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शेयर बाज़ार

Share Market Fall: पश्चिम एशिया में तनाव से शेयर बाजार धड़ाम, निवेशकों के ₹5 लाख करोड़ स्वाहा, सेंसेक्स 719 अंक टूटा

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/28 at 6:56 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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8 Min Read
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नई दिल्ली: सप्ताह के पहले कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार में भारी बिकवाली देखने को मिली। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी। इसका असर घरेलू बाजार पर भी साफ दिखाई दिया। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) का 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 719.08 अंक टूटकर 73,524.26 पर बंद हुआ, जबकि नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) का निफ्टी 50 इंडेक्स 243.70 अंक फिसलकर 23,123 के स्तर पर आ गया।

Contents
पश्चिम एशिया का तनाव भारतीय शेयर बाजार पर कितना भारी पड़ सकता है?किन शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट रही?एशियाई बाजारों में भी मचा हड़कंपरुपये पर भी पड़ा दबावनिवेशकों को क्या करना चाहिए?

दिनभर की बिकवाली के चलते निवेशकों की संपत्ति में भारी गिरावट दर्ज की गई। बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन घटकर लगभग 456 लाख करोड़ रुपये रह गया। अनुमान है कि केवल एक दिन में निवेशकों को करीब 5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

बाजार में कमजोरी केवल भारतीय शेयरों तक सीमित नहीं रही। एशिया के अधिकांश प्रमुख बाजारों में भी तेज गिरावट देखने को मिली। इससे साफ संकेत मिला कि निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से दूरी बनाकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।

पश्चिम एशिया का तनाव भारतीय शेयर बाजार पर कितना भारी पड़ सकता है?

मौजूदा गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता सैन्य तनाव माना जा रहा है। ईरान द्वारा इजरायल पर मिसाइल हमले किए जाने की खबरों ने वैश्विक बाजारों में चिंता बढ़ा दी है। इससे पहले अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की उम्मीद जताई जा रही थी, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने निवेशकों की धारणा को झटका दिया है।

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में मध्य पूर्व में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव सीधे तौर पर भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। निवेशकों को डर है कि यदि संघर्ष और बढ़ता है तो तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे कच्चे तेल की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं।

ऊंचे कच्चे तेल के दाम भारत के लिए कई मोर्चों पर चुनौती पैदा करते हैं। इससे आयात बिल बढ़ता है, चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, महंगाई पर दबाव बनता है और कंपनियों की लागत बढ़ जाती है। यही कारण है कि बाजार ने इस खबर पर नकारात्मक प्रतिक्रिया दी।

ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 4.15 प्रतिशत उछलकर 96.95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई। हालांकि भारतीय बास्केट का औसत मूल्य 96 डॉलर के आसपास बना हुआ है, लेकिन निवेशकों को डर है कि यदि तनाव जारी रहा तो कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर भी जा सकती हैं।

किन शेयरों में सबसे ज्यादा गिरावट रही?

सेंसेक्स के 30 शेयरों में से 24 गिरावट के साथ बंद हुए। सबसे अधिक दबाव ऑटो, मेटल, फाइनेंशियल और कंजम्प्शन सेक्टर में देखा गया।

इटरनल (पूर्व में जोमैटो) में सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई। इसके अलावा महिंद्रा एंड महिंद्रा, टाटा स्टील, बजाज फाइनेंस, ट्रेंट, बजाज फिनसर्व, रिलायंस इंडस्ट्रीज, इंडिगो, लार्सन एंड टुब्रो तथा टीसीएस जैसे दिग्गज शेयरों में भी उल्लेखनीय कमजोरी रही।

विश्लेषकों का मानना है कि जब भी वैश्विक अनिश्चितता बढ़ती है तो निवेशक सबसे पहले उन सेक्टरों से पैसा निकालते हैं जिनका मूल्यांकन अपेक्षाकृत ऊंचा होता है। इसी कारण कई बड़े निजी क्षेत्र के शेयरों में दबाव देखा गया।

दूसरी ओर कुछ डिफेंसिव और यूटिलिटी शेयरों में मजबूती दिखाई दी। पावरग्रिड, भारती एयरटेल, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड (BEL), टेक महिंद्रा, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और सन फार्मा बढ़त के साथ बंद हुए। यह दर्शाता है कि निवेशक ऐसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ा रहे हैं जिन्हें अनिश्चित परिस्थितियों में अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता है।

एशियाई बाजारों में भी मचा हड़कंप

भारतीय बाजारों की तरह एशियाई शेयर बाजारों में भी भारी बिकवाली देखने को मिली। दक्षिण कोरिया का बाजार 9 प्रतिशत से अधिक गिर गया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि एक्सचेंज को अस्थायी रूप से ट्रेडिंग रोकनी पड़ी।

जापान का निक्केई इंडेक्स लगभग 5 प्रतिशत तक लुढ़क गया। हांगकांग का हैंगसेंग और चीन का शंघाई कंपोजिट भी एक प्रतिशत से अधिक टूट गया। वैश्विक निवेशकों की बढ़ती चिंता का असर लगभग सभी प्रमुख बाजारों पर दिखाई दिया।

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की गतिविधियों पर भी बाजार की नजर बनी हुई है। यदि वैश्विक जोखिम बढ़ता है तो विदेशी निवेशक उभरते बाजारों से पैसा निकाल सकते हैं, जिसका असर भारतीय शेयर बाजार पर और अधिक पड़ सकता है।

रुपये पर भी पड़ा दबाव

शेयर बाजार में गिरावट के साथ भारतीय मुद्रा पर भी दबाव दिखाई दिया। रुपया डॉलर के मुकाबले करीब 0.8 प्रतिशत कमजोर होकर 95.7075 के स्तर पर बंद हुआ। पिछले कारोबारी सत्र में यह 94.9450 पर बंद हुआ था।

रुपये में कमजोरी का प्रमुख कारण कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और वैश्विक स्तर पर डॉलर की मांग बढ़ना माना जा रहा है। यदि तेल महंगा बना रहता है तो भारतीय कंपनियों के आयात खर्च में बढ़ोतरी हो सकती है, जिससे कॉर्पोरेट मुनाफे पर असर पड़ सकता है।

निवेशकों को क्या करना चाहिए?

बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि भू-राजनीतिक तनाव के कारण अल्पकालिक उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। हालांकि लंबी अवधि के निवेशकों को घबराकर फैसले लेने से बचना चाहिए।

इतिहास बताता है कि युद्ध, तेल संकट या वैश्विक तनाव जैसी घटनाओं के दौरान बाजारों में तेज गिरावट आती है, लेकिन समय के साथ बाजार फिर से संतुलन बना लेते हैं। ऐसे समय में मजबूत बैलेंस शीट वाली कंपनियों और गुणवत्ता वाले शेयरों पर ध्यान देना अधिक उपयुक्त माना जाता है।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ता है तथा कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंचता है तो भारतीय बाजारों पर अतिरिक्त दबाव देखने को मिल सकता है। वहीं यदि कूटनीतिक समाधान निकलता है तो बाजारों में तेज रिकवरी भी संभव है।

फिलहाल निवेशकों की नजर पश्चिम एशिया की स्थिति, कच्चे तेल की चाल, विदेशी निवेशकों के रुख और रुपये की दिशा पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में यही कारक भारतीय शेयर बाजार की दिशा तय कर सकते हैं।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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