नई दिल्ली। वैश्विक अर्थव्यवस्था इस समय कई चुनौतियों का सामना कर रही है। रूस-यूक्रेन संघर्ष, मध्य पूर्व में बढ़ता तनाव, ऊंची ऊर्जा कीमतें और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती जैसी परिस्थितियों के बीच दुनिया भर के अर्थशास्त्री विकास दर को लेकर चिंतित हैं। भारत भी इन चर्चाओं से अछूता नहीं है। हाल के महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और वैश्विक अनिश्चितताओं के चलते कई विशेषज्ञों ने भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार को लेकर सवाल उठाए हैं। हालांकि, वर्ल्ड बैंक में भारत के नए एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य नीलकंठ मिश्रा का मानना है कि भारत की आर्थिक स्थिति को लेकर जो चिंता जताई जा रही है, उसका बड़ा हिस्सा वास्तविकता से अधिक है।
एएनआई को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में नीलकंठ मिश्रा ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियादी स्थिति मजबूत बनी हुई है। उनके अनुसार, अगर हालिया वित्तीय और मौद्रिक सख्ती के बावजूद देश 7% से अधिक की विकास दर हासिल कर सकता है, तो यह इस बात का संकेत है कि अर्थव्यवस्था में वास्तविक ताकत मौजूद है। उन्होंने यहां तक कहा कि कई संकेतक बताते हैं कि भारत 8% से अधिक की विकास दर हासिल करने की क्षमता रखता है।
सख्ती के बावजूद मजबूत रही भारतीय अर्थव्यवस्था
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने महंगाई को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखा। दूसरी ओर सरकार ने भी राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए खर्चों को संतुलित करने की रणनीति अपनाई। आमतौर पर ऐसी परिस्थितियों में आर्थिक गतिविधियों की गति धीमी पड़ सकती है।
लेकिन नीलकंठ मिश्रा का कहना है कि भारत ने इसके बावजूद मजबूत प्रदर्शन किया है। उनके मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में भारतीय अर्थव्यवस्था लगभग 7.1% की दर से बढ़ी। यह ऐसे समय में हुआ जब दुनिया की कई बड़ी अर्थव्यवस्थाएं धीमी वृद्धि या आर्थिक दबाव का सामना कर रही थीं।
उन्होंने कहा कि यदि मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों में इतनी सख्ती नहीं होती तो विकास दर और अधिक हो सकती थी। यह भारतीय अर्थव्यवस्था की अंदरूनी मजबूती का स्पष्ट संकेत है।
8% से अधिक विकास दर का दावा क्यों?
नीलकंठ मिश्रा का मानना है कि केवल जीडीपी आंकड़ों को देखकर अर्थव्यवस्था का आकलन नहीं किया जाना चाहिए। कई अन्य संकेतक भी आर्थिक गतिविधियों की वास्तविक तस्वीर दिखाते हैं।
उन्होंने बताया कि हाल के महीनों में वाहन बिक्री में उल्लेखनीय तेजी देखने को मिली है। मई महीने में कारों की बिक्री में सालाना आधार पर करीब 29% की बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसके अलावा शॉपिंग मॉल्स में ग्राहकों की संख्या और बिक्री दोनों में मजबूती बनी हुई है।
सीमेंट की मांग को भी उन्होंने अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण संकेतक बताया। उनके अनुसार, सीमेंट ऐसा उत्पाद नहीं है जिसे लंबे समय तक स्टॉक करके रखा जाए। यदि इसकी मांग बढ़ रही है तो इसका सीधा मतलब है कि निर्माण गतिविधियां तेज हैं और निवेश का माहौल मजबूत बना हुआ है।
उनका अनुमान है कि बेहतर क्रेडिट ग्रोथ, मजबूत घरेलू मांग और इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश के कारण फरवरी-मार्च 2026 तक भारतीय अर्थव्यवस्था 8% से अधिक की वार्षिक रफ्तार के करीब पहुंच चुकी थी।
कच्चे तेल की कीमतों को लेकर क्यों बढ़ती है चिंता?
भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में से एक है। देश अपनी जरूरत का लगभग 85% तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का असर भारत पर भी पड़ता है।
जब कच्चा तेल महंगा होता है तो पेट्रोल, डीजल, परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इससे महंगाई बढ़ने का जोखिम पैदा होता है। साथ ही चालू खाता घाटा (Current Account Deficit) और आयात बिल भी बढ़ सकता है।
इसी वजह से जब भी ब्रेंट क्रूड 90 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर जाता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ने लगती है। फिलहाल अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत लगभग 94-95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई है।
नीलकंठ मिश्रा क्यों मानते हैं कि असर बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है?
मिश्रा का तर्क है कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर उतना गंभीर नहीं होता जितना अक्सर चर्चा में बताया जाता है। इसके पीछे उन्होंने भारत की रिफाइनिंग क्षमता को प्रमुख कारण बताया।
भारत केवल कच्चा तेल आयात नहीं करता, बल्कि उसे रिफाइन कर विभिन्न पेट्रोलियम उत्पाद भी तैयार करता है। जब रिफाइनिंग मार्जिन मजबूत होते हैं तो तेल की ऊंची कीमतों का कुछ हिस्सा संतुलित हो जाता है।
उन्होंने कहा कि घरेलू तेल विपणन कंपनियां केवल ईंधन बेचने पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि रिफाइनिंग कारोबार से भी कमाई करती हैं। यही कारण है कि ऊंचे कच्चे तेल के बावजूद स्थिति उतनी गंभीर नहीं बनती जितनी आशंका जताई जाती है।
उनके अनुसार, ईंधन कीमतों में बड़े पैमाने पर बढ़ोतरी की आवश्यकता नहीं है और अप्रत्यक्ष ईंधन सब्सिडी को लेकर व्यक्त की जा रही कई चिंताएं भी वास्तविकता से अधिक हैं।
100 डॉलर प्रति बैरल तेल होने पर क्या होगा?
अर्थशास्त्रियों के बीच लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर का तेल भारत की अर्थव्यवस्था पर कितना असर डाल सकता है।
नीलकंठ मिश्रा का अनुमान है कि यदि तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचती है तो इससे आर्थिक विकास दर पर लगभग 2% तक का दबाव पड़ सकता है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पटरी से उतर जाएगी।
उन्होंने इसकी तुलना विपरीत दिशा में उड़ने वाले विमान से की। विमान की गति थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन वह अपनी मंजिल तक पहुंचना बंद नहीं करता। इसी तरह ऊंची ऊर्जा कीमतें विकास की रफ्तार को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन भारत की विकास यात्रा को रोक नहीं सकतीं।
चीन और अमेरिका से भी मिल रही राहत
मिश्रा ने कहा कि वैश्विक तेल बाजार में कुछ ऐसे कारक भी हैं जो कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद कर रहे हैं। चीन और अमेरिका द्वारा तेल भंडार से अतिरिक्त आपूर्ति जारी किए जाने से कीमतों पर दबाव कम हुआ है।
उनके अनुसार, जिस 20-30 रुपये प्रति लीटर की अप्रत्यक्ष सब्सिडी को लेकर चिंता जताई जाती है, उसकी आवश्यकता नहीं है। उनका मानना है कि लगभग 8 रुपये प्रति लीटर का सुरक्षा कवच पर्याप्त साबित हो सकता है।
यह दृष्टिकोण उन आशंकाओं को कमजोर करता है जिनमें कहा जाता है कि तेल की ऊंची कीमतें भारत की वित्तीय स्थिति को गंभीर रूप से प्रभावित कर देंगी।
क्रूड ऑयल सस्ता हुआ तो अर्थव्यवस्था को मिलेगा बड़ा फायदा
नीलकंठ मिश्रा का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतें घटकर 80 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आती हैं तो भारतीय अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त बढ़ावा मिल सकता है।
इससे महंगाई पर दबाव कम होगा, सरकार का सब्सिडी बोझ घटेगा और उर्वरक क्षेत्र को भी राहत मिलेगी। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में मार्च 2027 तक उर्वरक कीमतों पर कैप जैसी सरकारी सहायता की जरूरत भी कम हो सकती है।
तेल की कीमतों में गिरावट से उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति बढ़ेगी और उद्योगों की लागत भी कम होगी। इसका सकारात्मक प्रभाव निवेश, उत्पादन और रोजगार पर दिखाई दे सकता है।
RBI, सरकार और निवेशकों के लिए क्या संकेत?
भारतीय रिजर्व बैंक लगातार महंगाई और विकास दर के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। यदि आर्थिक गतिविधियां मजबूत बनी रहती हैं और तेल की कीमतें नियंत्रित होती हैं तो भविष्य में मौद्रिक नीति के लिए भी परिस्थितियां अनुकूल हो सकती हैं।
निवेशकों के लिए भी यह संकेत महत्वपूर्ण है। मजबूत आर्थिक विकास का फायदा बैंकिंग, ऑटोमोबाइल, सीमेंट, इंफ्रास्ट्रक्चर और उपभोक्ता क्षेत्र की कंपनियों को मिल सकता है। यही वजह है कि घरेलू और विदेशी निवेशक भारत को दुनिया की सबसे आकर्षक उभरती अर्थव्यवस्थाओं में से एक मानते हैं।
क्या भारत वास्तव में 8% ग्रोथ के करीब पहुंच सकता है?
भारत फिलहाल दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। सरकार का इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा और मजबूत घरेलू मांग विकास के प्रमुख आधार बने हुए हैं।
हालांकि जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। कच्चे तेल की कीमतें, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, अमेरिकी ब्याज दरें और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की स्थिति आने वाले समय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
फिर भी नीलकंठ मिश्रा का मानना है कि भारत की रिफाइनिंग क्षमता, मजबूत घरेलू खपत, बेहतर क्रेडिट ग्रोथ और नीतिगत स्थिरता अर्थव्यवस्था को 7.5% से 8% की रेंज में बनाए रखने में मदद कर सकती है। उनके अनुसार, सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक मजबूती को लेकर बने नकारात्मक नैरेटिव को बदलना है। यदि आने वाले महीनों में आर्थिक आंकड़े इसी मजबूती की पुष्टि करते हैं, तो भारत दुनिया की सबसे तेज गति से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।


