भारत में इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आने वाले वर्षों में देश का अगला बड़ा एनर्जी बिजनेस किस क्षेत्र में होगा? क्या भविष्य इलेक्ट्रिक कारों का है या फिर उन बैटरियों का, जो इन वाहनों और एनर्जी स्टोरेज सिस्टम को ताकत देंगी?
इसी सवाल का जवाब तलाशने के लिए जिरोधा के को-फाउंडर निखिल कामथ ने चीनी बैटरी एक्सपर्ट्स के साथ चर्चा की। उनके पॉडकास्ट People by WTF में EnerVenue के CEO हेनिंग राथ और HiNa Battery के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन कुन तांग ने बैटरी टेक्नोलॉजी के भविष्य, सुरक्षा और भारत के लिए संभावनाओं पर अपनी राय रखी।
बातचीत में लिथियम-आयन बैटरी के साथ-साथ सोडियम-आयन और निकेल बेस्ड बैटरी जैसी नई टेक्नोलॉजी पर भी चर्चा हुई। एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत को अपनी जरूरतों और घरेलू संसाधनों को ध्यान में रखते हुए बैटरी इंडस्ट्री विकसित करनी होगी।
लिथियम बैटरी क्यों बनी EV इंडस्ट्री की रीढ़?
आज इलेक्ट्रिक वाहनों में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली बैटरी टेक्नोलॉजी में लिथियम-आयरन-फॉस्फेट (LFP) बैटरी प्रमुख है। दुनिया की बड़ी EV कंपनियां जैसे टेस्ला और BYD भी इसका इस्तेमाल करती हैं।
लिथियम बैटरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी हाई एनर्जी डेंसिटी है। इसका मतलब है कि कम वजन और कम जगह में ज्यादा ऊर्जा स्टोर की जा सकती है। यही वजह है कि यह इलेक्ट्रिक कारों के लिए पसंदीदा विकल्प बनी हुई है।
हालांकि, इस टेक्नोलॉजी के साथ सुरक्षा एक बड़ी चुनौती है। बैटरी में ज्यादा ऊर्जा स्टोर होने की वजह से तापमान बढ़ने पर खतरा पैदा हो सकता है।
EnerVenue के CEO हेनिंग राथ ने बातचीत में थर्मल रनअवे की समस्या को समझाया। इसमें बैटरी का तापमान एक सीमा पार करने के बाद अंदर की रासायनिक प्रक्रिया तेजी से बढ़ने लगती है, जिसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। यही स्थिति आग लगने जैसी घटनाओं का कारण बन सकती है।
LFP बैटरी में आग की घटनाएं बनी चिंता
HiNa Battery के चेयरमैन कुन तांग ने बैटरी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। उनके मुताबिक, 2025 में दुनियाभर में LFP बैटरी में आग लगने के 14,000 से ज्यादा मामले सामने आए।
उन्होंने कहा कि बैटरी में ज्यादा ऊर्जा स्टोर करने की क्षमता के साथ सुरक्षा चुनौती भी बढ़ती है। उनके अनुसार, बैटरी की सुरक्षा सिर्फ उसकी केमिस्ट्री पर निर्भर नहीं करती बल्कि मैन्युफैक्चरिंग क्वालिटी भी अहम भूमिका निभाती है।
उनका कहना था कि बड़ी कंपनियां जैसे CATL और BYD बेहतर क्वालिटी कंट्रोल और रिसर्च पर ज्यादा निवेश करती हैं, इसलिए उनकी बैटरियों की कीमत ज्यादा होती है।
सोडियम-आयन बैटरी: भारत के लिए क्यों बन सकती है बड़ा मौका?
लिथियम बैटरी के विकल्प के तौर पर सोडियम-आयन बैटरी तेजी से चर्चा में आ रही है।
इस टेक्नोलॉजी का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इसमें इस्तेमाल होने वाला सोडियम आसानी से उपलब्ध है और इसकी कीमत लिथियम से काफी कम है। कुन तांग के मुताबिक, सोडियम की कीमत लिथियम की तुलना में लगभग 10 गुना कम हो सकती है।
भारत जैसे देश के लिए यह तकनीक इसलिए महत्वपूर्ण हो सकती है क्योंकि इससे बैटरी निर्माण के लिए दूसरे देशों पर निर्भरता कम की जा सकती है।
सोडियम-आयन बैटरी में सोडियम, आयरन और फॉस्फेट जैसे कच्चे माल का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिन्हें घरेलू स्तर पर हासिल किया जा सकता है।
सोडियम बैटरी की सीमाएं भी हैं
हालांकि सोडियम-आयन बैटरी हर मामले में लिथियम का विकल्प नहीं बन सकती।
इसकी सबसे बड़ी कमी इसकी कम एनर्जी डेंसिटी है। यानी समान वजन और आकार में यह लिथियम बैटरी की तुलना में कम ऊर्जा स्टोर करती है।
इस कारण लंबी दूरी तय करने वाली इलेक्ट्रिक कारों में इसका इस्तेमाल फिलहाल सीमित रह सकता है।
लेकिन जहां ज्यादा रेंज की जरूरत नहीं है, वहां यह काफी उपयोगी साबित हो सकती है।
इसके संभावित इस्तेमाल:
- इलेक्ट्रिक स्कूटर
- तीन पहिया वाहन
- ग्रिड एनर्जी स्टोरेज
- सोलर और विंड एनर्जी स्टोरेज सिस्टम
भारत में टू-व्हीलर और थ्री-व्हीलर EV का बड़ा बाजार है, इसलिए सोडियम-आयन बैटरी यहां बड़ी भूमिका निभा सकती है।
निकेल बेस्ड बैटरी भी बन सकती है विकल्प
EnerVenue के CEO हेनिंग राथ ने निकेल बेस्ड बैटरी टेक्नोलॉजी के बारे में भी जानकारी दी।
इस बैटरी में पानी वाले इलेक्ट्रोलाइट का इस्तेमाल किया जाता है। यह तकनीक उस सिस्टम से विकसित हुई है जिसका इस्तेमाल पहले NASA जैसे संस्थानों में किया जाता था।
इसका मुख्य फायदा सुरक्षा और लंबी लाइफ है। कंपनी के मुताबिक, इस तरह की बैटरी को करीब 30,000 चार्ज साइकल के लिए डिजाइन किया गया है।
हालांकि, इसकी भी एक सीमा है। फिलहाल इसे इलेक्ट्रिक वाहनों के बजाय स्थिर एनर्जी स्टोरेज के लिए ज्यादा उपयुक्त माना जा रहा है।
भारत के लिए कौन-सी बैटरी टेक्नोलॉजी होगी बेहतर?
निखिल कामथ और चीनी विशेषज्ञों की बातचीत से एक बात साफ होती है कि भविष्य में सिर्फ एक ही बैटरी टेक्नोलॉजी का दबदबा नहीं होगा।
अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से अलग बैटरियों का इस्तेमाल होगा।
- लंबी दूरी वाली इलेक्ट्रिक कारों के लिए लिथियम बैटरी मजबूत विकल्प बनी रह सकती है।
- कम दूरी वाले EV और एनर्जी स्टोरेज के लिए सोडियम-आयन बैटरी बेहतर विकल्प बन सकती है।
- बड़े स्तर के स्टोरेज सिस्टम के लिए निकेल बेस्ड बैटरी उपयोगी हो सकती है।
भारत अगर अपनी बैटरी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता बढ़ाता है और घरेलू संसाधनों पर आधारित टेक्नोलॉजी विकसित करता है, तो बैटरी सेक्टर देश के लिए अगला बड़ा एनर्जी बिजनेस बन सकता है।
संभावना यह है कि आने वाले वर्षों में EV से ज्यादा बड़ा अवसर EV को चलाने वाली बैटरी इंडस्ट्री में देखने को मिल सकता है।


