नई दिल्ली: देश की प्रमुख ऑटोमोबाइल कंपनियों में शामिल महिंद्रा एंड महिंद्रा (Mahindra & Mahindra) इन दिनों अपनी एसयूवी गाड़ियों की मजबूत मांग का फायदा उठा रही है। थार, स्कॉर्पियो-एन, स्कॉर्पियो क्लासिक, बोलेरो और XUV700 जैसे मॉडल लगातार ग्राहकों के बीच लोकप्रिय बने हुए हैं। हालांकि, मांग में तेजी के बावजूद कंपनी के सामने एक नई चुनौती खड़ी हो गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार जून महीने में कंपनी की एसयूवी का उत्पादन 15 फीसदी तक घट सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह सप्लाई चेन में आई बाधाएं और कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स की कमी बताई जा रही है।
इंडस्ट्री सूत्रों के अनुसार कंपनी के कुछ प्रमुख पार्ट्स सप्लायर इस समय गंभीर लेबर शॉर्टेज का सामना कर रहे हैं। इसका असर सीधे तौर पर उत्पादन क्षमता पर पड़ रहा है। यदि स्थिति जल्दी सामान्य नहीं हुई तो कंपनी की कुछ लोकप्रिय एसयूवी की डिलीवरी पर भी असर देखने को मिल सकता है।
सप्लायर कंपनियों में लेबर की कमी बनी बड़ी चुनौती
इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक महिंद्रा के लिए सबसे बड़ी समस्या उसके एक प्रमुख वेंडर की ओर से सामने आई है। बताया जा रहा है कि इस सप्लायर की उत्पादन क्षमता में 20 से 25 फीसदी तक गिरावट आई है। इसका कारण पर्याप्त संख्या में कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स का उपलब्ध न होना है।
महिंद्रा हर महीने लगभग 57,000 पेट्रोल और डीजल एसयूवी बनाने की क्षमता रखती है। लेकिन यदि जरूरी पार्ट्स समय पर नहीं मिलते हैं तो उत्पादन लक्ष्य हासिल करना मुश्किल हो सकता है। ऑटोमोबाइल उद्योग में सप्लाई चेन का हर हिस्सा एक-दूसरे से जुड़ा होता है। किसी एक प्रमुख कंपोनेंट की कमी भी पूरे उत्पादन चक्र को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा स्थिति अस्थायी हो सकती है, लेकिन अगर लेबर की उपलब्धता जल्द नहीं सुधरी तो इसका असर अगले कुछ महीनों तक भी दिखाई दे सकता है।
पश्चिम बंगाल चुनाव से कैसे जुड़ा है मामला?
रिपोर्ट के अनुसार लेबर शॉर्टेज की एक वजह पश्चिम बंगाल में हाल में हुए चुनाव भी बताए जा रहे हैं। कई प्रवासी मजदूर चुनाव के दौरान अपने गृह राज्य लौट गए थे। उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि इनमें से बड़ी संख्या अब तक वापस काम पर नहीं लौटी है।
ऑटो सेक्टर के कई बड़े मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर महाराष्ट्र, गुजरात और पश्चिमी भारत के अन्य हिस्सों में स्थित हैं। यहां बड़ी संख्या में बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और उत्तर प्रदेश से आने वाले मजदूर काम करते हैं। जब इनमें से बड़ी संख्या किसी कारणवश वापस नहीं लौटती तो फैक्ट्रियों के लिए उत्पादन बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि चुनाव, फसल कटाई का मौसम और स्थानीय रोजगार के अवसर जैसे कई कारण इस स्थिति के पीछे हैं। इसलिए उद्योग जगत इसे केवल एक अस्थायी चुनावी प्रभाव नहीं बल्कि श्रम बाजार में हो रहे बड़े बदलाव के रूप में भी देख रहा है।
यूपी और हरियाणा में बढ़े रोजगार के अवसर
उद्योग अधिकारियों का मानना है कि उत्तर प्रदेश और हरियाणा में बढ़े न्यूनतम वेतन ने भी मजदूरों के पलायन को प्रभावित किया है। पहले बड़ी संख्या में श्रमिक पश्चिमी भारत के औद्योगिक केंद्रों में रोजगार की तलाश में जाते थे, लेकिन अब उन्हें अपने राज्य में भी बेहतर अवसर मिलने लगे हैं।
इसके अलावा विभिन्न सरकारी कल्याणकारी योजनाओं और स्वरोजगार के बढ़ते अवसरों ने भी श्रमिकों की प्राथमिकताओं को बदला है। ई-रिक्शा संचालन, छोटे कारोबार और स्थानीय रोजगार योजनाओं ने कई लोगों को अपने गृह राज्य में ही रहने के लिए प्रेरित किया है।
इसका असर अब ऑटोमोबाइल और अन्य मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। कंपनियां योग्य और प्रशिक्षित श्रमिकों की कमी की शिकायत कर रही हैं।
EKA मोबिलिटी ने भी जताई चिंता
पुणे स्थित इलेक्ट्रिक ट्रक और बस निर्माता कंपनी EKA मोबिलिटी के फाउंडर और चेयरमैन सुधीर मेहता ने भी इस समस्या की पुष्टि की है। उनके अनुसार पुणे और औरंगाबाद के आसपास मौजूद ऑटोमोटिव क्लस्टर में लेबर की मांग और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है।
उन्होंने कहा कि कई कॉन्ट्रैक्ट वर्कर फसल कटाई के दौरान अपने गांव लौट गए। इसके अलावा चुनावी गतिविधियों और स्थानीय रोजगार के बढ़ते अवसरों के कारण भी श्रमिकों की वापसी अपेक्षा से कम रही है।
उद्योग जगत का मानना है कि यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो केवल ऑटोमोबाइल सेक्टर ही नहीं बल्कि अन्य मैन्युफैक्चरिंग उद्योग भी प्रभावित हो सकते हैं।
किन मॉडल्स की डिलीवरी पर पड़ सकता है असर?
महिंद्रा की सबसे ज्यादा मांग वाली गाड़ियों में थार, स्कॉर्पियो-एन, स्कॉर्पियो क्लासिक, बोलेरो और XUV700 शामिल हैं। इन मॉडलों के लिए कई शहरों में पहले से ही लंबा वेटिंग पीरियड चल रहा है।
यदि उत्पादन में 15 फीसदी तक की कमी आती है तो ग्राहकों को डिलीवरी के लिए अधिक इंतजार करना पड़ सकता है। हालांकि कंपनी ने अभी तक किसी संभावित डिलीवरी देरी या उत्पादन कटौती पर आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।
ऑटो इंडस्ट्री के जानकारों का कहना है कि यदि सप्लाई चेन जल्द सामान्य हो जाती है तो ग्राहकों पर असर सीमित रहेगा। लेकिन यदि लेबर शॉर्टेज अगले कुछ महीनों तक जारी रहती है तो वेटिंग पीरियड और बढ़ सकता है।
सिर्फ ऑटो सेक्टर नहीं, कई उद्योग प्रभावित
लेबर की कमी की समस्या केवल ऑटोमोबाइल उद्योग तक सीमित नहीं है। हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मौद्रिक नीति समीक्षा से पहले विभिन्न उद्योगों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी। इसमें ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, स्टील, जेम्स एंड ज्वैलरी, कंस्ट्रक्शन और आईटी सेक्टर के प्रतिनिधि शामिल हुए थे।
बैठक में कई उद्योगों ने प्रवासी श्रमिकों की कम वापसी को बड़ी चुनौती बताया। विशेष रूप से कंस्ट्रक्शन सेक्टर ने कहा कि मजदूरों की कमी के कारण कई प्रोजेक्ट प्रभावित हो रहे हैं। कुछ प्रतिनिधियों ने यह भी कहा कि सस्ते आवास की मांग पर भी इसका असर पड़ रहा है।
इससे स्पष्ट है कि श्रम बाजार में हो रहे बदलाव का प्रभाव व्यापक स्तर पर दिखाई दे रहा है और उद्योगों को नई रणनीति बनाने की जरूरत पड़ सकती है।
मांग मजबूत, लेकिन उत्पादन चुनौती बना
महिंद्रा के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि कंपनी की एसयूवी की मांग रिकॉर्ड स्तर पर बनी हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी की कुल एसयूवी बिक्री 19 फीसदी बढ़कर 6.6 लाख यूनिट से अधिक पहुंच गई थी।
नए वित्त वर्ष में भी यह रफ्तार बनी हुई है। अप्रैल में कंपनी की एसयूवी बिक्री में 8 फीसदी और मई में 11 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई। मजबूत मांग के बीच उत्पादन में कमी कंपनी के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि कंपनी सप्लाई चेन से जुड़ी समस्याओं को जल्दी सुलझाने में सफल रहती है तो बिक्री की रफ्तार पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन यदि श्रमिकों की कमी लंबे समय तक बनी रहती है तो उत्पादन लक्ष्य और डिलीवरी शेड्यूल प्रभावित हो सकते हैं।
आगे क्या देखना होगा?
निवेशकों और ग्राहकों की नजर अब जून और जुलाई के उत्पादन आंकड़ों पर रहेगी। यदि सप्लायर कंपनियां पर्याप्त श्रमिक जुटाने में सफल होती हैं तो उत्पादन सामान्य स्तर पर लौट सकता है। वहीं, यदि समस्या बनी रहती है तो महिंद्रा को कुछ मॉडलों की डिलीवरी प्राथमिकता के आधार पर करनी पड़ सकती है।
फिलहाल कंपनी की मांग मजबूत बनी हुई है, लेकिन लेबर शॉर्टेज और सप्लाई चेन से जुड़ी चुनौतियां निकट भविष्य में इसके उत्पादन प्रदर्शन पर असर डाल सकती हैं।


