दुनिया में सस्ता हुआ सोना, भारत में क्यों बढ़ गए दाम?
नई दिल्ली। आमतौर पर जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में गिरावट आती है तो उसका असर भारतीय बाजार पर भी दिखाई देता है। लेकिन मई 2026 में तस्वीर कुछ अलग रही। दुनिया भर में सोने के दाम नरम पड़े, जबकि भारत में इस कीमती धातु की कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई। यही वजह है कि निवेशकों और ज्वेलरी खरीदारों के बीच यह सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर दुनिया में सोना सस्ता होने के बावजूद भारत में इसकी कीमतें क्यों बढ़ीं।
HighLights
- मई 2026 में भारत में सोने की कीमतों में 4.1% की बढ़ोतरी दर्ज हुई।
- वैश्विक बाजार में इसी दौरान सोने के दाम 1.4% घट गए।
- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और घरेलू मांग ने भारतीय बाजार को सहारा दिया।
- वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल ने आगे भी मांग मजबूत रहने की उम्मीद जताई है।
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल (WGC) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार मई महीने में भारत में सोने की कीमतों में 4.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि वैश्विक स्तर पर सोने के दाम 1.4 प्रतिशत गिर गए। रिपोर्ट बताती है कि मई के अंत तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना लगभग 4,546 डॉलर प्रति औंस के स्तर पर था और अधिकांश प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले इसमें कमजोरी देखी गई।
हालांकि भारत और तुर्की उन चुनिंदा देशों में शामिल रहे जहां सोने की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई। इसका मुख्य कारण घरेलू मांग, भू-राजनीतिक तनाव और निवेशकों का सुरक्षित निवेश की ओर झुकाव रहा।
पश्चिम एशिया में तनाव का सीधा असर
विशेषज्ञों का कहना है कि मई महीने के दौरान पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी। जब भी दुनिया में युद्ध, संघर्ष या आर्थिक संकट जैसी परिस्थितियां बनती हैं तो निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर रुख करते हैं। सोना लंबे समय से ऐसी परिस्थितियों में सबसे भरोसेमंद निवेश माना जाता रहा है।
इसी कारण भारतीय निवेशकों ने भी सोने में खरीदारी बढ़ाई। ज्वेलरी के अलावा निवेश के उद्देश्य से भी सोने की मांग मजबूत बनी रही। बढ़ती मांग ने घरेलू बाजार में कीमतों को ऊपर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
रुपये की चाल भी बनी बड़ी वजह
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना आयात करता है। इसलिए भारतीय बाजार में सोने की कीमत केवल अंतरराष्ट्रीय दरों पर निर्भर नहीं करती बल्कि डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति भी अहम भूमिका निभाती है।
यदि वैश्विक बाजार में सोना सस्ता हो जाए लेकिन डॉलर मजबूत बना रहे या रुपया कमजोर हो जाए तो भारतीय आयातकों की लागत बढ़ जाती है। इसका असर सीधे घरेलू कीमतों पर दिखाई देता है। मई के दौरान विदेशी मुद्रा बाजार में उतार-चढ़ाव ने भी भारतीय बाजार में सोने को महंगा बनाए रखने में योगदान दिया।
क्या प्रधानमंत्री मोदी ने सोना खरीदने से बचने की अपील की?
हाल के सप्ताहों में ऐसी चर्चाएं सामने आईं कि सरकार बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए नागरिकों को अनावश्यक खरीदारी से बचने की सलाह दे रही है। हालांकि सोने की मांग पर इसका कोई बड़ा असर नहीं दिखा और निवेशकों ने अनिश्चित माहौल में सोने को सुरक्षित विकल्प के रूप में देखा।
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में सोना केवल निवेश का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा भी है। यही कारण है कि कीमतें बढ़ने के बावजूद मांग पूरी तरह कमजोर नहीं पड़ती।
क्या आगे भी बढ़ सकती हैं कीमतें?
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल का मानना है कि भले ही अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व आने वाले महीनों में ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपनाए, फिर भी भारत जैसे बड़े उपभोक्ता बाजारों की मांग सोने को समर्थन देती रहेगी।
आमतौर पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी को सोने के लिए नकारात्मक माना जाता है क्योंकि इससे निवेशक बॉन्ड और अन्य ब्याज देने वाली परिसंपत्तियों की ओर आकर्षित होते हैं। लेकिन WGC का कहना है कि इतिहास में कई बार ऐसा देखा गया है कि फेडरल रिजर्व की सख्ती के बावजूद सोने ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया।
रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले कई ब्याज दर वृद्धि चक्रों में आधे से अधिक अवसरों पर सोने ने सकारात्मक रिटर्न दिया है। इसका कारण यह है कि आर्थिक अनिश्चितता और मुद्रास्फीति की चिंताएं निवेशकों को सोने की ओर आकर्षित करती रहती हैं।
भारत और चीन की मांग क्यों महत्वपूर्ण है?
सोने की वैश्विक मांग में भारत और चीन की हिस्सेदारी सबसे अधिक मानी जाती है। इसके अलावा दुनिया भर के केंद्रीय बैंक भी लगातार अपने गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहे हैं।
WGC का कहना है कि भारत, चीन और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी अमेरिकी ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव से बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं होती। यही वजह है कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती के दौरान भी सोने को मजबूत समर्थन मिलता रहता है।
पिछले कुछ वर्षों में कई देशों ने डॉलर पर निर्भरता कम करने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा बढ़ाया है। इस प्रवृत्ति ने भी सोने की कीमतों को दीर्घकालिक समर्थन प्रदान किया है।
गोल्ड ETF में निवेश घटने से बढ़ी चिंता
हालांकि रिपोर्ट में कुछ चेतावनी संकेत भी दिए गए हैं। मई महीने के दौरान वैश्विक स्तर पर गोल्ड ETF में निवेश कमजोर रहा। कई बाजारों में मांग घटने के शुरुआती संकेत भी दिखाई दिए हैं।
यदि आने वाले महीनों में निवेशकों की रुचि कम होती है और वैश्विक तनाव कम होता है तो सोने की कीमतों पर दबाव बन सकता है। हालांकि फिलहाल मजबूत भौतिक मांग और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी बाजार को सहारा देती हुई नजर आ रही है।
निवेशकों के लिए क्या है संकेत?
विशेषज्ञों का मानना है कि सोना आज भी पोर्टफोलियो में विविधता लाने का एक महत्वपूर्ण साधन बना हुआ है। हालांकि हालिया तेजी के बाद निवेशकों को एकमुश्त बड़ी रकम लगाने के बजाय चरणबद्ध निवेश की रणनीति अपनानी चाहिए।
मई 2026 के आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि भारतीय सोना बाजार केवल अंतरराष्ट्रीय कीमतों से संचालित नहीं होता। घरेलू मांग, रुपये की स्थिति, आयात लागत और भू-राजनीतिक घटनाएं भी इसकी दिशा तय करती हैं। यही वजह है कि दुनिया में सोना सस्ता होने के बावजूद भारत में इसकी कीमतें 4.1 प्रतिशत बढ़ गईं।
निष्कर्ष
वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल की रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक कमजोरी के बावजूद भारतीय बाजार में सोने की मजबूत मांग बनी हुई है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, निवेशकों की सुरक्षित निवेश की तलाश और केंद्रीय बैंकों की खरीदारी ने सोने को सहारा दिया है। आने वाले महीनों में फेडरल रिजर्व की नीतियां, वैश्विक आर्थिक हालात और भारत-चीन की मांग सोने की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी।


