नई दिल्ली। भारत वैश्विक व्यापार और निवेश के क्षेत्र में अपनी स्थिति को और मजबूत करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार को विदेशी निवेशकों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत के दरवाजे व्यापारिक साझेदारियों के लिए पूरी तरह खुले हैं और आने वाले महीनों में कई महत्वपूर्ण फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) लागू होने जा रहे हैं। सरकार का लक्ष्य वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका को मजबूत करना और विदेशी निवेश को नई गति देना है।
गोयल ने कहा कि 1 जून से ओमान के साथ लागू हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के बाद अगले छह महीनों में दो से तीन और समझौते प्रभावी हो सकते हैं। वहीं, अगले 9 से 10 महीनों के भीतर पाइपलाइन में मौजूद सभी नौ एफटीए के लागू होने की उम्मीद है। यह भारत की निर्यात क्षमता, विनिर्माण क्षेत्र और निवेश माहौल को बड़ा बढ़ावा दे सकता है।
FTA क्यों हैं भारत के लिए महत्वपूर्ण?
फ्री ट्रेड एग्रीमेंट दो या अधिक देशों के बीच ऐसा व्यापारिक समझौता होता है जिसके तहत आयात-निर्यात पर लगने वाले शुल्कों को कम या समाप्त किया जाता है। इससे व्यापार आसान होता है, उत्पादों की लागत घटती है और कंपनियों को नए बाजारों तक पहुंच मिलती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के लिए नए एफटीए कई मायनों में फायदेमंद साबित हो सकते हैं:
- भारतीय निर्यातकों को नए बाजार मिलेंगे।
- विदेशी निवेश आकर्षित होगा।
- विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा मिलेगा।
- रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।
- वैश्विक सप्लाई चेन में भारत की भागीदारी बढ़ेगी।
निवेशकों के लिए भरोसेमंद विकल्प बन रहा भारत
पीयूष गोयल ने कहा कि दुनिया भारत को अब केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार नहीं बल्कि विनिर्माण और निवेश के लिए विश्वसनीय विकल्प के रूप में देख रही है। वैश्विक कंपनियां चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति के तहत भारत की ओर रुख कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि अगले दो दशकों तक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रह सकता है। मजबूत घरेलू मांग, युवा आबादी, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और सरकार की सुधारवादी नीतियां इस विकास की प्रमुख ताकत हैं।
पश्चिम एशिया संकट के बावजूद ऊर्जा आपूर्ति सामान्य
हाल के महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बने जोखिमों ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों को प्रभावित किया है। इसके बावजूद भारत ने ऊर्जा आपूर्ति को स्थिर बनाए रखा है।
गोयल के अनुसार सरकार ने पहले ही ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की रणनीति अपनाई थी, जिसका फायदा मौजूदा संकट के दौरान मिला। इसके चलते:
- पेट्रोल और डीजल की उपलब्धता प्रभावित नहीं हुई।
- विमानन टरबाइन ईंधन (ATF) की आपूर्ति सामान्य रही।
- उद्योगों के लिए एलएनजी उपलब्ध रही।
- घरेलू उपभोक्ताओं को एलपीजी की निर्बाध आपूर्ति जारी रही।
महंगाई पर नियंत्रण रखने में मिली सफलता
वैश्विक स्तर पर ऊर्जा कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति संबंधी चुनौतियों के बावजूद भारत ने महंगाई को नियंत्रित रखने में अपेक्षाकृत सफलता हासिल की है।
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि सरकार किसानों को उर्वरक पुरानी कीमतों पर उपलब्ध करा रही है। जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में वृद्धि हुई है, लेकिन उसका पूरा बोझ किसानों पर नहीं डाला गया। इससे कृषि क्षेत्र को राहत मिली है और खाद्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने में मदद मिली है।
असेंबली से इनोवेशन हब बनने की ओर बढ़ रहा भारत
गोयल ने कहा कि भारत अब केवल असेंबली आधारित अर्थव्यवस्था नहीं रहना चाहता। सरकार का फोकस देश को इनोवेशन, डिजाइन, रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का वैश्विक केंद्र बनाने पर है।
उन्होंने बताया कि देश में नई तकनीकों के विकास, स्टार्टअप इकोसिस्टम और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जा रहा है। इसका उद्देश्य उच्च मूल्य वाले विनिर्माण और तकनीकी विकास को प्रोत्साहित करना है।
ग्रीन एनर्जी और डेटा सेंटर सेक्टर पर बड़ा फोकस
भारत तेजी से स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है। सरकार का मानना है कि आने वाले वर्षों में डेटा सेंटर, एआई और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग जैसी गतिविधियों के लिए विशाल ऊर्जा क्षमता की आवश्यकता होगी।
इसी को ध्यान में रखते हुए:
- सौर ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार किया जा रहा है।
- पवन ऊर्जा क्षमता बढ़ाई जा रही है।
- ग्रीन हाइड्रोजन मिशन पर काम तेज किया गया है।
- डेटा सेंटर सेक्टर को स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ने की रणनीति बनाई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीन एनर्जी में निवेश भारत को वैश्विक तकनीकी कंपनियों के लिए और आकर्षक बना सकता है।
भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?
यदि अगले 9-10 महीनों में प्रस्तावित सभी एफटीए लागू हो जाते हैं तो इसका असर कई क्षेत्रों पर दिखाई दे सकता है।
सबसे अधिक लाभ इंजीनियरिंग, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल, ऑटोमोबाइल कंपोनेंट्स, कृषि निर्यात और आईटी सेवाओं को मिल सकता है। वहीं विदेशी कंपनियों के लिए भारत में उत्पादन इकाइयां स्थापित करना अधिक आकर्षक हो सकता है।
इसके अलावा नए समझौते भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देने के साथ-साथ निर्यात बढ़ाने में भी मदद कर सकते हैं।
आगे क्या?
सरकार आने वाले महीनों में कई महत्वपूर्ण व्यापारिक समझौतों को अंतिम रूप देने की दिशा में काम कर रही है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बीच भारत खुद को एक स्थिर, भरोसेमंद और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।
यदि घोषित योजनाएं तय समय पर लागू होती हैं, तो अगले एक वर्ष में भारत के व्यापार, निवेश और विनिर्माण क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। यही कारण है कि वैश्विक निवेशकों की नजरें अब पहले से कहीं अधिक भारत पर टिकी हुई हैं।


