Power Crisis Threat: गर्मी और कमजोर मॉनसून ने बढ़ाई बिजली की चुनौती, सरकार ने बनाया इमरजेंसी प्लान
नई दिल्ली: देश में लगातार बनी उमस भरी गर्मी और दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की धीमी रफ्तार बिजली व्यवस्था के लिए नई चुनौती बनती जा रही है। पिछले दो सप्ताह के दौरान भारत की पीक पावर डिमांड (सबसे अधिक बिजली मांग) अधिकांश दिनों में 250 गीगावाट (GW) से ऊपर दर्ज की गई। शनिवार को यह मांग बढ़कर 264.8 GW तक पहुंच गई, जबकि रविवार को भी 250.6 GW के स्तर पर बनी रही।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में बारिश सामान्य से कम रहती है तो एयर कंडीशनर, कूलर, सिंचाई पंप और औद्योगिक गतिविधियों के कारण बिजली की मांग और तेज हो सकती है। ऐसे में सरकार पहले से ही बिजली आपूर्ति बनाए रखने के लिए कई वैकल्पिक योजनाओं पर काम कर रही है।
Highlights
- पिछले दो सप्ताह से पीक पावर डिमांड लगातार 250 GW से ऊपर।
- शनिवार को बिजली की मांग 264.8 GW तक पहुंची।
- कमजोर मॉनसून से अगस्त-सितंबर में बिजली खपत और बढ़ सकती है।
- जरूरत पड़ने पर गैस आधारित और कोयला आधारित बिजली संयंत्रों का उपयोग बढ़ाया जाएगा।
- थर्मल पावर प्लांट्स में फिलहाल पर्याप्त कोयला स्टॉक उपलब्ध।
अगले तीन महीने रहेंगे चुनौतीपूर्ण
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, मॉनसून सीजन के अगले तीन महीनों के दौरान देश की पीक बिजली मांग 247 GW से 278 GW के बीच रहने का अनुमान है। यदि बारिश सामान्य से कम होती है तो यह मांग अनुमान से भी अधिक हो सकती है।
बिजली मंत्रालय लगातार मौसम विभाग और ग्रिड कंट्रोलर ऑफ इंडिया के साथ मिलकर वर्षा के अनुमान की निगरानी कर रहा है ताकि बिजली उत्पादन और वितरण पर संभावित असर का समय रहते आकलन किया जा सके।
मॉनसून कमजोर रहा तो क्यों बढ़ेगी बिजली की मांग?
ऊर्जा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पर्याप्त बारिश नहीं होती है तो:
- लंबे समय तक एयर कंडीशनर और कूलर चलते रहेंगे।
- किसानों को सिंचाई के लिए अधिक बिजली की जरूरत पड़ेगी।
- जलाशयों में पानी कम होने से जलविद्युत उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
- उद्योगों और घरेलू उपभोक्ताओं की बिजली खपत ऊंचे स्तर पर बनी रहेगी।
इसी वजह से अगस्त और सितंबर में बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच सकती है।
IMD ने क्या अनुमान लगाया है?
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने जून से सितंबर के दक्षिण-पश्चिम मॉनसून के दौरान सामान्य औसत (Long Period Average) का लगभग 90% वर्षा होने का अनुमान जताया है। यदि यह अनुमान सही साबित होता है तो कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश देखने को मिल सकती है।
कम बारिश का सीधा असर बिजली उत्पादन, सिंचाई और ऊर्जा मांग पर पड़ सकता है।
सरकार ने बनाया इमरजेंसी प्लान
बिजली मंत्रालय ने बिजली संकट से बचने के लिए पहले से कई तैयारियां शुरू कर दी हैं।
सरकार के पास मौजूद प्रमुख विकल्प:
- जरूरत पड़ने पर कोयला आधारित बिजली संयंत्रों का निर्धारित मेंटेनेंस आगे बढ़ाया जा सकता है।
- नॉन-सोलर घंटों में अतिरिक्त बिजली उत्पादन कराया जाएगा।
- ग्रिड की लगातार निगरानी की जाएगी।
- राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाया जाएगा ताकि कहीं भी बिजली आपूर्ति बाधित न हो।
गैस आधारित पावर प्लांट भी चलाए जा सकते हैं
यदि बिजली की मांग बहुत अधिक बढ़ती है तो सरकार इलेक्ट्रिसिटी एक्ट के विशेष प्रावधानों के तहत गैस आधारित बिजली संयंत्रों को अधिक क्षमता पर संचालित करने का निर्देश दे सकती है।
देश में लगभग 25 GW क्षमता वाले गैस आधारित पावर प्लांट मौजूद हैं। हालांकि महंगी आयातित प्राकृतिक गैस के कारण ये संयंत्र सामान्य दिनों में कम क्षमता पर चलते हैं। सरकार जरूरत पड़ने पर अतिरिक्त लागत की भरपाई का भी प्रावधान कर सकती है।
कोयले का स्टॉक फिलहाल पर्याप्त
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, देश के अधिकांश थर्मल पावर स्टेशनों पर फिलहाल पर्याप्त मात्रा में कोयले का भंडार मौजूद है।
बिजली उत्पादक कंपनियां, ट्रांसमिशन एजेंसियां और ग्रिड ऑपरेटर मिलकर पूरे मॉनसून सीजन में निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की तैयारी कर रहे हैं।
इस साल पहले ही बन चुके हैं कई रिकॉर्ड
साल 2026 में लंबी चली हीटवेव के कारण देश में बिजली की मांग लगातार नए रिकॉर्ड बना रही है।
मई महीने में भारत ने 270.1 GW की अब तक की सबसे अधिक पीक पावर डिमांड सफलतापूर्वक पूरी की थी। अब यदि मॉनसून कमजोर रहता है तो आने वाले महीनों में यह रिकॉर्ड भी टूट सकता है।
क्या आम लोगों पर पड़ेगा असर?
फिलहाल सरकार ने बिजली कटौती जैसी किसी स्थिति की आशंका नहीं जताई है। हालांकि यदि गर्मी और कम बारिश का दौर लंबे समय तक जारी रहता है तो कुछ राज्यों में स्थानीय स्तर पर बिजली पर दबाव बढ़ सकता है।
सरकार का कहना है कि पर्याप्त कोयला भंडार, गैस आधारित संयंत्रों की उपलब्धता और ग्रिड प्रबंधन के जरिए बिजली आपूर्ति सामान्य बनाए रखने की पूरी तैयारी की गई है।


