तमिलनाडु में टेंडर सिस्टम में बड़ा बदलाव, सरकारी खर्च में आई भारी कमी
तमिलनाडु की नई सरकार ने सरकारी खर्च कम करने और प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (थलपति विजय) के नेतृत्व वाली सरकार ने सरकारी टेंडर प्रक्रिया में व्यापक बदलाव करते हुए ओपन कॉम्पिटिटिव बिडिंग (Open Competitive Bidding) लागू कर दी है। इसका असर अब सरकारी परियोजनाओं में साफ दिखाई देने लगा है।
नई व्यवस्था के तहत पहले जहां करोड़ों रुपये अतिरिक्त खर्च हो जाते थे, वहीं अब ठेके सरकारी अनुमानित लागत से 25 से 36 प्रतिशत तक कम कीमत पर दिए जा रहे हैं। इससे राज्य सरकार के खजाने में बड़ी बचत हो रही है और कर्ज के बोझ को कम करने की दिशा में मदद मिलने की उम्मीद है।
पहले कैसे होता था टेंडर आवंटन?
लंबे समय से सरकारी ठेकों पर कुछ चुनिंदा ठेकेदारों का दबदबा बना हुआ था। आरोप लगते रहे कि सीमित प्रतिस्पर्धा के कारण परियोजनाओं की लागत बढ़ जाती थी और कई मामलों में अनुमानित बजट से भी अधिक कीमत पर काम आवंटित किए जाते थे।
नई सरकार ने इस व्यवस्था को बदलते हुए सभी योग्य ठेकेदारों के लिए खुली प्रतिस्पर्धा का रास्ता खोल दिया है। अब अधिक कंपनियां और ठेकेदार बोली में हिस्सा ले रहे हैं, जिससे सरकार को कम कीमत पर बेहतर प्रस्ताव मिल रहे हैं।
₹25 लाख का प्रोजेक्ट सिर्फ ₹16-17 लाख में
इस नई नीति का सबसे बड़ा उदाहरण चेन्नई के अंबत्तूर क्षेत्र में देखने को मिला।
एक सड़क निर्माण परियोजना के लिए सरकार ने करीब ₹25 लाख का बजट तय किया था। खुली बोली में 9 ठेकेदारों ने भाग लिया और सभी ने अनुमानित लागत से कम कीमत की पेशकश की।
आखिरकार यह काम लगभग ₹16 से ₹17 लाख में आवंटित कर दिया गया। यानी केवल एक छोटे से प्रोजेक्ट में सरकार के करीब ₹9 लाख की बचत हुई।
अन्य इलाकों में भी कम कीमत पर मिले ठेके
नई टेंडर प्रणाली का असर केवल एक परियोजना तक सीमित नहीं रहा।
- तौंडियारपेट में ठेके अनुमानित लागत से लगभग 25% कम कीमत पर मिले।
- शोलिंगनल्लूर में कुछ बोलियां सरकारी अनुमान से 36% तक कम रहीं।
इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि प्रतिस्पर्धा बढ़ने के कारण सरकार को पहले की तुलना में काफी कम खर्च करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों ने उठाए पुराने सिस्टम पर सवाल
ग्रेटर चेन्नई कॉन्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रामा राव के अनुसार, पहले कई टेंडर सरकारी अनुमान से लगभग 10 प्रतिशत अधिक कीमत पर आवंटित होते थे।
उनका कहना है कि जिस काम के लिए पहले ₹25 लाख का टेंडर लगभग ₹27.5 लाख में दिया जाता था, वही काम अब करीब ₹16 लाख में पूरा कराया जा रहा है। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि पहले परियोजनाओं की लागत इतनी अधिक क्यों बढ़ाई जाती थी।
पिछली सरकारों पर भ्रष्टाचार के आरोप
तमिलनाडु के लोक निर्माण एवं खेल विकास मंत्री आधव अर्जुना ने पिछली सरकारों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि पहले टेंडर प्रक्रिया में नियमों का उल्लंघन, रिश्वतखोरी और केंद्रीकृत भ्रष्टाचार जैसी समस्याएं मौजूद थीं।
उन्होंने दावा किया कि कई ठेकेदारों से पैसे लेने के बावजूद उन्हें काम आवंटित नहीं किया गया, जिससे उनके साथ आर्थिक नुकसान हुआ।
मंत्री ने स्पष्ट कहा है कि वर्तमान सरकार में किसी भी ठेकेदार से कमीशन या रिश्वत नहीं ली जाएगी और सभी सरकारी ठेके पूरी पारदर्शिता के साथ दिए जाएंगे।
क्यों कम हो रही है परियोजनाओं की लागत?
राजनीतिक और वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि अब ठेकेदार पहले की तुलना में कम दरों पर बोली लगा पा रहे हैं क्योंकि उन्हें कथित तौर पर किसी प्रकार के अतिरिक्त अनौपचारिक भुगतान या कमीशन को अपनी लागत में शामिल नहीं करना पड़ रहा।
इसके परिणामस्वरूप सरकारी परियोजनाएं वास्तविक लागत के करीब कीमत पर आवंटित हो रही हैं और सरकार के करोड़ों रुपये बच रहे हैं।
तमिलनाडु की अर्थव्यवस्था को मिल सकता है फायदा
तमिलनाडु पर पहले से ही भारी कर्ज का बोझ है। ऐसे में यदि सरकारी परियोजनाओं में लगातार 25 से 30 प्रतिशत तक की बचत होती है तो इसका सीधा लाभ राज्य के वित्तीय प्रबंधन को मिलेगा।
बचाई गई राशि का उपयोग सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, जलापूर्ति और अन्य सार्वजनिक विकास योजनाओं में किया जा सकता है, जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति मजबूत होने की संभावना है।
आगे भी रहेंगी दो बड़ी चुनौतियां
हालांकि नई टेंडर व्यवस्था को सकारात्मक कदम माना जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों ने दो प्रमुख चुनौतियों की ओर भी ध्यान दिलाया है।
1. निर्माण गुणवत्ता बनाए रखना
यदि ठेकेदार बहुत कम कीमत पर काम लेते हैं तो मुनाफा कम होने की स्थिति में गुणवत्ता से समझौता होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए सरकार को मजबूत मॉनिटरिंग और ऑडिट व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी।
2. परियोजनाओं की गति बनाए रखना
भ्रष्टाचार पर सख्ती और अधिक जांच के कारण कई बार अधिकारी निर्णय लेने में सावधानी बरतते हैं, जिससे परियोजनाओं में देरी हो सकती है। सरकार को पारदर्शिता के साथ-साथ समय पर परियोजनाएं पूरी कराने पर भी समान ध्यान देना होगा।
निष्कर्ष
मुख्यमंत्री थलपति विजय की सरकार द्वारा लागू की गई नई टेंडर नीति तमिलनाडु के प्रशासनिक सुधारों की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। खुली प्रतिस्पर्धा के कारण सरकारी परियोजनाओं की लागत में उल्लेखनीय कमी आई है और राज्य के खजाने को बड़ी बचत हो रही है। हालांकि इस मॉडल की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कम लागत के साथ परियोजनाओं की गुणवत्ता और समयबद्ध क्रियान्वयन भी सुनिश्चित किया जा सके।


