China Rare Earths News: रेयर अर्थ एलिमेंट्स पर लंबे समय से चीन का दबदबा रहा है। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV), मिसाइल, विंड टर्बाइन और हाई-टेक उपकरणों के लिए जरूरी इन खनिजों की सप्लाई में चीन सबसे आगे रहा है। लेकिन अब दुनिया के कई देश चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। भारत समेत कई देशों में रेयर अर्थ के नए भंडार मिलने और प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ने से चीन का एकाधिकार कमजोर पड़ सकता है।
रेयर अर्थ बना चीन की सबसे बड़ी ताकत
दुनिया में तकनीकी प्रतिस्पर्धा बढ़ने के साथ रेयर अर्थ एलिमेंट्स की अहमियत लगातार बढ़ी है। ये 17 ऐसे खनिज तत्व हैं, जिनका इस्तेमाल आधुनिक तकनीक की रीढ़ माने जाने वाले उपकरणों में किया जाता है।
इनका उपयोग:
- स्मार्टफोन और लैपटॉप के छोटे लेकिन शक्तिशाली मैग्नेट में
- इलेक्ट्रिक वाहनों की मोटर में
- पवन ऊर्जा टर्बाइन में
- रक्षा उपकरणों और गाइडेड मिसाइलों में
- एयरोस्पेस तकनीक में
लंबे समय तक चीन ने इन खनिजों की माइनिंग ही नहीं बल्कि रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग में भी अपनी मजबूत पकड़ बनाए रखी। यही वजह थी कि दुनिया के कई बड़े देश रेयर अर्थ सप्लाई के लिए चीन पर निर्भर थे।
निर्यात प्रतिबंधों से बढ़ी चिंता
हाल के वर्षों में चीन ने रेयर अर्थ से जुड़े कुछ उत्पादों के निर्यात नियमों को सख्त किया। इसका असर अमेरिका, जापान और यूरोप की कंपनियों पर पड़ने की आशंका जताई गई।
चीन की रणनीति को कई विशेषज्ञों ने उसका “गुप्त हथियार” बताया, क्योंकि आधुनिक तकनीक और रक्षा क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले कई महत्वपूर्ण उपकरणों के लिए रेयर अर्थ बेहद जरूरी हैं।
लेकिन अब स्थिति बदल रही है। दुनिया के कई देश चीन के विकल्प तलाश रहे हैं और नए भंडारों की खोज में निवेश बढ़ा रहे हैं।
चीन के बाहर बढ़ रहा रेयर अर्थ उत्पादन
करीब डेढ़ दशक पहले तक रेयर अर्थ की माइनिंग और रिफाइनिंग का बड़ा हिस्सा चीन में केंद्रित था। हालांकि अब अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, भारत और अन्य देशों ने अपनी सप्लाई चेन तैयार करनी शुरू कर दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, अब वैश्विक रेयर अर्थ उत्पादन का लगभग एक-तिहाई हिस्सा चीन के बाहर होने लगा है। इससे चीन की निर्भरता कम करने की कोशिशों को मजबूती मिली है।
कौन-कौन से रेयर अर्थ तत्व हैं सबसे जरूरी?
सभी रेयर अर्थ तत्वों की मांग एक जैसी नहीं होती। कुछ तत्व हाई-टेक उद्योगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
नियोडिमियम और प्रासियोडिमियम
इनका इस्तेमाल मजबूत स्थायी मैग्नेट बनाने में होता है। ये मैग्नेट:
- इलेक्ट्रिक कार मोटर
- विंड टर्बाइन
- इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों
में इस्तेमाल किए जाते हैं।
डिस्प्रोसियम, टर्बियम और समैरियम
ये हेवी रेयर अर्थ एलिमेंट्स (HRE) कहलाते हैं। इनकी जरूरत उन क्षेत्रों में होती है जहां ज्यादा तापमान और कठिन परिस्थितियों में भी उपकरणों को काम करना होता है।
इनका इस्तेमाल:
- रक्षा तकनीक
- मिसाइल सिस्टम
- एयरोस्पेस
- हाई-परफॉर्मेंस EV मोटर
में किया जाता है।
चीन के बाहर मिले नए बड़े भंडार
कुछ साल पहले तक माना जाता था कि भारी रेयर अर्थ तत्वों पर चीन का लगभग पूरा नियंत्रण है। लेकिन अब कई देशों में नए भंडार मिले हैं।
म्यांमार
चीन की सीमा से लगे म्यांमार के कचिन राज्य में भारी रेयर अर्थ तत्वों का खनन बढ़ा है। यह क्षेत्र चीन के लिए भी महत्वपूर्ण सप्लाई स्रोत रहा है।
ब्राजील और अमेरिका
ब्राजील में भारी रेयर अर्थ की माइनिंग और प्रोसेसिंग के लिए बड़े निवेश किए जा रहे हैं। करीब 2.8 अरब डॉलर के सौदों के जरिए इस क्षेत्र में गतिविधियां तेज हुई हैं।
अन्य देशों में खोज
नए भंडार मिलने वाले देशों में शामिल हैं:
- ऑस्ट्रेलिया
- वियतनाम
- मलेशिया
- मेडागास्कर
- मलावी
- युगांडा
- चिली
- फिनलैंड
इन देशों में रेयर अर्थ की खोज और उत्पादन क्षमता विकसित की जा रही है।
चीन से अलग सप्लाई चेन बनाने की तैयारी
अब कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां चीन के बाहर रेयर अर्थ प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित कर रही हैं।
Lynas Rare Earths जैसी कंपनियां चीन से अलग सप्लाई चेन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इसका उद्देश्य माइनिंग से लेकर मैग्नेट निर्माण तक पूरी प्रक्रिया को चीन से बाहर विकसित करना है।
भारत के लिए क्यों बड़ा मौका?
भारत के लिए रेयर अर्थ का क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। भारत के पास तटीय रेत में रेयर अर्थ तत्वों का बड़ा भंडार मौजूद है। अनुमान के अनुसार भारत दुनिया के बड़े रेयर अर्थ रिजर्व वाले देशों में शामिल है।
हालांकि चुनौती यह रही है कि भारत के पास अभी तक उच्च स्तरीय प्रोसेसिंग तकनीक और हेवी रेयर अर्थ एलिमेंट्स की क्षमता सीमित रही है।
इसी वजह से भारत को कई मामलों में चीन से आयात पर निर्भर रहना पड़ा।
भारत सरकार ने शुरू किया बड़ा मिशन
भारत ने रेयर अर्थ और अन्य महत्वपूर्ण खनिजों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन (NCMM) शुरू किया है।
इस मिशन के तहत:
- नए खनिज भंडारों की खोज
- माइनिंग क्षमता बढ़ाना
- प्रोसेसिंग तकनीक विकसित करना
- रीसाइक्लिंग को बढ़ावा देना
जैसे क्षेत्रों पर जोर दिया जा रहा है।
सरकार ने इसके लिए 16,300 करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का प्रावधान किया है।
IREL और घरेलू मैग्नेट निर्माण पर जोर
सरकारी कंपनी IREL (India) Limited ओडिशा, केरल और तमिलनाडु में मोनाजाइट अयस्क से रेयर अर्थ तत्व निकालने का काम करती है।
इसके अलावा विशाखापट्टनम में रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) प्लांट के जरिए भारत घरेलू मैग्नेट उत्पादन क्षमता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है।
यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिर्फ खनन पर्याप्त नहीं है। असली ताकत प्रोसेसिंग और तैयार उत्पाद बनाने की क्षमता में है।
KABIL के जरिए विदेशों में भी निवेश
चीन पर निर्भरता कम करने के लिए भारत की कंपनी Khanij Bidesh India Limited (KABIL) विदेशों में भी खनिज संपत्तियों में हिस्सेदारी हासिल करने की कोशिश कर रही है।
भारत की नजर:
- ऑस्ट्रेलिया
- अर्जेंटीना
- अफ्रीकी देशों
में मौजूद महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों पर है।
क्या खत्म हो जाएगा चीन का दबदबा?
रेयर अर्थ सेक्टर में चीन की पकड़ अभी भी मजबूत है, खासकर प्रोसेसिंग और मैग्नेट निर्माण में। लेकिन दुनिया अब पहले की तरह सिर्फ चीन पर निर्भर नहीं रहना चाहती।
भारत समेत कई देशों के नए निवेश, नए भंडारों की खोज और वैकल्पिक सप्लाई चेन बनने से आने वाले वर्षों में चीन का एकाधिकार काफी हद तक कमजोर हो सकता है।
रेयर अर्थ अब सिर्फ खनिज नहीं बल्कि वैश्विक तकनीकी और रणनीतिक शक्ति का नया आधार बन चुका है। आने वाले समय में जो देश इन खनिजों की पूरी सप्लाई चेन तैयार कर पाएंगे, वही इलेक्ट्रिक वाहन, रक्षा और हाई-टेक उद्योगों में बड़ी बढ़त हासिल करेंगे।


