नई दिल्ली। कभी सिर्फ 1,200 रुपये उधार लेकर चांदी के गहनों का कारोबार शुरू करने वाले राजेश मेहता को भारतीय ज्वेलरी उद्योग की बड़ी सफलता की कहानी माना जाता था। लेकिन अब वही कारोबारी भारतीय शेयर बाजार के सबसे चर्चित मामलों में घिर गए हैं। बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड और उसके चेयरमैन एवं प्रबंध निदेशक राजेश मेहता के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी करते हुए कई गंभीर वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा किया है।
Highlights
- सेबी ने राजेश एक्सपोर्ट्स और चेयरमैन राजेश मेहता के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी किया।
- कंपनी पर वित्तीय आंकड़ों में भारी अनियमितताओं के आरोप।
- 2021 से 2025 के बीच 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व को लेकर सवाल।
- LIC की कंपनी में 10.80% हिस्सेदारी, निवेशकों की चिंता बढ़ी।
- ₹1,200 के उधार से कारोबार शुरू करने वाले राजेश मेहता की सफलता पर अब गंभीर सवाल।
सेबी की प्रारंभिक जांच में दावा किया गया है कि कंपनी ने वित्त वर्ष 2021 से वित्त वर्ष 2025 के बीच अपने कंसोलिडेटेड रेवेन्यू को लेकर गलत जानकारी दी। जांच के अनुसार कंपनी द्वारा दिखाए गए राजस्व का लगभग 99.8 प्रतिशत हिस्सा वास्तविकता से मेल नहीं खाता था। यही वजह है कि मामला अब निवेशकों, नियामकों और बाजार विशेषज्ञों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
कौन हैं राजेश मेहता?
राजेश मेहता का जन्म 20 जून 1964 को बेंगलुरु में हुआ था। उन्होंने सेंट जोसेफ स्कूल से शिक्षा प्राप्त की और कम उम्र में ही अपने पिता के आभूषण कारोबार से जुड़ गए। 1980 के दशक की शुरुआत में उन्होंने अपने भाई प्रशांत मेहता के साथ चांदी के गहनों का व्यापार शुरू किया।
इस कारोबार को शुरू करने के लिए दोनों भाइयों ने अपने बड़े भाई से केवल 1,200 रुपये उधार लिए थे। उस समय भारत का ज्वेलरी कारोबार काफी हद तक असंगठित था, लेकिन मेहता भाइयों ने तेजी से बाजार में अपनी पहचान बनाई और दक्षिण भारत, गुजरात तथा मुंबई जैसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में थोक कारोबार फैलाया।
IPO से मिली बड़ी उड़ान
साल 1995 में राजेश एक्सपोर्ट्स ने शेयर बाजार में कदम रखा और आईपीओ के जरिए लगभग 10 करोड़ रुपये जुटाए। इसके बाद कंपनी ने सोने के कारोबार की पूरी वैल्यू चेन में प्रवेश किया।
कंपनी ने सोने की रिफाइनिंग, ज्वेलरी निर्माण, निर्यात और खुदरा बिक्री तक अपना नेटवर्क विकसित किया। अगले दो दशकों में राजेश एक्सपोर्ट्स भारत की सबसे बड़ी गोल्ड कंपनियों में शामिल हो गई।
जब दुनिया की नजर में आए राजेश मेहता
साल 2015 में कंपनी ने स्विट्जरलैंड की मशहूर गोल्ड रिफाइनरी Valcambi को लगभग 400 मिलियन डॉलर में खरीदा। यह सौदा पूरी तरह नकद भुगतान के जरिए किया गया था, जिसने वैश्विक बाजार में कंपनी की साख को काफी बढ़ाया।
इस अधिग्रहण के बाद राजेश एक्सपोर्ट्स को दुनिया की सबसे बड़ी गोल्ड रिफाइनिंग और प्रोसेसिंग कंपनियों में गिना जाने लगा। Forbes के अनुसार वर्ष 2019 में राजेश मेहता की अनुमानित संपत्ति 1.57 अरब डॉलर तक पहुंच गई थी।
सेबी ने क्या आरोप लगाए?
सेबी के अंतरिम आदेश के अनुसार कंपनी ने कथित रूप से अपने वित्तीय प्रदर्शन को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। जांच में यह भी सामने आया कि प्रमोटर से जुड़ी कुछ संस्थाओं के माध्यम से फंड के इस्तेमाल और कॉर्पोरेट गवर्नेंस से जुड़े कई सवाल खड़े हुए हैं।
नियामक का कहना है कि कंपनी के प्रमुख निर्णयों और वित्तीय गतिविधियों पर राजेश मेहता का सीधा नियंत्रण था। इसी आधार पर सेबी ने उन्हें अगले आदेश तक शेयर बाजार में किसी भी प्रकार की खरीद-बिक्री या कारोबार करने से रोक दिया है।
हालांकि यह अंतरिम आदेश है और अंतिम निष्कर्ष आगे की जांच और सुनवाई के बाद ही सामने आएगा।
LIC को क्यों लगा झटका?
राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरहोल्डिंग पैटर्न के अनुसार कंपनी में देश की सबसे बड़ी बीमा कंपनी LIC की लगभग 10.80 प्रतिशत हिस्सेदारी है।
सेबी के आदेश के बाद कंपनी का शेयर 5 प्रतिशत के लोअर सर्किट पर पहुंच गया। इसके चलते निवेशकों के बीच चिंता बढ़ गई कि यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो बड़े संस्थागत निवेशकों को भी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
इसी चिंता के चलते LIC के शेयरों में भी एक प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखने को मिली।
निवेशकों के लिए क्या हैं मायने?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं है। यह कॉर्पोरेट गवर्नेंस, वित्तीय पारदर्शिता और नियामकीय निगरानी की मजबूती से भी जुड़ा हुआ है।
यदि सेबी के आरोप आगे चलकर साबित होते हैं तो यह भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास के सबसे बड़े वित्तीय विवादों में शामिल हो सकता है। वहीं यदि कंपनी अपने पक्ष में पर्याप्त सबूत पेश करती है तो तस्वीर बदल भी सकती है।
फिलहाल निवेशकों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे किसी भी कंपनी में निवेश करते समय केवल राजस्व और मुनाफे के आंकड़ों पर नहीं, बल्कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस और पारदर्शिता पर भी ध्यान दें।
निष्कर्ष
राजेश मेहता की कहानी कभी भारतीय उद्यमिता की प्रेरक मिसाल मानी जाती थी। 1,200 रुपये के छोटे से उधार से शुरू होकर अरबों डॉलर के कारोबारी साम्राज्य तक पहुंचने का उनका सफर लंबे समय तक सफलता की कहानी रहा। लेकिन सेबी की ताजा कार्रवाई ने इस कहानी पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आने वाले महीनों में जांच के निष्कर्ष तय करेंगे कि यह मामला भारतीय कॉर्पोरेट जगत के सबसे बड़े विवादों में बदलता है या फिर कंपनी अपने ऊपर लगे आरोपों का सफलतापूर्वक जवाब दे पाती है।


