SEBI Anchor Investors Study: IPO में एंकर निवेशकों को बड़े और भरोसेमंद संस्थागत निवेशकों के तौर पर देखा जाता है। आमतौर पर माना जाता है कि लॉक-इन पीरियड खत्म होने के बाद एंकर निवेशक शेयर बेच सकते हैं, लेकिन क्या वे अनलॉक होते ही अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच देते हैं? बाजार नियामक SEBI की 242 मेनबोर्ड IPO पर की गई स्टडी ने इस सवाल का जवाब दिया है।
स्टडी के मुताबिक, एंकर निवेशकों की बिक्री लॉक-इन खत्म होते ही अचानक नहीं बढ़ती, बल्कि समय के साथ धीरे-धीरे बढ़ती है। शुरुआती अनलॉक के करीब 30 दिन बाद उनकी कुल बिक्री लगभग 3.2% रही। 60 दिन बाद यह करीब 8% और 90 दिन बाद लगभग 17.3% तक पहुंच गई।
लंबी अवधि के आंकड़ों में बिक्री का यह ट्रेंड और स्पष्ट दिखाई देता है। 2024 के अंत तक लिस्ट हुए 167 IPO के विश्लेषण में SEBI ने पाया कि अलॉटमेंट के 30 दिन बाद एंकर निवेशकों की बिक्री करीब 4%, 60 दिन बाद 9%, 90 दिन बाद 19%, 180 दिन बाद 34% और एक साल बाद करीब 51% तक पहुंच गई।
कौन होते हैं एंकर निवेशक?
एंकर निवेशक बड़े संस्थागत निवेशक होते हैं, जिन्हें क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर्स (QIBs) की श्रेणी में रखा जाता है। IPO खुलने से पहले कंपनी कुछ शेयर इन निवेशकों को आवंटित करती है। यह आवंटन आमतौर पर बुक रनिंग लीड मैनेजर्स (BRLMs) की सलाह के बाद किया जाता है।
IPO से पहले बड़े संस्थागत निवेशकों की भागीदारी को बाजार में कंपनी के इश्यू के प्रति संस्थागत भरोसे के संकेत के तौर पर देखा जाता है। इससे IPO की बुक-बिल्डिंग प्रक्रिया के दौरान निवेशकों का भरोसा और मांग मजबूत होने में मदद मिल सकती है।
एंकर निवेश में FPIs और म्यूचुअल फंड्स का दबदबा
SEBI की स्टडी के मुताबिक, एंकर अलॉटमेंट में सबसे बड़ी हिस्सेदारी फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) और म्यूचुअल फंड्स की रही।
कुल एंकर अलॉटमेंट की वैल्यू में FPIs की हिस्सेदारी करीब 43.8% थी, जबकि म्यूचुअल फंड्स की हिस्सेदारी 38.5% रही। इसके बाद इंश्योरेंस कंपनियों और बैंकों जैसे अन्य QIBs की हिस्सेदारी करीब 10.5% रही।
वहीं, अल्टरनेटिव इन्वेस्टमेंट फंड्स यानी AIFs की हिस्सेदारी करीब 5.3% रही। बॉडी कॉरपोरेट्स की हिस्सेदारी काफी कम रही।
छोटे IPO में तस्वीर क्यों अलग रही?
SEBI के विश्लेषण में IPO के आकार और एंकर निवेशकों की कैटेगरी के बीच भी अंतर दिखाई दिया। छोटे IPO में AIFs, दूसरे QIBs और बॉडी कॉरपोरेट्स की एंकर हिस्सेदारी अपेक्षाकृत ज्यादा रही।
जैसे-जैसे IPO का आकार बढ़ा, इन निवेशक कैटेगरी की हिस्सेदारी कम होती गई। खासकर 1,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के बड़े IPO में एंकर अलॉटमेंट मुख्य रूप से FPIs और म्यूचुअल फंड्स के बीच बंटा रहा।
ऐसे बड़े इश्यू में FPIs की हिस्सेदारी करीब 45% से 47% और म्यूचुअल फंड्स की हिस्सेदारी करीब 38% से 42% रही। अन्य QIBs के पास लगभग 9% से 12% हिस्सा रहा।
लॉक-इन खत्म होते ही बड़ी बिकवाली नहीं
SEBI के आंकड़ों से एक अहम बात सामने आती है कि एंकर निवेशक लॉक-इन खत्म होते ही पूरी हिस्सेदारी बेचने की जल्दबाजी नहीं करते।
पहले अनलॉक के करीब 30 दिन बाद उनकी कुल एग्जिट सिर्फ 3.2% रही। 60 दिन बाद यह लगभग 8% और 90 दिन बाद करीब 17.3% हो गई।
इसका मतलब है कि शुरुआती अनलॉक विंडो के बाद भी एंकर निवेशकों के पास उनकी ज्यादातर हिस्सेदारी बनी रहती है। हालांकि, समय बीतने के साथ बिक्री लगातार बढ़ती जाती है।
छोटे IPO में एंकर निवेशकों की बिक्री ज्यादा
SEBI को IPO के आकार और एंकर निवेशकों की बिक्री के बीच उल्टा संबंध भी मिला। यानी छोटे IPO में एंकर निवेशकों की बिक्री अपेक्षाकृत ज्यादा रही।
0 से 250 करोड़ रुपये के IPO में 30 दिन बाद एंकर निवेशकों की बिक्री करीब 9.1% रही। 60 दिन बाद यह बढ़कर 20.3% और 90 दिन बाद करीब 32.4% हो गई।
यह बड़े साइज के IPO की तुलना में काफी ज्यादा बिक्री थी। इससे संकेत मिलता है कि छोटे इश्यू में एंकर निवेशकों का एग्जिट पैटर्न बड़े IPO से अलग हो सकता है।
FPIs ने म्यूचुअल फंड्स से ज्यादा शेयर बेचे
एंकर निवेशकों की अलग-अलग कैटेगरी के बिक्री पैटर्न में भी अंतर दिखाई दिया। SEBI के मुताबिक, पहली एग्जिट विंडो में FPIs ने अपनी एंकर अलॉटमेंट का करीब 3% हिस्सा बेचा।
60 दिन बाद FPIs की कुल बिक्री करीब 9% और दूसरी एग्जिट विंडो के बाद करीब 20% तक पहुंच गई।
इसके मुकाबले म्यूचुअल फंड्स की बिक्री कम रही। पहली एग्जिट विंडो में उनकी बिक्री करीब 3%, 60 दिन बाद 7% और दूसरी एग्जिट विंडो के बाद करीब 15% रही।
SEBI ने पाया कि हर फेज में FPIs का मीडियन एग्जिट प्रतिशत म्यूचुअल फंड्स से ज्यादा था। FPIs की बिक्री में उतार-चढ़ाव की रेंज भी म्यूचुअल फंड्स की तुलना में ज्यादा रही।
एक साल में करीब आधी एंकर अलॉटमेंट बिक गई
लंबी अवधि के आंकड़े इस पूरी तस्वीर को और बेहतर तरीके से समझाते हैं। SEBI ने 2024 के अंत तक लिस्ट हुए 167 IPOs का लंबी अवधि के आधार पर विश्लेषण किया।
इसमें एंकर निवेशकों की बिक्री का पैटर्न इस तरह रहा:
| अलॉटमेंट के बाद अवधि | एंकर निवेशकों की कुल बिक्री |
|---|---|
| 30 दिन | करीब 4% |
| 60 दिन | करीब 9% |
| 90 दिन | करीब 19% |
| 180 दिन | करीब 34% |
| 1 साल | करीब 51% |
यानी एक साल पूरा होने तक एंकर निवेशकों की शुरुआती अलॉटमेंट का करीब 51% हिस्सा बिक चुका था।
इससे साफ होता है कि शुरुआती अनलॉक के दौरान दिखाई देने वाली बिक्री, एंकर निवेशकों की पूरी एग्जिट का सिर्फ एक हिस्सा होती है। उनकी बिक्री अगले कई महीनों तक जारी रह सकती है।
एक साल बाद FPIs की बिक्री सबसे ज्यादा
एक साल के आंकड़ों में FPIs सबसे बड़े सेलर के तौर पर सामने आए। उन्होंने अपनी कुल एंकर अलॉटमेंट का करीब 60% हिस्सा बेच दिया था।
इसके बाद बॉडी कॉरपोरेट्स ने करीब 58%, AIFs ने 55% और अन्य QIBs ने करीब 46% हिस्सा बेचा।
म्यूचुअल फंड्स की बिक्री सबसे कम रही। उन्होंने एक साल के बाद अपनी शुरुआती एंकर अलॉटमेंट का करीब 38% हिस्सा बेचा था।
यानी एक साल के स्तर पर FPIs और म्यूचुअल फंड्स के बिक्री पैटर्न में बड़ा अंतर दिखाई दिया।
एंकर निवेशकों की बिक्री का शेयर कीमत पर असर
SEBI के विश्लेषण में एंकर निवेशकों की बिक्री और शेयर की कीमत के प्रदर्शन के बीच संबंध का भी अध्ययन किया गया। इसमें संकेत मिला कि जब पहली अनलॉक विंडो में एंकर निवेशकों की बिक्री ज्यादा होती है, तो शेयर के प्रदर्शन पर निगेटिव असर पड़ सकता है।
खास तौर पर जिन मामलों में पहली अनलॉक विंडो में एंकर हिस्सेदारी की बिक्री 10% से ज्यादा रही, वहां यह संबंध ज्यादा स्पष्ट दिखाई दिया।
इन मामलों में FPIs सबसे बड़े सेलर रहे। उनकी औसत बिक्री करीब 24.5% रही, जबकि म्यूचुअल फंड्स की औसत बिक्री करीब 11.5% थी।
हालांकि, 90 दिन वाली अनलॉक विंडो में शेयर की कीमत पर असर आमतौर पर 30 दिन वाली विंडो की तुलना में कम रहा।
निवेशकों के लिए क्या है इसका मतलब?
SEBI की स्टडी से यह समझने में मदद मिलती है कि एंकर लॉक-इन खत्म होना अपने आप में यह संकेत नहीं है कि एंकर निवेशक तुरंत भारी बिकवाली करेंगे।
शुरुआती दिनों में बिक्री सीमित रह सकती है, लेकिन अगले कुछ महीनों में धीरे-धीरे एग्जिट बढ़ सकती है। एक साल के आंकड़े में करीब आधी शुरुआती अलॉटमेंट बिक जाना बताता है कि एंकर निवेशकों की बिक्री को केवल पहले अनलॉक की तारीख से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं है।
खासकर किसी IPO के शेयर में निवेश करने वाले निवेशकों के लिए एंकर होल्डिंग, लॉक-इन की समाप्ति, संस्थागत निवेशकों की बिक्री और कंपनी के फंडामेंटल्स को एक साथ देखना जरूरी है। केवल एंकर निवेशकों की संभावित बिकवाली के आधार पर किसी शेयर में निवेश या बिक्री का फैसला करना उचित नहीं होगा।
डिस्क्लेमर: यह खबर केवल जानकारी के उद्देश्य से है। इसे किसी भी स्टॉक में खरीदारी या बिकवाली की सलाह न समझें। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। किसी भी निवेश का निर्णय लेने से पहले अपनी रिसर्च करें और जरूरत पड़ने पर वित्तीय सलाहकार से सलाह लें।


