नई दिल्ली: भारत में महंगाई और लगातार बढ़ती कीमतों के बीच अब उपभोक्ताओं का रुझान तेजी से सेकंड हैंड और रीफर्बिश्ड उत्पादों की ओर बढ़ रहा है। चाहे स्मार्टफोन हो या कार, लोग अब कम कीमत में बेहतर विकल्प तलाश रहे हैं। यही वजह है कि देश में सेकंड हैंड स्मार्टफोन और पुरानी कारों का बाजार रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है।
मोबाइल बाजार पर नजर रखने वाली रिसर्च एजेंसी काउंटरपॉइंट रिसर्च के अनुसार, जनवरी से मई 2026 के दौरान कुल स्मार्टफोन बिक्री में रीफर्बिश्ड और प्री-ओन्ड डिवाइसों की हिस्सेदारी बढ़कर 26 फीसदी पहुंच गई है। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा करीब 23 फीसदी था। विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड काल को छोड़ दिया जाए तो यह सेक्टर सबसे तेज गति से बढ़ने वाले बाजारों में शामिल हो चुका है।
महंगे होते स्मार्टफोन ने बदली ग्राहकों की पसंद
पिछले कुछ महीनों में स्मार्टफोन कंपनियों ने लगातार कीमतों में बढ़ोतरी की है। इसकी सबसे बड़ी वजह मेमोरी चिप्स की कीमतों में भारी उछाल माना जा रहा है। AI डेटा सेंटरों की बढ़ती मांग के कारण चिप्स की कीमतें दो से तीन गुना तक बढ़ गई हैं, जिसका सीधा असर स्मार्टफोन निर्माण लागत पर पड़ा है।
उद्योग से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, कुछ हैंडसेट्स की कीमतों में औसतन 30 से 35 फीसदी तक की बढ़ोतरी देखी गई है। बढ़ती कीमतों के कारण बड़ी संख्या में उपभोक्ता नए फोन खरीदने के बजाय रीफर्बिश्ड और सेकंड हैंड स्मार्टफोन को प्राथमिकता दे रहे हैं।
बाजार से लगभग गायब हो गए सस्ते 4G फोन
लावा इंटरनेशनल के मैनेजिंग डायरेक्टर सुनील रैना के मुताबिक, लगातार बढ़ती लागत के कारण 10 हजार रुपये से कम कीमत वाले 4G स्मार्टफोन अब बाजार में लगभग समाप्त हो चुके हैं। ऐसे में बजट ग्राहकों के सामने सेकंड हैंड या रीफर्बिश्ड डिवाइस खरीदने का विकल्प अधिक आकर्षक बन गया है।
काउंटरपॉइंट रिसर्च के डायरेक्टर तरुण पाठक का अनुमान है कि वर्ष 2026 में सेकंड हैंड स्मार्टफोन बाजार करीब 12 फीसदी की दर से बढ़ सकता है, जबकि नए स्मार्टफोन की बिक्री में लगभग 11 फीसदी तक गिरावट देखने को मिल सकती है।
पुरानी कारों की बिक्री ने भी पकड़ी रफ्तार
सिर्फ स्मार्टफोन ही नहीं, ऑटोमोबाइल सेक्टर में भी यही ट्रेंड दिखाई दे रहा है। क्रिसिल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2026 में सेकंड हैंड कारों की बिक्री 9 फीसदी बढ़कर 61 लाख यूनिट तक पहुंच गई। वहीं वित्त वर्ष 2025 में यह आंकड़ा 56 लाख यूनिट था।
इसके मुकाबले नई कारों की बिक्री 8 फीसदी बढ़कर 46.4 लाख यूनिट रही। हालांकि सरकार द्वारा जीएसटी दरों में कटौती के बाद नई कारों की बिक्री को कुछ राहत मिली, लेकिन फिर भी पुरानी कारों की मांग अधिक तेजी से बढ़ती रही।
नई कारों की बढ़ती कीमतें बनीं बड़ी वजह
ऑटोमोबाइल कंपनियां इस साल दो बार कीमतें बढ़ा चुकी हैं। इसके चलते नई कारें औसतन 5 फीसदी तक महंगी हो गई हैं। बढ़ती कीमतों और आसान फाइनेंसिंग विकल्पों ने सेकंड हैंड कार बाजार को मजबूती दी है।
ऑनलाइन प्लेटफॉर्म Cars24 के मुताबिक, सेकंड हैंड कारों की कुल मांग में महानगरों की हिस्सेदारी 66 फीसदी से अधिक है। दिल्ली-एनसीआर, मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में पुरानी कारों की खरीदारी तेजी से बढ़ रही है।
क्यों बढ़ रहा है सेकंड हैंड बाजार?
विशेषज्ञों के अनुसार, सेकंड हैंड और रीफर्बिश्ड बाजार की लोकप्रियता के पीछे कई कारण हैं—
- नए उत्पादों की लगातार बढ़ती कीमतें।
- कम बजट में प्रीमियम ब्रांड खरीदने का मौका।
- ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर बेहतर वारंटी और गुणवत्ता जांच।
- आसान फाइनेंसिंग और एक्सचेंज विकल्प।
- पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता और पुन: उपयोग की सोच।
आगे क्या है तस्वीर?
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सेकंड हैंड स्मार्टफोन और कारों का बाजार और तेजी से बढ़ेगा। तकनीक आधारित रीफर्बिशमेंट, प्रमाणित विक्रेताओं की संख्या में वृद्धि और ग्राहकों के बढ़ते भरोसे से यह उद्योग नए रिकॉर्ड बना सकता है। महंगाई और बढ़ती जीवन-यापन लागत के बीच सेकंड हैंड उत्पाद अब केवल मजबूरी नहीं, बल्कि समझदारी भरा विकल्प बनते जा रहे हैं।


