भारत में ग्रीन एनर्जी सेक्टर अब सिर्फ बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह आने वाले वर्षों में जमीन, उद्योग, रोजगार और निवेश का सबसे बड़ा केंद्र बनने जा रहा है। देश में सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं के तेजी से विस्तार के कारण अगले पांच वर्षों में करीब सात लाख एकड़ जमीन की जरूरत पड़ने वाली है। अनुमान है कि केवल जमीन खरीद और उससे जुड़ी मंजूरियों पर ही 10 से 15 अरब डॉलर यानी करीब ₹1 लाख करोड़ से अधिक का निवेश हो सकता है।
रियल एस्टेट कंसल्टेंसी कंपनी Colliers की बुधवार को जारी रिपोर्ट ‘Green Shift: Renewable Prioritization Reshaping Indian Real Estate’ में यह बड़ा अनुमान सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता के मामले में दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में शामिल हो सकता है।
2015 के मुकाबले तीन गुना बढ़ी ग्रीन एनर्जी क्षमता
भारत ने पिछले एक दशक में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में तेज प्रगति की है। वर्ष 2015 में देश की स्थापित नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता करीब 80 गीगावाट थी, जो अब बढ़कर 250 गीगावाट के पार पहुंच चुकी है। मार्च 2026 तक यह आंकड़ा लगभग 275 गीगावाट तक पहुंच गया।
केंद्र सरकार ने 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इसमें सबसे बड़ा योगदान सौर ऊर्जा परियोजनाओं का रहने वाला है। रिपोर्ट के अनुसार, अकेले सोलर सेक्टर की स्थापित क्षमता 2030 तक 400 से 450 गीगावाट तक पहुंच सकती है।
आखिर क्यों पड़ेगी 7 लाख एकड़ जमीन की जरूरत?
सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं को बड़े पैमाने पर जमीन की आवश्यकता होती है। पारंपरिक बिजली संयंत्रों की तुलना में सोलर पार्कों को कई गुना अधिक भूमि चाहिए होती है क्योंकि हजारों सोलर पैनल लगाने पड़ते हैं।
कोलियर्स की रिपोर्ट के अनुसार: 2026 से 2030 के बीच सौर परियोजनाओं के लिए 6.5 लाख एकड़ से अधिक जमीन चाहिए होगी, बाकी जमीन पवन ऊर्जा परियोजनाओं में इस्तेमाल होगी, जमीन और सरकारी मंजूरियों पर कुल परियोजना लागत का 10-12% खर्च होगा
अगर इस अनुमान को भारतीय संदर्भ में देखें तो यह जमीन दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे कई बड़े शहरों के संयुक्त क्षेत्रफल से भी ज्यादा हो सकती है।
₹9 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है कुल निवेश
रिपोर्ट के अनुसार, अगले कुछ वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में कुल 110 से 120 अरब डॉलर यानी लगभग ₹9-10 लाख करोड़ तक का निवेश आने की संभावना है। इसमें सोलर मॉड्यूल, विंड टर्बाइन, ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर, बैटरी स्टोरेज और भूमि विकास जैसी गतिविधियां शामिल होंगी।
सोलर और विंड प्रोजेक्ट की लागत कितनी?
रिपोर्ट में बताया गया है कि:
| परियोजना | अनुमानित लागत |
|---|---|
| सोलर प्रोजेक्ट | ₹3-4 करोड़ प्रति मेगावाट |
| पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट | ₹8-9 करोड़ प्रति मेगावाट |
पवन ऊर्जा परियोजनाओं की लागत ज्यादा होने का कारण उन्नत तकनीक, ऊंचे टर्बाइन और भारी इंफ्रास्ट्रक्चर है।
किन राज्यों में सबसे ज्यादा बढ़ेगी जमीन की मांग?
विशेषज्ञों का मानना है कि राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में सबसे ज्यादा जमीन अधिग्रहण देखने को मिल सकता है। इसकी वजह इन राज्यों में बेहतर धूप, तेज हवाएं और बड़े भू-भाग की उपलब्धता है।
राजस्थान और गुजरात पहले से ही बड़े सोलर हब बन चुके हैं। वहीं तमिलनाडु और गुजरात विंड एनर्जी में अग्रणी माने जाते हैं।
रियल एस्टेट सेक्टर को कैसे मिलेगा फायदा?
ग्रीन एनर्जी विस्तार का सबसे बड़ा असर औद्योगिक और ग्रामीण रियल एस्टेट बाजार पर पड़ सकता है। बड़ी कंपनियां अब ऐसे क्षेत्रों में जमीन खरीदने लगी हैं जहां भविष्य में सोलर पार्क या ऊर्जा कॉरिडोर बनने की संभावना है।
इससे कई नए सेक्टर तेजी पकड़ सकते हैं: इंडस्ट्रियल पार्क, लॉजिस्टिक्स हब, बैटरी स्टोरेज यूनिट, ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर, डेटा सेंटर. विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा परियोजनाओं के आसपास छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियां तेज हो सकती हैं।
निर्माणाधीन हैं 146 गीगावाट परियोजनाएं
भारत में इस समय करीब 146 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इनमें 60% से ज्यादा सौर परियोजनाएं हैं। इसका मतलब है कि अगले कुछ वर्षों में देश के ऊर्जा ढांचे में बड़ा बदलाव दिखाई दे सकता है।
यह बदलाव सिर्फ बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और घरेलू विनिर्माण को भी गति देगा।
चीन को चुनौती देने की तैयारी?
भारत अब सोलर पैनल और बैटरी निर्माण में घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर दे रहा है। सरकार की PLI स्कीम और ग्रीन एनर्जी मिशन के कारण कई भारतीय कंपनियां बड़े निवेश कर रही हैं।
अगर घरेलू निर्माण क्षमता तेजी से बढ़ती है तो भारत 2030 तक एशिया में चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा ग्रीन एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग हब बन सकता है।
जमीन अधिग्रहण सबसे बड़ी चुनौती
हालांकि, इतनी बड़ी परियोजनाओं के सामने कई चुनौतियां भी हैं: जमीन अधिग्रहण विवाद, पर्यावरण मंजूरी, ट्रांसमिशन नेटवर्क की कमी, ग्रामीण विरोध, पानी की उपलब्धता विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि राज्य सरकारें भूमि और मंजूरी प्रक्रिया को आसान बनाती हैं तो निवेश की रफ्तार और तेज हो सकती है।
क्या आम लोगों को भी होगा फायदा?
ग्रीन एनर्जी विस्तार का असर आम उपभोक्ताओं पर भी दिखाई दे सकता है। लंबे समय में इससे: बिजली उत्पादन लागत घट सकती है, आयातित तेल और गैस पर निर्भरता कम होगी, बिजली कटौती में कमी आ सकती है, इलेक्ट्रिक वाहन सेक्टर को मजबूती मिलेगी, रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे.
क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?
कोलियर्स इंडिया के सीईओ और प्रबंध निदेशक Badal Yagnik ने कहा कि आने वाले वर्षों में नवीकरणीय ऊर्जा भारत की आर्थिक वृद्धि और निवेश को नई दिशा दे सकती है। उनके अनुसार, यह सेक्टर केवल कार्बन उत्सर्जन कम करने तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे देश में सतत विकास को गति देगा।
भारत अब ऐसे दौर में पहुंच चुका है जहां ऊर्जा सेक्टर सिर्फ बिजली नहीं बल्कि जमीन, उद्योग, रोजगार और निवेश की नई अर्थव्यवस्था तैयार कर रहा है। आने वाले पांच वर्षों में ग्रीन एनर्जी की यह दौड़ देश के रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर की तस्वीर बदल सकती है।
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