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Reading: Russia Oil Production: रूस ने 3 साल बाद पहली बार मानी बड़ी बात, घटा तेल उत्पादन; भारत के लिए सस्ते तेल का मौका या महंगाई का खतरा?
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Russia Oil Production: रूस ने 3 साल बाद पहली बार मानी बड़ी बात, घटा तेल उत्पादन; भारत के लिए सस्ते तेल का मौका या महंगाई का खतरा?

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/04 at 9:42 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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9 Min Read
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नई दिल्ली। यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से रूस ने अपने तेल उत्पादन के आधिकारिक आंकड़ों को सार्वजनिक करना लगभग बंद कर दिया था। लेकिन अब तीन साल से अधिक समय बाद पहली बार रूस ने स्वीकार किया है कि वर्ष 2026 में उसके तेल उत्पादन में गिरावट आई है। यह स्वीकारोक्ति ऐसे समय में आई है जब यूक्रेन लगातार रूसी ऊर्जा ढांचे पर ड्रोन हमले कर रहा है और वैश्विक तेल बाजार पहले से ही मध्य पूर्व के तनावों से जूझ रहा है।

Contents
Highlightsआखिर रूस ने तीन साल तक क्यों छुपाए आंकड़े?यूक्रेन के ड्रोन हमलों से बढ़ा दबावरिफाइनरियों में रुकावट और बढ़ा निर्यातIEA के आंकड़े क्या बताते हैं?रूस की कमाई फिर भी बढ़ीभारत के लिए क्या मायने हैं?क्या पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है?निष्कर्षLive Rates Today

Highlights

  • रूस ने पहली बार माना कि 2026 में उसका तेल उत्पादन घटा है।
  • यूक्रेन के ड्रोन हमलों और रिफाइनरी में मरम्मत को बताया वजह।
  • अप्रैल 2023 से रूस ने आधिकारिक उत्पादन आंकड़े जारी नहीं किए हैं।
  • भारत के लिए सस्ते रूसी तेल की सप्लाई पर पड़ सकता है असर।
  • वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर बढ़ सकता है दबाव।

सेंट पीटर्सबर्ग इंटरनेशनल इकोनॉमिक फोरम में रूस के उप प्रधानमंत्री अलेक्जेंडर नोवाक ने कहा कि साल की शुरुआत की तुलना में वर्तमान तेल उत्पादन कुछ कम है। उन्होंने इसकी वजह कई रिफाइनरियों में चल रहे अनियोजित रखरखाव कार्यों को बताया। हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इन मरम्मत कार्यों की जरूरत आखिर क्यों पड़ी।

रूस की यह स्वीकारोक्ति इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यूक्रेन युद्ध के बाद पहली बार किसी वरिष्ठ रूसी अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से उत्पादन में गिरावट की बात मानी है।

आखिर रूस ने तीन साल तक क्यों छुपाए आंकड़े?

रूस दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। यूक्रेन युद्ध शुरू होने और पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के बाद मॉस्को ने अप्रैल 2023 से तेल उत्पादन संबंधी विस्तृत आधिकारिक आंकड़े प्रकाशित करना बंद कर दिया था।

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस ने यह कदम रणनीतिक कारणों से उठाया था ताकि पश्चिमी देशों को उसकी उत्पादन क्षमता और निर्यात स्थिति की सटीक जानकारी न मिल सके। इसके बाद से दुनिया रूस के उत्पादन का अनुमान इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA), ओपेक और शिपमेंट डेटा के आधार पर लगाती रही है।

अब जब रूस ने खुद उत्पादन में गिरावट की बात स्वीकार की है तो यह संकेत माना जा रहा है कि ऊर्जा क्षेत्र पर युद्ध का दबाव पहले की तुलना में ज्यादा दिखाई देने लगा है।

यूक्रेन के ड्रोन हमलों से बढ़ा दबाव

हाल के महीनों में यूक्रेन ने रूस के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर अपने हमले तेज कर दिए हैं। इन हमलों का मुख्य लक्ष्य तेल रिफाइनरियां, भंडारण केंद्र, निर्यात टर्मिनल और ऊर्जा परिवहन सुविधाएं रही हैं।

यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने दावा किया कि लंबी दूरी के ड्रोन ने सेंट पीटर्सबर्ग के एक तेल टर्मिनल को निशाना बनाया, जिससे वहां आग लग गई। इस हमले के बाद शहर में अस्थायी रूप से कई सेवाएं प्रभावित हुईं। एयरपोर्ट संचालन पर भी असर पड़ा और कुछ समय के लिए मोबाइल इंटरनेट सेवाएं बाधित करनी पड़ीं।

यूक्रेन का कहना है कि इन हमलों का उद्देश्य रूस की युद्ध क्षमता को कमजोर करना है। तेल और गैस से मिलने वाली आय रूस के बजट का बड़ा हिस्सा है, इसलिए ऊर्जा ढांचे को निशाना बनाकर मॉस्को पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

रिफाइनरियों में रुकावट और बढ़ा निर्यात

उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार मई में रूस के पश्चिमी बंदरगाहों से कच्चे तेल का निर्यात पिछले महीने की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत बढ़ा। इसकी एक बड़ी वजह यह रही कि कई रिफाइनरियों में उत्पादन प्रभावित होने के कारण कच्चे तेल को घरेलू स्तर पर प्रोसेस करने की बजाय अंतरराष्ट्रीय बाजार में भेजा गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रिफाइनरियों पर दबाव बना रहता है तो रूस आने वाले महीनों में भी अधिक मात्रा में कच्चा तेल निर्यात कर सकता है।

हालांकि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन दोनों पर असर पड़ सकता है।

IEA के आंकड़े क्या बताते हैं?

हालांकि रूस आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं कर रहा है, लेकिन इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के डेटा से संकेत मिलता है कि उत्पादन में गिरावट पहले से ही शुरू हो चुकी थी।

एजेंसी के अनुसार अप्रैल 2026 में रूस का कच्चे तेल का उत्पादन लगभग 88 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 4.6 लाख बैरल प्रतिदिन कम था।

यह गिरावट दर्शाती है कि रिफाइनरियों पर बढ़ते दबाव और हमलों का असर केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है बल्कि वास्तविक उत्पादन पर भी दिखाई देने लगा है।

रूस की कमाई फिर भी बढ़ी

दिलचस्प बात यह है कि उत्पादन में गिरावट के बावजूद रूस की तेल और गैस आय में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

रूसी वित्त मंत्रालय के अनुसार मई में तेल और गैस से होने वाला राजस्व सालाना आधार पर 32.4 प्रतिशत बढ़कर 678.9 अरब रूबल तक पहुंच गया। यह देश की कुल बजट आय का लगभग पांचवां हिस्सा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों ने रूस को उत्पादन घटने के बावजूद अधिक राजस्व कमाने में मदद की है।

भारत के लिए क्या मायने हैं?

भारत इस समय रूस से सबसे अधिक कच्चा तेल खरीदने वाले देशों में शामिल है। पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद रूस ने रियायती दरों पर तेल बेचना शुरू किया, जिसका सबसे बड़ा लाभ भारतीय रिफाइनरियों को मिला।

भारत अपनी कुल तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है और हाल के महीनों में रूसी तेल का हिस्सा लगातार बढ़ा है। रिपोर्टों के अनुसार मई में भारत का रूसी तेल आयात फरवरी की तुलना में करीब 63 प्रतिशत तक बढ़ गया।

यदि रूस में रिफाइनरियों पर दबाव बना रहता है तो भारत को अल्पकाल में अधिक रियायती कच्चा तेल मिल सकता है क्योंकि रूस अतिरिक्त तेल को वैश्विक बाजार में बेचने की कोशिश करेगा।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है।

यदि यूक्रेन के हमले रूस के प्रमुख निर्यात बंदरगाहों और ऊर्जा ढांचे को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं तो वैश्विक सप्लाई में कमी आ सकती है। ऐसी स्थिति में कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ सकती हैं, जिसका असर भारत में पेट्रोल, डीजल और परिवहन लागत पर दिखाई दे सकता है।

क्या पेट्रोल-डीजल महंगा हो सकता है?

फिलहाल तत्काल कीमत बढ़ने की संभावना सीमित मानी जा रही है क्योंकि भारतीय तेल कंपनियों के पास पर्याप्त स्टॉक और विविध आयात स्रोत मौजूद हैं।

हालांकि यदि रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व का तनाव दोनों मिलकर वैश्विक सप्लाई को प्रभावित करते हैं तो ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी आ सकती है। इससे भारत में ईंधन कीमतों और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।

यही वजह है कि ऊर्जा बाजार के जानकार आने वाले महीनों में रूस की उत्पादन क्षमता, निर्यात स्तर और यूक्रेन के हमलों पर खास नजर बनाए हुए हैं।

निष्कर्ष

रूस द्वारा पहली बार तेल उत्पादन में गिरावट स्वीकार करना केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। यूक्रेन युद्ध, ड्रोन हमले और रिफाइनरियों पर बढ़ते दबाव ने रूस के ऊर्जा क्षेत्र को चुनौती दी है। भारत के लिए यह स्थिति अवसर और जोखिम दोनों लेकर आई है। एक ओर रियायती रूसी तेल की सप्लाई जारी रह सकती है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक सप्लाई बाधित होने पर कच्चे तेल की कीमतों और घरेलू महंगाई में बढ़ोतरी का खतरा भी बना रहेगा।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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