत में गुणवत्ता मानक लागू नहीं हुए तो यह लो-ग्रेड स्क्रैप का प्रमुख बाजार बन सकता है।
₹88,434 करोड़ का एल्युमिनियम आयात
एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में चैप्टर-76 के तहत एल्युमिनियम आयात 3,479 किलो टन प्रतिवर्ष (KTPA) के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। इस आयात पर करीब ₹88,434 करोड़ की विदेशी मुद्रा खर्च हुई।
इनमें केवल एल्युमिनियम स्क्रैप का आयात 2,028 KTPA रहा, जिसकी लागत ₹40,203 करोड़ रही। उद्योग का मानना है कि आयात पर इतनी बड़ी निर्भरता ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य के विपरीत है।
वेदांता, हिंडाल्को और नाल्को की बड़ी निवेश योजना
AAI के मुताबिक पिछले 10 वर्षों में भारतीय एल्युमिनियम उद्योग में करीब ₹1.5 लाख करोड़ का निवेश किया जा चुका है। अब वेदांता, हिंडाल्को और नाल्को जैसी कंपनियां मिलकर ₹3 लाख करोड़ से अधिक के नए निवेश की तैयारी कर रही हैं।
इन निवेशों के जरिए वित्त वर्ष 2033 तक देश की प्राथमिक एल्युमिनियम उत्पादन क्षमता लगभग 90 लाख टन प्रतिवर्ष (9 मिलियन टन) तक पहुंचने और 1 लाख से अधिक नए रोजगार सृजित होने की उम्मीद है।
उद्योग की उम्मीद
एल्युमिनियम उद्योग का मानना है कि यदि सरकार समय रहते BIS गुणवत्ता मानकों को लागू करती है, ग्रेड-आधारित HSN कोड लागू किए जाते हैं और निम्न गुणवत्ता वाले स्क्रैप के आयात पर नियंत्रण लगाया जाता है, तो भारत में जिम्मेदार रीसाइक्लिंग को बढ़ावा मिलेगा, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और भारतीय एल्युमिनियम उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धा भी मजबूत होगी।
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