China Floating Solar Panels: पानी पर बिछा दिए 23 लाख सोलर पैनल, चीन की इस तैयारी को देखकर हर्ष गोयनका भी बोले- ‘माइंड बॉगलिंग’
नई दिल्ली। दुनिया इस समय ऊर्जा सुरक्षा की नई लड़ाई लड़ रही है। मध्य-पूर्व में जारी तनाव, तेल और गैस आपूर्ति पर बढ़ते खतरे तथा जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच देश तेजी से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ रहे हैं। इसी बीच चीन ने ऐसा कदम उठाया है जिसने भारत के जाने-माने उद्योगपति हर्ष गोयनका को भी हैरान कर दिया है।
आरपीजी ग्रुप के चेयरमैन हर्ष गोयनका ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो साझा किया है, जिसमें समुद्र के ऊपर विशाल क्षेत्र में फैले सोलर पैनल दिखाई दे रहे हैं। वीडियो देखकर उन्होंने इसे “माइंड बॉगलिंग” यानी हैरान कर देने वाला बताया। दरअसल, चीन अब सिर्फ जमीन पर ही नहीं बल्कि समुद्र के ऊपर भी विशाल सौर ऊर्जा परियोजनाएं विकसित कर रहा है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल एक सोलर प्रोजेक्ट नहीं है बल्कि भविष्य की ऊर्जा रणनीति का हिस्सा है। चीन का लक्ष्य जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करना और आने वाले दशकों के लिए स्वच्छ ऊर्जा क्षमता को तेजी से बढ़ाना है।
क्यों चर्चा में है चीन का यह प्रोजेक्ट?
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार चीन ने शेडोंग प्रांत के डोंगयिंग क्षेत्र के पास दुनिया की सबसे बड़ी ऑफशोर सौर ऊर्जा परियोजनाओं में से एक विकसित की है। HG14 नाम का यह प्रोजेक्ट दिसंबर 2025 के अंत में पूरी तरह ग्रिड से जुड़ चुका है।
यह परियोजना लगभग 1,223 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है और समुद्र तट से करीब 8 किलोमीटर दूर स्थित है। यहां पानी की गहराई 1 से 4 मीटर के बीच है। परियोजना का आकार इतना बड़ा है कि यह लाखों घरों को बिजली उपलब्ध कराने की क्षमता रखती है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसमें 23 लाख से अधिक सोलर पैनल लगाए गए हैं। आम फ्लोटिंग सोलर सिस्टम की तरह इन्हें पानी पर तैराया नहीं गया है बल्कि मजबूत स्टील प्लेटफॉर्म पर स्थापित किया गया है ताकि समुद्री लहरों, तेज हवाओं और मौसम की कठिन परिस्थितियों का सामना किया जा सके।
आखिर चीन पानी पर सोलर पैनल क्यों लगा रहा है?
चीन की आबादी और औद्योगिक गतिविधियां लगातार बढ़ रही हैं। ऐसे में बिजली की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। दूसरी तरफ खेती योग्य जमीन सीमित है और सरकार कृषि भूमि को बचाना चाहती है।
यही कारण है कि चीन समुद्री क्षेत्रों का उपयोग करके बिजली उत्पादन बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रहा है। इससे जमीन का अतिरिक्त उपयोग किए बिना विशाल स्तर पर सौर ऊर्जा उत्पादन संभव हो रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार समुद्र के ऊपर लगाए गए सोलर पैनलों को एक अतिरिक्त फायदा भी मिलता है। समुद्री हवा पैनलों को ठंडा रखती है, जिससे उनकी कार्यक्षमता बढ़ जाती है। साथ ही पानी से परावर्तित होकर आने वाली अतिरिक्त धूप भी बिजली उत्पादन में मदद करती है।
रिपोर्टों के मुताबिक ऐसे सिस्टम जमीन पर लगे सौर संयंत्रों की तुलना में 5 से 15 प्रतिशत तक अधिक बिजली पैदा कर सकते हैं।
1.2 अरब डॉलर का बड़ा निवेश
यह परियोजना लगभग 1.2 अरब डॉलर की लागत से विकसित की गई है। इसे चाइना एनर्जी इन्वेस्टमेंट कॉर्पोरेशन (CHN Energy) के तहत गुओहुआ इन्वेस्टमेंट द्वारा तैयार किया गया है।
इस प्रोजेक्ट में केवल सोलर पैनल ही नहीं लगाए गए हैं बल्कि बिजली भंडारण के लिए उन्नत बैटरी सिस्टम भी जोड़ा गया है। अतिरिक्त बिजली को स्टोर किया जाता है और जरूरत पड़ने पर ग्रिड में वापस भेजा जाता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बैटरी स्टोरेज के कारण उपयोग योग्य बिजली की मात्रा करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। इससे बिजली आपूर्ति अधिक स्थिर और विश्वसनीय बनती है।
भारत के लिए क्यों है बड़ा सबक?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बिजली उपभोक्ता देश है और सरकार वर्ष 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में बड़े विस्तार का लक्ष्य लेकर चल रही है। हालांकि, अधिकांश भारतीय सौर परियोजनाएं अभी भी जमीन आधारित हैं।
चीन की यह पहल भारत को यह संदेश देती है कि भविष्य की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए पारंपरिक सोच से आगे बढ़ना होगा। भारत के पास गुजरात, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे लंबे तटीय क्षेत्र हैं जहां फ्लोटिंग और ऑफशोर सोलर परियोजनाओं की बड़ी संभावनाएं मौजूद हैं।
यदि भारत समय रहते इस दिशा में निवेश बढ़ाता है तो वह ऊर्जा आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन में तेजी ला सकता है।
मध्य-पूर्व संकट ने बढ़ाई नवीकरणीय ऊर्जा की अहमियत
हर्ष गोयनका द्वारा वीडियो साझा किए जाने का समय भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले कुछ समय से होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास तनाव और ऊर्जा आपूर्ति संबंधी चिंताओं ने वैश्विक बाजारों को प्रभावित किया है।
दुनिया के तेल, एलपीजी और एलएनजी का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। ऐसे में किसी भी प्रकार की बाधा ऊर्जा कीमतों को प्रभावित कर सकती है। यही कारण है कि कई देश अब ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।
नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं इसी रणनीति का हिस्सा बनती जा रही हैं।
फ्लोटिंग सोलर प्लांट के प्रमुख फायदे
फ्लोटिंग और ऑफशोर सोलर प्रोजेक्ट्स के कई महत्वपूर्ण फायदे हैं।
पहला, इनसे कृषि भूमि पर दबाव नहीं पड़ता। दूसरा, शहरी क्षेत्रों के नजदीक इन्हें स्थापित किया जा सकता है जिससे ट्रांसमिशन लॉस कम होता है। तीसरा, जरूरत के अनुसार इनका विस्तार करना अपेक्षाकृत आसान होता है।
इसके अलावा तटीय क्षेत्रों में स्वच्छ बिजली की उपलब्धता बढ़ती है और कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है।
लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि यह तकनीक बेहद आकर्षक दिखाई देती है, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं।
समुद्री वातावरण में जंग और क्षरण सबसे बड़ी समस्या है। लगातार नमकयुक्त पानी और तेज हवाएं उपकरणों की उम्र को प्रभावित कर सकती हैं। रखरखाव की लागत भी सामान्य सोलर प्लांट की तुलना में अधिक होती है।
इसके अलावा समुद्री तूफान, ऊंची लहरें और मौसम संबंधी जोखिम भी परियोजनाओं की लागत और सुरक्षा को प्रभावित कर सकते हैं।
क्या भविष्य इसी दिशा में है?
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में फ्लोटिंग और ऑफशोर सोलर प्रोजेक्ट्स का महत्व तेजी से बढ़ेगा। दुनिया भर में स्वच्छ ऊर्जा की मांग बढ़ रही है और जमीन की उपलब्धता सीमित होती जा रही है।
चीन ने इस दिशा में बड़ी बढ़त बना ली है। अब देखना यह होगा कि भारत समेत अन्य देश इस तकनीक को कितनी तेजी से अपनाते हैं। फिलहाल इतना जरूर है कि समुद्र के ऊपर फैले करोड़ों वर्गमीटर के सोलर पैनल भविष्य की ऊर्जा दुनिया की एक झलक जरूर दिखा रहे हैं।


