Middle East Oil: ईरान युद्ध के बाद भारत बदलेगा ऑयल इंपोर्ट मॉडल, स्पॉट मार्केट और नए सप्लायर देशों पर रहेगा फोकस
नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में हालिया तनाव और ईरान-इजरायल संघर्ष के दौरान ऊर्जा आपूर्ति पर पड़े असर ने भारत को अपनी तेल आयात रणनीति पर नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। अब संकेत मिल रहे हैं कि भारत आने वाले समय में मिडिल ईस्ट (खाड़ी देशों) पर अपनी निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा कदम उठा सकता है।
सरकारी तेल रिफाइनरी कंपनियां अब केवल लंबे समय के कॉन्ट्रैक्ट पर निर्भर रहने के बजाय स्पॉट मार्केट, वैश्विक ट्रेडिंग कंपनियों और नए तेल उत्पादक देशों से खरीद बढ़ाने की रणनीति तैयार कर रही हैं। इससे भविष्य में किसी भू-राजनीतिक संकट के दौरान सप्लाई बाधित होने का खतरा कम होगा।
युद्ध ने दिखाई ऊर्जा सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती
ईरान युद्ध के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से गुजरने वाले जहाजों पर बढ़े खतरे ने भारत समेत कई देशों की चिंता बढ़ा दी थी। भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा लंबे समय से मध्य पूर्व के देशों से आता रहा है।
संघर्ष के दौरान कच्चे तेल और LPG की सप्लाई पर दबाव बना, जिससे कीमतों में तेजी आई और रिफाइनरी कंपनियों की लागत भी बढ़ गई। इसी अनुभव के बाद सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां सप्लाई के स्रोतों में विविधता लाने पर जोर दे रही हैं।
लंबे कॉन्ट्रैक्ट पर घट सकती है निर्भरता
सूत्रों के अनुसार, सरकारी रिफाइनरी कंपनियां अब खाड़ी देशों के साथ होने वाले लॉन्ग-टर्म ऑयल कॉन्ट्रैक्ट के तहत खरीदी जाने वाली मात्रा कम करने पर विचार कर रही हैं।
नई रणनीति के तहत कंपनियां:
- स्पॉट मार्केट से अधिक खरीद करेंगी।
- अंतरराष्ट्रीय ट्रेडिंग हाउस के साथ सप्लाई समझौते बढ़ाएंगी।
- अलग-अलग क्षेत्रों से कच्चा तेल खरीदकर जोखिम कम करेंगी।
- सप्लाई बाधित होने की स्थिति में वैकल्पिक स्रोतों को सक्रिय रखेंगी।
इस मॉडल से किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता कम होगी और संकट के समय भी तेल की उपलब्धता बनी रह सकेगी।
भारत हर दिन आयात करता है करीब 50 लाख बैरल तेल
भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है। देश प्रतिदिन लगभग 50 लाख बैरल कच्चे तेल का आयात करता है।
सरकारी कंपनियां जैसे:
- इंडियन ऑयल (IOC)
- भारत पेट्रोलियम (BPCL)
- हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL)
आमतौर पर अपनी कुल जरूरत का लगभग आधा तेल लंबे समय के समझौतों के जरिए खरीदती हैं, जबकि शेष मात्रा स्पॉट मार्केट से ली जाती है।
अब इसी अनुपात में बदलाव की संभावना जताई जा रही है।
रूस से मिली राहत, लेकिन रणनीति होगी और व्यापक
रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदने की सुविधा ने पिछले कुछ वर्षों में भारत को काफी राहत दी है। इससे आयात लागत कम रखने में मदद मिली।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल रूस पर निर्भर रहना भी दीर्घकालिक समाधान नहीं है। इसलिए भारत अब कई नए देशों से तेल खरीद बढ़ाने की तैयारी कर रहा है।
इन देशों में प्रमुख रूप से शामिल हैं:
- अमेरिका
- ब्राजील
- गुयाना
- अन्य लैटिन अमेरिकी उत्पादक देश
इस रणनीति का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर सप्लाई नेटवर्क को मजबूत बनाना है।
संकट के दौरान सक्रिय हुई भारतीय कूटनीति
ऊर्जा आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए भारत ने युद्ध के दौरान कूटनीतिक स्तर पर भी तेजी से कदम उठाए।
सूत्रों के मुताबिक:
- ईरान से संपर्क कर LPG टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने की कोशिश की गई।
- खाड़ी देशों के वरिष्ठ अधिकारियों से लगातार बातचीत हुई।
- विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने संयुक्त अरब अमीरात का दौरा किया।
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यूएई की यात्रा की।
- राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने सऊदी अरब का दौरा किया।
- पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने कतर के साथ ऊर्जा आपूर्ति पर चर्चा की।
इन प्रयासों का उद्देश्य भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति को बिना बाधा जारी रखना था।
ट्रेडिंग डेस्क बनाने की तैयारी
भारत की सबसे बड़ी रिफाइनरी इंडियन ऑयल अपनी खरीद प्रक्रिया को अधिक आधुनिक बनाने के लिए वैश्विक ट्रेडिंग कंपनी विटोल ग्रुप के साथ ट्रेडिंग डेस्क स्थापित करने पर भी काम कर रही है।
इससे कंपनी को:
- बेहतर कीमत पर खरीद,
- वैश्विक बाजार की तेज निगरानी,
- जोखिम प्रबंधन,
- और सप्लाई में अधिक लचीलापन मिलेगा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह भारतीय तेल खरीद प्रणाली में बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
रणनीतिक रिजर्व भी होगा मजबूत
तेल आयात रणनीति में बदलाव के साथ-साथ भारत कच्चे तेल, LPG और LNG का बड़ा रणनीतिक भंडार (Strategic Reserve) तैयार करने की योजना पर भी काम कर रहा है।
प्रस्तावित योजना के अनुसार यह भंडार इतना बड़ा होगा कि:
- देश की लगभग एक महीने की घरेलू मांग पूरी की जा सके।
- वैश्विक संकट या युद्ध की स्थिति में ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित न हो।
- आयात में अस्थायी रुकावट आने पर भी घरेलू बाजार स्थिर रहे।
इसके लिए पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जो संभावित स्थानों, स्टोरेज क्षमता और संचालन मॉडल पर अध्ययन कर रही है।
भारत के लिए क्यों अहम है यह बदलाव?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की नई रणनीति केवल सस्ता तेल खरीदने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि इसका मुख्य उद्देश्य ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को मजबूत करना होगा।
यदि भारत कई देशों से तेल खरीदने, स्पॉट मार्केट का बेहतर उपयोग करने और रणनीतिक भंडार बढ़ाने में सफल रहता है, तो भविष्य में किसी युद्ध, प्रतिबंध या वैश्विक आपूर्ति संकट का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर अपेक्षाकृत कम पड़ेगा।
निष्कर्ष
पश्चिम एशिया में हालिया संघर्ष ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता ऊर्जा सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकती है। इसी अनुभव के आधार पर भारत अब अपनी तेल आयात नीति में बड़ा बदलाव करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यदि यह रणनीति सफल रहती है तो देश की ऊर्जा आपूर्ति अधिक सुरक्षित, लचीली और वैश्विक जोखिमों के प्रति बेहतर तैयार होगी।


