पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और वैश्विक सप्लाई संकट के बीच कच्चे तेल को लेकर दुनिया की दिग्गज ब्रोकरेज फर्म JPMorgan ने बड़ी चेतावनी जारी की है। फर्म का कहना है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह खुल भी जाता है, तब भी कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रह सकती हैं।
जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट के मुताबिक बाजार को सिर्फ होर्मुज खुलने से राहत नहीं मिलेगी क्योंकि असली समस्या अब सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स में पैदा हुई गड़बड़ियां हैं। शिपिंग, टैंकर उपलब्धता, रिफाइनरी ऑपरेशन और समुद्री परिवहन पर बढ़ते दबाव के कारण ऊर्जा बाजार में स्थिरता आने में कई महीने लग सकते हैं।
यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब ब्रेंट क्रूड 105 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच चुका है जबकि अमेरिकी WTI क्रूड भी 100 डॉलर के पार कारोबार कर रहा है। लगातार बढ़ती कीमतों ने भारत समेत दुनिया के बड़े तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ा दी है।
क्यों महत्वपूर्ण है होर्मुज स्ट्रेट?
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम समुद्री तेल मार्गों में से एक माना जाता है। दुनिया के कुल समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। खाड़ी देशों से निकलने वाला कच्चा तेल चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोप जैसे देशों तक पहुंचाने में यह समुद्री मार्ग बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी वजह से जब भी पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, सबसे पहले असर तेल बाजार पर दिखाई देता है।
JP Morgan ने क्या कहा?
जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट के अनुसार सिर्फ समुद्री रास्ता खुल जाने भर से बाजार सामान्य नहीं हो जाएगा। फर्म का कहना है कि टैंकरों की उपलब्धता प्रभावित हुई है। बीमा लागत बढ़ गई है। शिपिंग रूट्स बाधित हुए हैं। रिफाइनरी ऑपरेशंस पर दबाव बढ़ा है और सप्लाई नेटवर्क अस्थिर बना हुआ है। इन सभी कारणों से कच्चे तेल की कीमतों में तेज गिरावट की संभावना फिलहाल कम दिखाई दे रही है।
रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि साल 2026 में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत करीब 97 डॉलर प्रति बैरल रह सकती है। यानी बाजार लंबे समय तक हाई-प्राइस जोन में बना रह सकता है।
अमेरिका-ईरान तनाव ने बढ़ाई चिंता
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता टकराव तेल बाजार की सबसे बड़ी चिंता बना हुआ है। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड करीब 1 फीसदी बढ़कर 105 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया। वहीं WTI क्रूड भी 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया।
यह तेजी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान की प्रतिक्रिया की आलोचना के बाद आई। ट्रंप ने वाशिंगटन के शांति प्रस्ताव पर ईरान के जवाब को लेकर नाराजगी जताई, जिससे बाजार में यह डर और बढ़ गया कि संघर्ष लंबा खिंच सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर तनाव और बढ़ा तो तेल सप्लाई पर गंभीर असर पड़ सकता है।
भारत पर क्या होगा असर?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। देश अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में तेल महंगा होने का असर सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा बना रहता है तो पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं। महंगाई में तेजी आ सकती है। रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और सरकार का आयात बिल भी तेजी से ऊपर जा सकता है। इससे चालू खाते का घाटा बढ़ने का खतरा रहेगा। इसके अलावा एयरलाइंस, पेंट, केमिकल, सीमेंट और लॉजिस्टिक्स सेक्टर पर भी लागत का दबाव बढ़ सकता है।
सरकारी तेल कंपनियों पर बढ़ा भारी दबाव
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी मंगलवार को चेतावनी दी कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं तो सरकारी तेल कंपनियों का पूरा मुनाफा खत्म हो सकता है। उन्होंने कहा कि फिलहाल सरकारी तेल विपणन कंपनियों को हर दिन करीब ₹1,000 करोड़ का नुकसान हो रहा है।
अगर यही स्थिति बनी रही तो एक तिमाही में नुकसान ₹1 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। इंडस्ट्री अनुमान के मुताबिक वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही में सरकारी तेल कंपनियों का कुल नुकसान करीब ₹1.2 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है।
इसका सबसे ज्यादा असर इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों पर पड़ सकता है।
पेट्रोल-डीजल कीमतों पर क्या होगा असर?
फिलहाल सरकार और तेल कंपनियां कीमतों को नियंत्रित रखने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन अगर कच्चा तेल 100 डॉलर से ऊपर बना रहता है, रुपया कमजोर होता है और सप्लाई संकट लंबा चलता है तो आने वाले महीनों में पेट्रोल-डीजल कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सरकार कीमतें नहीं बढ़ाती तो तेल कंपनियों का नुकसान तेजी से बढ़ेगा। वहीं अगर कीमतें बढ़ाई जाती हैं तो महंगाई पर असर पड़ सकता है।
शेयर बाजार क्यों घबराया हुआ है?
तेल की ऊंची कीमतें शेयर बाजार के लिए भी बड़ी चिंता मानी जाती हैं। कारण यह है कि कंपनियों की लागत बढ़ती है, मुनाफा घटता है, महंगाई बढ़ती है और ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। इसी वजह से हाल के दिनों में भारतीय शेयर बाजार में भी भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है।
क्या 120 डॉलर तक जा सकता है तेल?
कई वैश्विक संस्थाओं ने चेतावनी दी है कि अगर होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह बाधित होता है, अमेरिका-ईरान संघर्ष और बढ़ता है या सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित रहती है तो कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल तक भी जा सकता है।
हालांकि फिलहाल बाजार 100-105 डॉलर की रेंज में स्थिर होने की कोशिश कर रहा है, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव ने अनिश्चितता बहुत बढ़ा दी है।
क्यों महत्वपूर्ण है JP Morgan की चेतावनी?
जेपी मॉर्गन की रिपोर्ट इसलिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि यह सिर्फ “तेल की कीमत” नहीं बल्कि पूरी वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन पर बढ़ते दबाव की तरफ इशारा करती है। रिपोर्ट का सबसे बड़ा संकेत यह है कि संकट खत्म होने के बाद भी असर जल्दी खत्म नहीं होगा।
यानी अगर युद्ध धीमा भी पड़ता है तब bhi शिपिंग नेटवर्क को सामान्य होने, टैंकर सप्लाई सुधारने और रिफाइनरी ऑपरेशन स्थिर होने में लंबा समय लग सकता है। इसी वजह से दुनिया भर की सरकारें और ऊर्जा कंपनियां आने वाले महीनों को लेकर सतर्क नजर आ रही हैं।
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