भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार लगातार मजबूत ग्रोथ का दावा कर रही है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक देश की जीडीपी ग्रोथ 7 फीसदी से ऊपर बनी हुई है और भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लेकिन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर और जाने-माने अर्थशास्त्री रघुराम राजन ने इन ग्रोथ आंकड़ों को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। राजन का कहना है कि अगर अर्थव्यवस्था वाकई इतनी तेज रफ्तार से बढ़ रही है, तो कॉर्पोरेट निवेश और विदेशी पूंजी प्रवाह में वैसी मजबूती क्यों नहीं दिख रही है।
रघुराम राजन ने इंडिया टुडे टीवी को दिए इंटरव्यू में कहा कि हेडलाइन जीडीपी ग्रोथ नंबर और जमीन पर दिखने वाले कारोबारी संकेतों के बीच अंतर नजर आता है। उनके मुताबिक यह समझना मुश्किल है कि जब अर्थव्यवस्था मजबूत गति से आगे बढ़ रही है, तब कंपनियां बड़े पैमाने पर निवेश क्यों नहीं कर रहीं। राजन ने कहा कि अगर मांग इतनी मजबूत होती, तो कंपनियों को नई फैक्ट्रियां लगाने, क्षमता विस्तार करने और लंबे समय के प्रोजेक्ट्स में पैसा लगाने की ज्यादा दिलचस्पी दिखनी चाहिए थी।
GDP ग्रोथ पर राजन ने क्यों उठाए सवाल?
रघुराम राजन का मुख्य सवाल यह है कि क्या भारत के मौजूदा जीडीपी आंकड़े पूरी आर्थिक तस्वीर को सही तरीके से दिखा रहे हैं। उनका कहना है कि सिर्फ हेडलाइन ग्रोथ नंबर देखकर अर्थव्यवस्था की सेहत का पूरा अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। अगर कंपनियां निवेश नहीं कर रहीं, विदेशी निवेशक सतर्क हैं और मांग को लेकर भरोसा कमजोर है, तो यह संकेत देता है कि ग्रोथ के दावों और कारोबारी फैसलों के बीच कोई असंतुलन है।
राजन ने इंटरव्यू में कहा कि उन्हें यह समझ नहीं आता कि अगर अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से बढ़ रही है, तो निजी क्षेत्र का निवेश उतनी तेजी से क्यों नहीं बढ़ रहा। उनके मुताबिक इस तरह की स्थिति में “कुछ तो गड़बड़” लगती है। राजन ने यह भी कहा कि कॉर्पोरेट निवेश में सुस्ती कोई नई समस्या नहीं है। यह सवाल 10 साल पहले भी मौजूद था और आज भी एक बड़ी पहेली बना हुआ है।
भारत की अर्थव्यवस्था वित्त वर्ष 2025-26 में 7.7 फीसदी की दर से बढ़ी है। जनवरी-मार्च तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 7.8 फीसदी रही। ये आंकड़े भारत को वैश्विक स्तर पर तेज ग्रोथ वाली अर्थव्यवस्था के रूप में दिखाते हैं। लेकिन राजन का तर्क है कि अगर ये ग्रोथ जमीन पर उतनी ही मजबूत है, तो निजी कंपनियों की निवेश योजनाओं में भी उसका असर दिखना चाहिए।
राजन के अनुसार कंपनियां तभी निवेश बढ़ाती हैं, जब उन्हें भविष्य की मांग पर भरोसा होता है। अगर कंपनियां फैक्ट्री, मशीनरी, उत्पादन क्षमता और नए प्रोजेक्ट्स में बड़ा पैसा नहीं लगा रहीं, तो इसका मतलब है कि वे मांग को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। यही बात जीडीपी ग्रोथ के आंकड़ों पर सवाल पैदा करती है।
राजन ने कहा कि भारत में मजबूत ग्रोथ दिखाने वाले आंकड़ों के बावजूद कॉर्पोरेट निवेश की रफ्तार उम्मीद के अनुसार नहीं बढ़ी है। उनके मुताबिक यह संभव है कि वास्तविक अर्थव्यवस्था उतनी तेजी से न बढ़ रही हो, जितनी तेजी आधिकारिक आंकड़ों में दिखाई जा रही है। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि सवाल आंकड़ों को पूरी तरह खारिज करने का नहीं है, बल्कि यह समझने का है कि हेडलाइन नंबर और जमीनी संकेतों में अंतर क्यों दिख रहा है।
पूर्व आरबीआई गवर्नर ने विदेशी निवेश को लेकर भी चिंता जताई। उनके मुताबिक भारत में एफडीआई और पूंजी प्रवाह को लेकर निवेशकों का रुख पहले जैसा आक्रामक नहीं दिख रहा। उन्होंने कहा कि अगर विदेशी कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाने के लिए बड़ा पैसा नहीं ला रहीं और पोर्टफोलियो निवेशक बाजार से पैसा निकाल रहे हैं, तो यह भरोसे की कमी का संकेत हो सकता है।
हालांकि सरकारी और आधिकारिक आंकड़ों में भारत को विदेशी निवेश के लिए अभी भी आकर्षक बाजार बताया जा रहा है। DPIIT के आंकड़ों के अनुसार भारत में एफडीआई इनफ्लो में हाल के वर्षों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है। लेकिन राजन का सवाल कुल आंकड़ों से ज्यादा निवेश की गुणवत्ता और वास्तविक उत्पादन क्षमता पर है। उनका कहना है कि सिर्फ पैसा आना काफी नहीं है, यह देखना भी जरूरी है कि वह पैसा फैक्ट्री, रोजगार और उत्पादक क्षमता में बदल रहा है या नहीं।
यह बहस इसलिए अहम है क्योंकि भारत आने वाले वर्षों में मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और एक्सपोर्ट को ग्रोथ का बड़ा इंजन बनाना चाहता है। सरकार प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव, इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च और मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों के जरिए निजी निवेश को बढ़ावा दे रही है। इसके बावजूद अगर निजी कंपनियां निवेश को लेकर सावधानी बरत रही हैं, तो नीति निर्माताओं के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है।
राजन ने यह भी संकेत दिया कि ग्रोथ का फायदा व्यापक स्तर पर दिखना चाहिए। मजबूत जीडीपी ग्रोथ के साथ रोजगार, वेतन, उपभोग और निजी निवेश में भी सुधार दिखना चाहिए। अगर ग्रोथ नंबर मजबूत हैं लेकिन आम उपभोक्ता की मांग, रोजगार के अवसर और निजी निवेश उसी अनुपात में नहीं बढ़ते, तो अर्थव्यवस्था की मजबूती पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश को लंबे समय तक 8 फीसदी के आसपास की टिकाऊ ग्रोथ की जरूरत है। बड़ी आबादी, रोजगार की मांग और प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने के लक्ष्य को देखते हुए सिर्फ सरकारी खर्च के सहारे लंबे समय तक तेज ग्रोथ बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। इसके लिए निजी क्षेत्र का निवेश, विदेशी पूंजी, मजबूत घरेलू मांग और निर्यात में सुधार जरूरी है।
राजन की टिप्पणी को राजनीतिक बयान की तरह देखने के बजाय आर्थिक संकेतों की बहस के रूप में भी समझा जा सकता है। एक तरफ सरकार के आधिकारिक आंकड़े भारत की मजबूत अर्थव्यवस्था की तस्वीर पेश करते हैं, वहीं दूसरी तरफ निजी निवेश और विदेशी पूंजी प्रवाह जैसे संकेत सवाल पैदा करते हैं। असली चुनौती यही है कि हेडलाइन ग्रोथ को जमीन पर ज्यादा रोजगार, ज्यादा निवेश और ज्यादा आमदनी में कैसे बदला जाए।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था में मजबूत पक्ष भी हैं। इंफ्रास्ट्रक्चर खर्च, सर्विस सेक्टर, डिजिटल अर्थव्यवस्था, बैंकिंग सिस्टम की बेहतर स्थिति और घरेलू खपत जैसे कारक भारत को सपोर्ट देते हैं। लेकिन कमजोरी वाले संकेतों को नजरअंदाज करना भी ठीक नहीं होगा। निजी निवेश में तेजी, निर्यात में स्थिरता और ग्रामीण मांग में सुधार के बिना तेज ग्रोथ को लंबे समय तक बनाए रखना आसान नहीं है।
रघुराम राजन के बयान ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि भारत की GDP ग्रोथ कितनी मजबूत और कितनी व्यापक है। सरकार के आंकड़े तेज आर्थिक विस्तार दिखाते हैं, लेकिन राजन जैसे अर्थशास्त्री यह पूछ रहे हैं कि अगर ग्रोथ इतनी मजबूत है तो कंपनियां बड़े निवेश से पीछे क्यों हट रही हैं। आने वाले महीनों में निजी निवेश, एफडीआई, रोजगार और खपत के आंकड़े यह बताने में अहम भूमिका निभाएंगे कि भारत की ग्रोथ स्टोरी जमीन पर कितनी मजबूत है।
Sources checked: Economic Times on Rajan’s interview, Reuters/TOI on FY26 GDP figures, DPIIT/India Briefing on FDI data.


