नई दिल्ली। एक समय देश के सबसे बड़े उद्योगपतियों में गिने जाने वाले अनिल अंबानी के लिए एक बार फिर मुश्किलें बढ़ गई हैं। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर (Reliance Infrastructure) और अनिल अंबानी की उस सेटलमेंट याचिका को खारिज कर दिया है, जो कथित तौर पर ₹6,526 करोड़ के फंड के गलत इस्तेमाल से जुड़े मामले में दायर की गई थी। यह हाल के महीनों में अनिल अंबानी को मिला दूसरा बड़ा झटका है। इससे पहले यस बैंक निवेश मामले में भी सेबी उनकी सेटलमेंट अर्जी ठुकरा चुकी है।
Highlights
- सेबी ने अनिल अंबानी और रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की सेटलमेंट याचिका खारिज की।
- मामला ₹6,526 करोड़ के कथित फंड के गलत इस्तेमाल से जुड़ा है।
- सेबी का आरोप, वास्तविक फंड ट्रांसफर घोषित राशि से कहीं अधिक था।
- यस बैंक निवेश मामले में भी पहले खारिज हो चुकी है सेटलमेंट अर्जी।
क्या है पूरा मामला?
समाचार एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सेबी ने पिछले सप्ताह अनिल अंबानी और रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर की उन अर्जियों को खारिज कर दिया, जिनमें कंपनी पर लगाए गए आरोपों को सेटलमेंट के जरिए समाप्त करने की मांग की गई थी। यह मामला रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर के फंड को कथित तौर पर अनिल अंबानी से जुड़ी कंपनियों तक पहुंचाने से संबंधित है।
सेबी का आरोप है कि कंपनी ने अपने वित्तीय लेन-देन और जोखिम (Exposure) से जुड़ी जानकारी पूरी तरह और सही तरीके से सार्वजनिक नहीं की। नियामक का मानना है कि निवेशकों को उपलब्ध कराई गई जानकारी वास्तविक स्थिति से काफी अलग थी।
₹6,526 करोड़ से बढ़कर ₹17,670 करोड़ तक पहुंचा मामला
सेबी के अनुसार, रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने इंजीनियरिंग कॉन्ट्रैक्टर CLE के साथ लगभग ₹6,526 करोड़ के एक्सपोजर की जानकारी दी थी और उसे एक स्वतंत्र इकाई बताया था।
हालांकि जांच में नियामक का आरोप है कि कंपनी ने वास्तव में करीब ₹17,670 करोड़ CLE को ट्रांसफर किए। इसके बाद इस कंपनी ने अगले लगभग दस वर्षों में अनिल अंबानी के नेतृत्व वाले रिलायंस एडीए (Reliance ADA) समूह की विभिन्न कंपनियों में कम से कम ₹11,200 करोड़ का निवेश किया।
सेबी का कहना है कि यदि ये आरोप सही साबित होते हैं तो यह संबंधित पक्ष (Related Party) लेन-देन और कॉरपोरेट गवर्नेंस से जुड़े नियमों के उल्लंघन का गंभीर मामला बन सकता है।
अक्टूबर 2025 में भी सामने आया था मामला
रिलायंस इंफ्रास्ट्रक्चर ने अक्टूबर 2025 में स्टॉक एक्सचेंज को दी गई जानकारी में स्वीकार किया था कि सेबी ने उससे संबंधित पक्ष के साथ वित्तीय एक्सपोजर नियमों के कथित उल्लंघन को लेकर कार्रवाई शुरू की है। हालांकि कंपनी ने उस समय आरोपों को विस्तार से सार्वजनिक नहीं किया था।
अब सेटलमेंट आवेदन खारिज होने के बाद यह मामला नियामकीय प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ेगा।
यस बैंक मामले में भी नहीं मिली राहत
यह पहली बार नहीं है जब सेबी ने अनिल अंबानी की सेटलमेंट याचिका खारिज की हो। इससे पहले यस बैंक में निवेश से जुड़े एक अलग मामले में भी बाजार नियामक ने उनकी सेटलमेंट अर्जी स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
लगातार दूसरी बार सेटलमेंट का रास्ता बंद होने से अनिल अंबानी और उनकी कंपनियों के लिए कानूनी और नियामकीय चुनौतियां और बढ़ सकती हैं।
पिछले 18 महीनों में बढ़ी मुश्किलें
बीते लगभग डेढ़ वर्ष के दौरान अनिल अंबानी समूह पर नियामकीय एजेंसियों की कार्रवाई तेज हुई है। समूह की कुछ कंपनियों और अधिकारियों के खिलाफ धोखाधड़ी सहित विभिन्न मामलों में जांच चल रही है। कुछ मामलों में गिरफ्तारियां भी हुई हैं, जबकि समूह की कुछ संपत्तियों पर कार्रवाई की गई है। इन मामलों की सुनवाई अभी विभिन्न अदालतों में जारी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सेबी की ओर से सेटलमेंट आवेदन खारिज किया जाना इस बात का संकेत है कि नियामक इन आरोपों की विस्तृत जांच और कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाना चाहता है।
निवेशकों के लिए क्या मायने?
सेटलमेंट याचिका खारिज होने का अर्थ यह नहीं है कि आरोप अंतिम रूप से सिद्ध हो गए हैं। इसका मतलब केवल इतना है कि सेबी ने मामले को समझौते के जरिए समाप्त करने की अनुमति नहीं दी है। अब आगे की जांच, सुनवाई और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर अंतिम फैसला होगा।
यदि भविष्य में नियामक आरोप साबित करता है, तो संबंधित पक्षों पर जुर्माना, बाजार से प्रतिबंध या अन्य नियामकीय कार्रवाई की जा सकती है। वहीं यदि आरोप साबित नहीं होते हैं तो संबंधित पक्षों को राहत भी मिल सकती है।
डिस्क्लेमर: यह खबर उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों और नियामकीय दस्तावेजों पर आधारित है। शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। किसी भी निवेश संबंधी निर्णय से पहले अपने वित्तीय सलाहकार से परामर्श अवश्य करें।


