पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और भारतीय रुपये पर बढ़ते दबाव के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर नई चिंताएं सामने आने लगी हैं। देश के जाने-माने कृषि अर्थशास्त्री Ashok Gulati और सीनियर फेलो Ritika Juneja ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक प्रभावित रहता है तो भारत को 1991 जैसे बड़े आर्थिक सुधारों की जरूरत पड़ सकती है।
दोनों विशेषज्ञों ने अपने विश्लेषण में कहा है कि भारत फिलहाल कई मोर्चों पर दबाव झेल रहा है। एक तरफ ऊर्जा आयात महंगे हो रहे हैं, दूसरी तरफ खाद सब्सिडी और मुफ्त राशन जैसी योजनाओं का बोझ सरकारी वित्तीय स्थिति को कमजोर कर रहा है। अगर वैश्विक संकट और गहरा हुआ तो इसका असर सीधे आम लोगों की जेब, महंगाई, रोजगार और रुपये की कीमत पर दिखाई दे सकता है।
क्यों अहम है होर्मुज स्ट्रेट?
Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। अगर इस समुद्री मार्ग में रुकावट आती है तो भारत के लिए तेल और गैस खरीदना बेहद महंगा हो सकता है। इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ट्रांसपोर्ट, खाद्य पदार्थ, बिजली उत्पादन और उद्योगों की लागत भी बढ़ जाएगी।
अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, यदि अगले तीन महीनों तक होर्मुज स्ट्रेट बाधित रहता है तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6% से नीचे जा सकती है जबकि खुदरा महंगाई दर 6% से ऊपर पहुंच सकती है। ऐसे हालात में भारतीय रिजर्व बैंक को ब्याज दरें बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
रुपये पर क्यों बढ़ रहा दबाव?
भारतीय रुपया पिछले कुछ महीनों से डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ती रही और आरबीआई को मुद्रा बचाने के लिए बड़े पैमाने पर डॉलर बेचने पड़े, तो रुपया 100 प्रति डॉलर के स्तर तक भी पहुंच सकता है।
रुपये में कमजोरी का असर
1. आयात महंगे होंगे
भारत तेल, गैस, खाद और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का बड़ा आयातक है। रुपये के कमजोर होने से इन सभी वस्तुओं की लागत बढ़ जाएगी।
2. महंगाई बढ़ेगी
पेट्रोल-डीजल महंगे होने से ट्रांसपोर्ट कॉस्ट बढ़ेगी, जिसका असर सब्जी, दूध, राशन और दवाओं तक पर पड़ेगा।
3. RBI पर दबाव बढ़ेगा
रुपये को स्थिर रखने के लिए Reserve Bank of India को विदेशी मुद्रा भंडार खर्च करना पड़ सकता है।
खाद सब्सिडी पर क्यों उठे सवाल?
विशेषज्ञों ने भारत की मौजूदा खाद सब्सिडी व्यवस्था को आर्थिक दबाव की बड़ी वजह बताया है। भारत अपनी यूरिया जरूरत का करीब 20-25% आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी लागत बहुत ज्यादा है, लेकिन किसानों को भारी सब्सिडी देकर बेहद कम कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है।
कितना बड़ा है सब्सिडी अंतर?
| विवरण | अनुमानित कीमत |
|---|---|
| यूरिया की लैंडेड कॉस्ट | लगभग 935 डॉलर प्रति टन |
| किसानों को बिक्री मूल्य | 70 डॉलर प्रति टन से कम |
इसका मतलब है कि सरकार कुल लागत का लगभग 90% हिस्सा सब्सिडी के रूप में वहन कर रही है।
बांग्लादेश और नेपाल में तस्करी का दावा
अर्थशास्त्रियों ने दावा किया है कि भारत में सस्ती यूरिया मिलने के कारण उसकी तस्करी पड़ोसी देशों तक हो रही है। खासकर बिहार और सीमावर्ती इलाकों से नेपाल और बांग्लादेश तक सब्सिडी वाली खाद पहुंचने की बात कही गई है।
बिहार क्यों बना बड़ा रास्ता?
विशेषज्ञों के अनुसार सरकारी सप्लाई और वास्तविक उपयोग के आंकड़ों में बड़ा अंतर दिखता है सीमावर्ती जिलों में खाद की असामान्य मांग दर्ज होती रही है कम कीमत के कारण तस्करी का नेटवर्क सक्रिय रहता है
यह स्थिति सरकार के लिए दोहरी समस्या पैदा करती है सब्सिडी का पैसा गलत जगह जा रहा है असली किसानों तक संसाधन सीमित हो रहे हैं
कितना बड़ा है खाद सब्सिडी बिल?
सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए खाद सब्सिडी पर लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान रखा है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह खर्च बढ़कर 2.25 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जा सकता है। कुछ अनुमानों में यह आंकड़ा 2.5 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका जताई गई है।
यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब सरकार पहले से ही मुफ्त राशन, ग्रामीण योजनाओं, ऊर्जा सब्सिडी, सामाजिक कल्याण योजनाओं पर भारी खर्च कर रही है।
80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन पर सवाल
अर्थशास्त्रियों ने खाद्य सब्सिडी कार्यक्रम के आकार पर भी सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि यदि गरीबी दर में कमी आई है तो फिर 80 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त अनाज वितरण जारी रखने की जरूरत पर पुनर्विचार होना चाहिए।
उनका सुझाव क्या है?
विशेषज्ञों ने कहा लाभार्थियों की संख्या की समीक्षा हो गरीबी रेखा से ऊपर के लोगों के लिए कीमतें बढ़ाई जाएं लीकेज कम किया जाए उनके अनुसार इससे सरकार को सालाना लगभग 50,000 करोड़ रुपये तक की बचत हो सकती है।
DBT मॉडल को बताया समाधान
विशेषज्ञों ने मौजूदा खाद सब्सिडी व्यवस्था को बदलकर जमीन आधारित डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) मॉडल लागू करने की सिफारिश की है।
प्रस्तावित मॉडल कैसे काम करेगा?
प्रति एकड़ के आधार पर सब्सिडी, पीएम-किसान योजना से लिंक, सीधे किसानों के खाते में पैसा, खाद की वास्तविक बाजार कीमत इससे तस्करी कम होगी, नकली उपयोग रुकेगा, सरकारी खर्च घटेगा, किसानों को पारदर्शी सहायता मिलेगी.
क्या 1991 जैसे सुधारों की जरूरत पड़ सकती है?
1991 में भारत गंभीर भुगतान संतुलन संकट से जूझ रहा था। उस समय देश को आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और संरचनात्मक सुधार लागू करने पड़े थे।
अब विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा आयात दबाव, बढ़ती सब्सिडी, कमजोर रुपया, वैश्विक अनिश्चितता जैसे कारक भारत को फिर बड़े सुधारों की दिशा में धकेल सकते हैं। हालांकि कई अर्थशास्त्री यह भी मानते हैं कि आज भारत की अर्थव्यवस्था 1991 की तुलना में कहीं ज्यादा मजबूत है। देश के पास बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार, मजबूत बैंकिंग सिस्टम और तेज डिजिटल अर्थव्यवस्था जैसी ताकतें भी मौजूद हैं।
आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि वैश्विक संकट लंबा चलता है तो आम लोगों को इन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है:
| क्षेत्र | संभावित असर |
|---|---|
| पेट्रोल-डीजल | कीमतें बढ़ सकती हैं |
| LPG सिलेंडर | सब्सिडी बोझ बढ़ सकता है |
| राशन | महंगाई बढ़ सकती है |
| खेती | खाद महंगी हो सकती है |
| EMI | ब्याज दरें बढ़ सकती हैं |
| शेयर बाजार | विदेशी निवेश निकासी से दबाव |
क्या भारत संकट से बच सकता है?
विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते सुधार लागू किए जाएं तो भारत इस चुनौती से निकल सकता है। इसके लिए जरूरी होगा सब्सिडी सिस्टम में पारदर्शिता, ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करना, घरेलू मैन्युफैक्चरिंग मजबूत करना, कृषि सुधार, सरकारी खर्च का बेहतर प्रबंधन. भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। लेकिन वैश्विक संकट और घरेलू वित्तीय दबावों के बीच आने वाले महीनों में सरकार के फैसले बेहद अहम साबित हो सकते हैं।
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