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Oil Gas Royalty Cut: मिडिल ईस्ट संकट के बीच भारत का बड़ा दांव, सरकार ने बदले नियम, तेल आयात घटाने पर फोकस

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/27 at 9:22 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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9 Min Read
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पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच केंद्र सरकार ने बड़ा रणनीतिक कदम उठाया है। सरकार ने घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाने के लिए कई श्रेणियों के ब्लॉकों पर रॉयल्टी दरों में कटौती कर दी है। इसका मकसद साफ है — भारत की आयातित तेल पर निर्भरता कम करना और घरेलू एक्सप्लोरेशन को आकर्षक बनाना।

Contents
आखिर सरकार ने क्या बदला?नया कैलकुलेशन मैकेनिज्म कैसे काम करेगा?डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर ब्लॉकों को बड़ी राहतप्राकृतिक गैस सेक्टर को भी मिलेगा फायदामिडिल ईस्ट संकट से क्या है कनेक्शन?किन कंपनियों को मिल सकता है फायदा?क्या इससे पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा?क्यों महत्वपूर्ण है सरकार का यह फैसला?

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 8 मई को नई अधिसूचना जारी की। इसमें ऑनशोर, ऑफशोर, डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर ब्लॉकों के लिए रॉयल्टी ढांचे में बड़ा बदलाव किया गया है। सरकार का मानना है कि इससे तेल और गैस कंपनियों की लागत घटेगी और मुश्किल क्षेत्रों में निवेश बढ़ेगा।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब मिडिल ईस्ट संकट लगातार गहराता जा रहा है। कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ रहा है और रुपये पर दबाव लगातार बना हुआ है। ऐसे में सरकार अब घरेलू ऊर्जा उत्पादन को राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा से जोड़कर देख रही है।


आखिर सरकार ने क्या बदला?

सरकार ने कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के उत्पादन पर लगने वाली रॉयल्टी दरों में कटौती की है। यह बदलाव खासकर उन क्षेत्रों के लिए अहम माना जा रहा है जहां तेल निकालना तकनीकी रूप से कठिन और बेहद महंगा होता है। नए फ्रेमवर्क के तहत जमीन पर यानी ऑनशोर होने वाले कच्चे तेल के उत्पादन पर प्रभावी रॉयल्टी दर घटाकर 10 फीसदी कर दी गई है। वहीं समुद्र में यानी ऑफशोर होने वाले कच्चे तेल के उत्पादन पर रॉयल्टी दर को कम करके 8 फीसदी किया गया है।

प्राकृतिक गैस के मामले में भी सरकार ने नया “फ्लैट डिडक्शन” फॉर्मूला लागू किया है। इसके लागू होने के बाद प्रभावी रॉयल्टी रेट घटकर करीब 8 फीसदी रह जाएगा।


नया कैलकुलेशन मैकेनिज्म कैसे काम करेगा?

पहले रॉयल्टी की गणना उत्पादन के बाद आने वाली वास्तविक लागतों से जुड़ी होती थी। इससे कई बार कंपनियों पर ज्यादा वित्तीय दबाव पड़ता था और लागत का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता था। अब सरकार ने प्रक्रिया को ज्यादा आसान और पारदर्शी बनाने की कोशिश की है। नई अधिसूचना के अनुसार अब रॉयल्टी की गणना “वेल हेड प्राइस” के आधार पर होगी। इसके साथ पोस्ट-वेल-हेड कॉस्ट्स के लिए तय कटौती की अनुमति दी जाएगी।

नॉमिनेशन व्यवस्था वाले ब्लॉकों के लिए यह कटौती बिक्री मूल्य का 20 फीसदी होगी। वहीं अन्य सभी व्यवस्थाओं के लिए यह 15 फीसदी तय की गई है।

इस बदलाव का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि कंपनियों को अब लागत निर्धारण में ज्यादा स्पष्टता मिलेगी और उनका वित्तीय जोखिम कम होगा। इससे एक्सप्लोरेशन प्रोजेक्ट्स में निवेश आकर्षित करने में मदद मिल सकती है।


डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर ब्लॉकों को बड़ी राहत

भारत लंबे समय से डीपवॉटर और अल्ट्रा-डीपवॉटर क्षेत्रों में निवेश आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इन क्षेत्रों में उत्पादन बेहद महंगा और तकनीकी रूप से जटिल होता है। कई बार कंपनियां भारी लागत के कारण निवेश से बचती रही हैं। इसी वजह से सरकार ने इन ब्लॉकों के लिए अतिरिक्त राहत जारी रखी है।

संशोधित ढांचे के तहत “डिस्कवर्ड स्मॉल फील्ड” (DSF) पॉलिसी और “हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग पॉलिसी” (HELP) के तहत आवंटित ब्लॉकों से होने वाले कच्चे तेल और कंडेनसेट के उत्पादन पर पहले सात वर्षों तक कोई रॉयल्टी नहीं लगेगी। यानी शुरुआती सात साल तक रॉयल्टी पूरी तरह शून्य रहेगी।

इसके बाद आठवें साल से डीपवॉटर ब्लॉकों के लिए रॉयल्टी दर 5 फीसदी और अल्ट्रा-डीपवॉटर ब्लॉकों के लिए 2 फीसदी तय की गई है।


प्राकृतिक गैस सेक्टर को भी मिलेगा फायदा

सरकार ने सिर्फ क्रूड ऑयल ही नहीं बल्कि प्राकृतिक गैस उत्पादन को भी बढ़ावा देने की कोशिश की है। नई नीति के तहत गैस ब्लॉकों पर भी शुरुआती सात वर्षों तक कोई रॉयल्टी नहीं लगेगी। इसके बाद डीपवॉटर क्षेत्रों के लिए 5 फीसदी और अल्ट्रा-डीपवॉटर क्षेत्रों के लिए 2 फीसदी रॉयल्टी लागू होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत में गैस आधारित ऊर्जा ढांचे को मजबूती मिलेगी। आने वाले वर्षों में गैस की मांग तेजी से बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि सरकार क्लीन एनर्जी ट्रांजिशन पर जोर दे रही है।


मिडिल ईस्ट संकट से क्या है कनेक्शन?

सरकार का यह कदम सीधे वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव से जुड़ा माना जा रहा है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने तेल सप्लाई चेन पर दबाव बढ़ा दिया है। समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल बना हुआ है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है और देश अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।

ऐसे में अगर तेल महंगा होता है, सप्लाई बाधित होती है या डॉलर मजबूत होता है तो भारतीय अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ता है। यही वजह है कि सरकार अब “एनर्जी सिक्योरिटी” को प्राथमिकता दे रही है।


किन कंपनियों को मिल सकता है फायदा?

नई रॉयल्टी नीति का फायदा उन कंपनियों को मिल सकता है जो डीपवॉटर एक्सप्लोरेशन में सक्रिय हैं, ऑफशोर गैस प्रोजेक्ट चला रही हैं या हाई-कॉस्ट ब्लॉकों में निवेश कर रही हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक ONGC, Oil India, Reliance-BP और Vedanta समूह की Cairn Oil & Gas जैसी कंपनियों को लंबी अवधि में फायदा मिल सकता है।

कम रॉयल्टी का मतलब है कि कंपनियों की लागत घटेगी, प्रॉफिटेबिलिटी बेहतर हो सकती है और नए निवेश आकर्षित होने की संभावना बढ़ेगी।


क्या इससे पेट्रोल-डीजल सस्ता होगा?

फिलहाल इसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल कीमतों पर तुरंत दिखने की संभावना कम है। क्योंकि भारत अभी भी भारी मात्रा में तेल आयात करता है। इसके अलावा वैश्विक कीमतें अभी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। टैक्स और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थितियां भी ईंधन कीमतों को प्रभावित करती हैं।

हालांकि अगर घरेलू उत्पादन आने वाले वर्षों में बढ़ता है तो आयात बिल घट सकता है, रुपये पर दबाव कम हो सकता है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है। इसका अप्रत्यक्ष फायदा आम उपभोक्ताओं को मिल सकता है।


क्यों महत्वपूर्ण है सरकार का यह फैसला?

यह फैसला सिर्फ रॉयल्टी कटौती नहीं बल्कि भारत की ऊर्जा रणनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। सरकार अब आयात निर्भरता घटाना चाहती है। वह घरेलू उत्पादन बढ़ाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने पर फोकस कर रही है।

अगर यह नीति सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में भारत तेल आयात पर कम निर्भर हो सकता है। इससे चालू खाते के घाटे को नियंत्रित करने और ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ने में मदद मिल सकती है।

मिडिल ईस्ट संकट के बीच सरकार का यह कदम इसलिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि यह सिर्फ मौजूदा संकट से निपटने का प्रयास नहीं बल्कि भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाया गया रणनीतिक फैसला है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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