Microsoft Leaving China: दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियों में शामिल माइक्रोसॉफ्ट के लिए चीन का बाजार अब पहले जैसा आसान नहीं रह गया है। चीन की घरेलू टेक्नोलॉजी को बढ़ावा देने वाली नीतियों, अमेरिका-चीन के बढ़ते तनाव और एडवांस्ड AI तकनीक पर अमेरिकी प्रतिबंधों ने माइक्रोसॉफ्ट के चीन कारोबार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। हालात इतने बदल गए हैं कि कंपनी पिछले पांच साल में चीन में कम से कम 15 ब्रांच ऑफिस और ज्वाइंट वेंचर बंद कर चुकी है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि माइक्रोसॉफ्ट चीन से पूरी तरह बाहर निकल रही है। रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनी ने 2023 में चीन से पूरी तरह निकलने के विकल्प पर भी विचार किया था, लेकिन फिलहाल उसने वहां अपना कारोबार बनाए रखने का फैसला किया है।
चीन में माइक्रोसॉफ्ट का कारोबार क्यों कमजोर हुआ?
माइक्रोसॉफ्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती चीन की Domestic Technology Policy है। चीन पिछले कई वर्षों से सरकारी संस्थानों और कंपनियों में घरेलू सॉफ्टवेयर तथा टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहा है।
इसका सीधा असर माइक्रोसॉफ्ट के Windows और दूसरे सॉफ्टवेयर कारोबार पर पड़ा है। बीजिंग की नजर में घरेलू तकनीक ज्यादा सुरक्षित और भरोसेमंद है। दूसरी तरफ चीन की अपनी टेक कंपनियां भी अब पहले के मुकाबले काफी मजबूत हो चुकी हैं।
रॉयटर्स ने दिसंबर 2023 से मई 2026 के बीच जारी चीन की छह सरकारी कंप्यूटर-सिस्टम खरीद गाइडलाइंस की समीक्षा की। इनमें से पांच में माइक्रोसॉफ्ट के सॉफ्टवेयर की सिफारिश नहीं की गई थी। एक गाइडलाइन में Windows 10 China Government Edition का जिक्र जरूर था, लेकिन उसके इस्तेमाल पर अतिरिक्त प्रबंधन नियम लागू थे।
यानी माइक्रोसॉफ्ट पर चीन में औपचारिक प्रतिबंध लगाने के बजाय ऐसा माहौल बन गया है, जिसमें सरकारी खरीद में घरेलू विकल्पों को प्राथमिकता मिल रही है।
15 ऑफिस और ज्वाइंट वेंचर बंद होने का क्या मतलब?
माइक्रोसॉफ्ट ने पिछले पांच वर्षों में चीन में कम से कम 15 ब्रांच ऑफिस और ज्वाइंट वेंचर बंद किए हैं। यह आंकड़ा कंपनी के चीन से पूरी तरह निकलने की घोषणा नहीं है, लेकिन इससे यह जरूर संकेत मिलता है कि कंपनी अपने कारोबार को पहले की तुलना में छोटा और ज्यादा चुनिंदा बना रही है।
रॉयटर्स के मुताबिक, माइक्रोसॉफ्ट के कुछ अधिकारियों ने 2023 में चीन से पूरी तरह बाहर निकलने पर भी विचार किया था। वजह थी—भू-राजनीतिक जोखिम के मुकाबले चीन से मिलने वाला आर्थिक फायदा कम होना।
माइक्रोसॉफ्ट ने हालांकि फिलहाल चीन छोड़ने की योजना नहीं बनाई है। कंपनी के लिए चीन अभी भी एक महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी और टैलेंट हब है।
अमेरिका-चीन तनाव ने बढ़ाई मुश्किल
माइक्रोसॉफ्ट के लिए समस्या सिर्फ चीन की घरेलू नीतियां नहीं हैं। अमेरिका द्वारा एडवांस्ड चिप, AI और दूसरी अत्याधुनिक तकनीकों पर लगाए गए निर्यात प्रतिबंध भी कंपनी के चीन कारोबार को प्रभावित कर रहे हैं।
माइक्रोसॉफ्ट के क्लाउड और AI कारोबार के लिए अत्याधुनिक तकनीक बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चीन में मौजूद इंजीनियरों और रिसर्च टीमों के लिए कुछ एडवांस्ड टेक्नोलॉजी तक पहुंच सीमित हुई है।
इससे चीन में माइक्रोसॉफ्ट के AI और क्लाउड कारोबार को तेजी से बढ़ाना मुश्किल हो गया है। यही वजह है कि कंपनी को एक तरफ चीन के नियमों और दूसरी तरफ अमेरिका के निर्यात प्रतिबंधों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है।
चीन का बाजार छोड़ने के बजाय माइक्रोसॉफ्ट ने बदली रणनीति
दिलचस्प बात यह है कि माइक्रोसॉफ्ट चीन से पूरी तरह बाहर निकलने के बजाय वहां अपने कारोबार का फोकस बदल रही है।
कंपनी को ByteDance जैसी चीनी कंपनियों से कारोबार मिल रहा है। ये कंपनियां अपने अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए Microsoft Azure जैसी क्लाउड सेवाओं का इस्तेमाल करती हैं।
चीन में माइक्रोसॉफ्ट कुछ कंपनियों को Azure के जरिए पश्चिमी AI मॉडल तक पहुंच भी उपलब्ध कराता है। रॉयटर्स के अनुसार, 2020 के दशक के मध्य तक चीनी कंपनियों को ग्लोबल मार्केट में कारोबार करने में मदद करना माइक्रोसॉफ्ट के चीन से जुड़े कारोबार का सबसे बड़ा हिस्सा बन गया था। हालांकि, कंपनी के कुल वैश्विक कारोबार की तुलना में यह हिस्सा अभी भी छोटा है।
Kimi जैसे चीनी AI मॉडल भी बन रहे चुनौती
माइक्रोसॉफ्ट के लिए एक और बड़ी चुनौती चीन की तेजी से बढ़ती घरेलू AI इंडस्ट्री है।
चीन में Kimi जैसे AI मॉडल पश्चिमी विकल्पों को चुनौती दे रहे हैं। इन घरेलू मॉडलों की कीमत भी कई मामलों में पश्चिमी विकल्पों की तुलना में कम है। ऐसे में चीनी कंपनियों के लिए Azure के जरिए विदेशी AI मॉडल इस्तेमाल करने की जरूरत लंबे समय में कम हो सकती है।
इससे माइक्रोसॉफ्ट के चीन में AI कारोबार की स्थिरता पर सवाल उठ रहे हैं। खासकर तब, जब उसका कुछ AI कारोबार बाहरी तकनीकी साझेदारों पर भी निर्भर करता है।
Microsoft और चीन का रिश्ता तीन दशक से ज्यादा पुराना
माइक्रोसॉफ्ट का चीन के साथ रिश्ता नया नहीं है। कंपनी के सह-संस्थापक Bill Gates ने 1994 में चीन का दौरा किया था और तत्कालीन राष्ट्रपति Jiang Zemin से मुलाकात की थी।
इसके बाद माइक्रोसॉफ्ट ने चीन में अपने कारोबार को बढ़ाने के साथ-साथ सरकार के साथ संबंध मजबूत करने की कोशिश की। कंपनी ने चीन की जरूरतों के हिसाब से Windows 10 China Government Edition भी तैयार किया था।
लेकिन चीन की सरकारी खरीद व्यवस्था में इसका फायदा माइक्रोसॉफ्ट को उतना नहीं मिला, जितनी कंपनी को उम्मीद थी।
Microsoft के लिए चीन की सबसे बड़ी ताकत अभी भी Talent Pool
अगर माइक्रोसॉफ्ट चीन से पूरी तरह बाहर नहीं निकल रही है तो इसकी एक बड़ी वजह वहां का टेक्नोलॉजी टैलेंट पूल भी है।
माइक्रोसॉफ्ट ने 1990 के दशक से चीन में टेक्नोलॉजी रिसर्च और इंजीनियरिंग टैलेंट तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उसकी Microsoft Research China, जिसे बाद में Microsoft Research Asia के नाम से जाना गया, से निकले कई लोग चीन की प्रमुख AI कंपनियों में वरिष्ठ पदों तक पहुंचे हैं।
इनमें SenseTime और DeepSeek जैसी AI कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल रहे हैं।
यानी चीन माइक्रोसॉफ्ट के लिए सिर्फ एक बिक्री बाजार नहीं है। वह कंपनी के लिए लंबे समय से एक महत्वपूर्ण रिसर्च और इंजीनियरिंग बेस भी रहा है।
1,000 इंजीनियरों को दिया था बाहर जाने का विकल्प
अमेरिका-चीन टेक तनाव का असर माइक्रोसॉफ्ट के कर्मचारियों पर भी पड़ा है। रॉयटर्स के मुताबिक, 2024 में माइक्रोसॉफ्ट ने करीब 1,000 शीर्ष इंजीनियरों को अमेरिका और तीन अन्य पश्चिमी देशों में जाने का विकल्प दिया था।
हालांकि, सूत्रों के मुताबिक करीब एक-तिहाई इंजीनियरों ने ही यह विकल्प स्वीकार किया। कई वरिष्ठ इंजीनियर चीन की यूनिवर्सिटीज और घरेलू टेक कंपनियों में चले गए।
इससे साफ है कि माइक्रोसॉफ्ट के लिए चीन का टैलेंट पूल महत्वपूर्ण है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव के कारण वहां रिसर्च करना भी पहले जितना आसान नहीं रहा।
क्या भारत बन सकता है Microsoft का अगला बड़ा सहारा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर चीन में माइक्रोसॉफ्ट का कारोबार लगातार सीमित होता है, तो क्या भारत कंपनी के लिए बड़ा विकल्प बन सकता है?
भारत के पक्ष में सबसे बड़ी बात उसका विशाल इंजीनियरिंग और IT टैलेंट पूल है। देश में AI, क्लाउड कंप्यूटिंग, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और डिजिटल सर्विसेज के क्षेत्र में तेजी से क्षमता बढ़ी है।
इसके अलावा भारत अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है और दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी सहयोग भी बढ़ रहा है। इसलिए चीन की तुलना में भारत में माइक्रोसॉफ्ट के लिए भू-राजनीतिक जोखिम अपेक्षाकृत अलग प्रकृति के हैं।
लेकिन यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि माइक्रोसॉफ्ट चीन को छोड़कर भारत को उसका सीधा विकल्प बना देगी। कंपनी ने फिलहाल चीन से पूरी तरह निकलने का फैसला नहीं किया है। बल्कि उसकी रणनीति वहां कारोबार को छोटा करके उन क्षेत्रों पर ध्यान देने की दिख रही है, जहां उसे सबसे ज्यादा व्यावसायिक फायदा मिल सकता है।
भारत के लिए क्यों है यह बड़ा मौका?
अगर आने वाले वर्षों में अमेरिकी और चीनी टेक इकोसिस्टम के बीच दूरी और बढ़ती है, तो भारत को इसका फायदा मिल सकता है। ग्लोबल कंपनियां चीन के बाहर रिसर्च, इंजीनियरिंग और क्लाउड से जुड़े ऑपरेशंस के लिए वैकल्पिक केंद्र तलाश सकती हैं।
ऐसे में भारत के पास AI टैलेंट, इंजीनियरिंग क्षमता, बड़ा डिजिटल बाजार और ग्लोबल IT इंडस्ट्री का अनुभव जैसे मजबूत फायदे हैं।
माइक्रोसॉफ्ट के मामले में भी भारत पहले से कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण बाजार और टेक्नोलॉजी हब है। इसलिए चीन में कंपनी की मौजूदगी कमजोर होने की स्थिति में भारत की रणनीतिक अहमियत और बढ़ सकती है।
निष्कर्ष
माइक्रोसॉफ्ट का चीन में 15 ऑफिस और ज्वाइंट वेंचर बंद करना इस बात का संकेत है कि दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों में से एक अब चीन में पहले जैसी आक्रामक विस्तार रणनीति नहीं अपना रही है। चीन की घरेलू सॉफ्टवेयर नीति, अमेरिकी निर्यात प्रतिबंध और बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव कंपनी के लिए बड़ी चुनौतियां बन गए हैं।
फिर भी माइक्रोसॉफ्ट ने चीन को पूरी तरह अलविदा नहीं कहा है। Azure, AI सेवाओं, चीनी कंपनियों के ग्लोबल कारोबार और टेक टैलेंट के कारण चीन में कंपनी के लिए अभी भी जगह बनी हुई है।
लेकिन अगर अमेरिका-चीन टेक टकराव आगे बढ़ता है, तो भारत जैसे देशों के लिए बड़ा अवसर पैदा हो सकता है। ऐसे में माइक्रोसॉफ्ट समेत दूसरी अमेरिकी टेक कंपनियों के लिए भारत आने वाले वर्षों में चीन के मुकाबले और ज्यादा महत्वपूर्ण रणनीतिक केंद्र बन सकता है।


