क्या भारत को चीन के दोहरे करेंसी मॉडल से कोई सबक लेना चाहिए?
नई दिल्ली: दुनिया की दो सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं भारत और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा केवल विनिर्माण, निर्यात या तकनीक तक सीमित नहीं है। अब चर्चा मुद्रा प्रबंधन यानी करेंसी सिस्टम को लेकर भी तेज हो गई है। हाल ही में चार्टर्ड अकाउंटेंट फेनिल भिमानी की एक लिंक्डइन पोस्ट ने इस बहस को नई दिशा दी है। उन्होंने चीन के टू-टियर करेंसी सिस्टम की तुलना भारत के अपेक्षाकृत खुले और बाजार आधारित रुपये सिस्टम से करते हुए सवाल उठाया कि क्या भारत को भी अपनी मुद्रा की वैश्विक कीमत पर अधिक नियंत्रण रखने के लिए अलग ढांचा विकसित करना चाहिए।
यह चर्चा ऐसे समय में सामने आई है जब वैश्विक वित्तीय बाजारों में डॉलर की मजबूती, भू-राजनीतिक तनाव और पूंजी प्रवाह में उतार-चढ़ाव का असर कई देशों की मुद्राओं पर पड़ रहा है। भारत का रुपया भी पिछले कुछ वर्षों में दबाव का सामना करता रहा है, जबकि चीन ने अपनी मुद्रा युआन पर अपेक्षाकृत अधिक नियंत्रण बनाए रखा है।
चीन का करेंसी मॉडल दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अनोखा माना जाता है। यहां घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों के लिए युआन के दो अलग-अलग संस्करण मौजूद हैं। घरेलू बाजार में उपयोग होने वाली मुद्रा को CNY कहा जाता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में कारोबार होने वाले युआन को CNH कहा जाता है। इन दोनों के बीच प्रवाह को चीन का केंद्रीय बैंक, People’s Bank of China नियंत्रित करता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यही व्यवस्था चीन को अपनी मुद्रा की दिशा और स्थिरता पर प्रभाव बनाए रखने में मदद करती है। चीन लंबे समय से निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था रहा है और मुद्रा प्रबंधन उसकी आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा माना जाता है। यदि युआन बहुत तेजी से मजबूत हो जाए तो चीनी निर्यात महंगे हो सकते हैं, जबकि अत्यधिक कमजोरी से पूंजी पलायन और वित्तीय अस्थिरता का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए बीजिंग ने दोनों स्थितियों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है।
फेनिल भिमानी ने इसे समझाने के लिए एक दिलचस्प उदाहरण दिया। उन्होंने चीन के सिस्टम की तुलना एक ऐसे होटल से की जहां कर्मचारियों और मेहमानों के लिए अलग-अलग लॉन्ड्री सेवाएं चलती हैं। दोनों के बीच एक केंद्रीय नियंत्रण बिंदु होता है जिसके जरिए होटल प्रबंधन कीमतों और संचालन को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह चीन घरेलू और ऑफशोर युआन के बीच संतुलन बनाकर वैश्विक मुद्रा बाजारों में प्रभाव बनाए रखता है।
चीन के मॉडल की सबसे ज्यादा चर्चा वर्ष 2016 की घटना को लेकर होती है। उस समय कई विदेशी निवेशकों और ट्रेडर्स ने ऑफशोर युआन के खिलाफ बड़े पैमाने पर सट्टा दांव लगाए थे। जवाब में पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना ने ऑफशोर युआन की उपलब्धता सीमित कर दी। इसके कारण युआन उधार लेने की लागत अचानक बढ़ गई और कई ट्रेडर्स को अपनी पोजीशन बंद करनी पड़ी। इस घटना को चीन के मुद्रा नियंत्रण मॉडल की ताकत के उदाहरण के रूप में देखा जाता है।
इसके विपरीत भारत अपेक्षाकृत अधिक बाजार आधारित प्रणाली अपनाता है। भारतीय रुपया पूरी तरह फ्री-फ्लोटिंग नहीं है, लेकिन इसकी कीमत मुख्य रूप से बाजार की मांग और आपूर्ति के आधार पर तय होती है। जरूरत पड़ने पर Reserve Bank of India हस्तक्षेप करता है और अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने की कोशिश करता है।
यहीं से NDF यानी नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड मार्केट की भूमिका सामने आती है। NDF ऐसे अनुबंध होते हैं जिनमें वास्तविक मुद्रा का लेन-देन नहीं होता, बल्कि केवल मूल्य अंतर का निपटान किया जाता है। भारतीय रुपये के NDF सौदे मुख्य रूप से सिंगापुर, लंदन और दुबई जैसे वैश्विक वित्तीय केंद्रों में होते हैं। कई बार इन बाजारों में कारोबार की मात्रा घरेलू बाजार से भी अधिक हो जाती है।
आलोचकों का तर्क है कि जब रुपये की कीमत का बड़ा हिस्सा विदेशी बाजारों में तय होने लगे तो भारत की मुद्रा नीति पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ सकता है। भिमानी का कहना है कि भारत के पास चीन जैसा कोई संस्थागत “चोकपॉइंट” नहीं है जो ऑफशोर बाजारों को प्रभावित कर सके। यही कारण है कि उन्होंने वानखेड़े और लॉर्ड्स क्रिकेट मैदान का उदाहरण दिया। उनके अनुसार, भारत घरेलू मैदान पर मैच खेल रहा है, लेकिन अंतिम स्कोर पर असर विदेशी मैदान में खेले जा रहे मुकाबले का भी पड़ रहा है।
हालांकि अर्थशास्त्रियों का एक बड़ा वर्ग चीन के मॉडल को भारत के लिए आदर्श नहीं मानता। उनका कहना है कि भारत की आर्थिक संरचना, राजनीतिक व्यवस्था और वैश्विक वित्तीय एकीकरण का स्तर चीन से अलग है। चीन लंबे समय तक पूंजी नियंत्रण और सीमित वित्तीय उदारीकरण के साथ आगे बढ़ा, जबकि भारत धीरे-धीरे वैश्विक निवेशकों के लिए अपने बाजार खोलता रहा है।
यदि भारत चीन की तरह कड़े मुद्रा नियंत्रण लागू करता है तो विदेशी निवेश प्रभावित हो सकता है। वैश्विक फंड्स और संस्थागत निवेशक आमतौर पर ऐसे बाजारों को प्राथमिकता देते हैं जहां पूंजी का प्रवेश और निकास अपेक्षाकृत आसान हो। अत्यधिक नियंत्रण से निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
दूसरी ओर, चीन समर्थक तर्क देते हैं कि मुद्रा पर अधिक नियंत्रण से विनिमय दर में स्थिरता आती है। इससे निर्यातकों को दीर्घकालिक योजना बनाने में मदद मिलती है और बाहरी वित्तीय झटकों का प्रभाव कम किया जा सकता है। यही वजह है कि चीन की मुद्रा कई वर्षों तक अपेक्षाकृत नियंत्रित दायरे में रही।
भारत के लिए वास्तविक चुनौती संतुलन बनाने की है। एक तरफ देश को वैश्विक निवेश आकर्षित करना है, वहीं दूसरी ओर रुपये को अत्यधिक अस्थिरता से बचाना भी जरूरी है। पिछले कुछ वर्षों में RBI ने विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाकर और समय-समय पर हस्तक्षेप करके इसी संतुलन को बनाए रखने की कोशिश की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए चीन की पूरी व्यवस्था अपनाने से ज्यादा महत्वपूर्ण यह समझना है कि मुद्रा बाजारों में संस्थागत क्षमता कैसे मजबूत की जाए। घरेलू डेरिवेटिव बाजार को गहरा बनाना, रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना और ऑफशोर बाजारों पर निर्भरता कम करना ऐसे कदम हो सकते हैं जिन पर आने वाले वर्षों में ज्यादा ध्यान दिया जाएगा।
फिलहाल बहस जारी है। लेकिन एक बात साफ है कि जैसे-जैसे भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे रुपये की वैश्विक भूमिका, उसके मूल्य निर्धारण और मुद्रा प्रबंधन को लेकर चर्चाएं और तेज होंगी। चीन का मॉडल भारत के लिए सीधा समाधान हो या न हो, लेकिन उसने यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था में मजबूत मुद्रा नीति कितनी महत्वपूर्ण होने वाली है।


