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Share Market Crash: ₹17 लाख करोड़ स्वाहा! 4 दिन में 3,500 अंक टूटा सेंसेक्स, आखिर क्यों मचा बाजार में हाहाकार?

Namam Sharma
Last updated: 2026/06/27 at 9:22 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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10 Min Read
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घरेलू शेयर बाजार में भारी तबाही का दौर जारी है। लगातार दूसरे दिन बाजार में बिकवाली इतनी तेज रही कि कारोबार के दौरान बीएसई सेंसेक्स 1,500 अंक से ज्यादा टूट गया जबकि निफ्टी में 450 अंकों से अधिक की गिरावट देखने को मिली। पिछले चार कारोबारी सत्रों में सेंसेक्स करीब 3,500 अंक यानी चार फीसदी से ज्यादा टूट चुका है। इस गिरावट ने निवेशकों की दौलत पर भी बड़ा असर डाला है। बीएसई में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैपिटलाइजेशन 6 मई के 473 लाख करोड़ रुपये से घटकर करीब 459 लाख करोड़ रुपये रह गया है। यानी सिर्फ चार दिनों में निवेशकों के करीब 17 लाख करोड़ रुपये डूब गए।

Contents
क्यों डर गया है बाजार?1. पश्चिम एशिया संकट और ईरान युद्ध ने बढ़ाई टेंशन2. कच्चे तेल की कीमत 107 डॉलर के पार3. रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा4. विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड बिकवाली5. प्रधानमंत्री मोदी की अपील से भी प्रभावित हुई बाजार धारणाकिन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा दबाव?क्या यह 2020 जैसा बड़ा क्रैश बन सकता है?निवेशकों को क्या करना चाहिए?निवेशकों के लिए अहम सलाहक्यों महत्वपूर्ण है यह गिरावट?

बाजार में आई इस बड़ी गिरावट के पीछे सिर्फ एक कारण नहीं है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव से लेकर कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली तक कई ऐसे फैक्टर हैं जिन्होंने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस बार गिरावट सिर्फ मिडकैप और स्मॉलकैप तक सीमित नहीं रही बल्कि बैंकिंग, आईटी, ऑटो और मेटल जैसे बड़े सेक्टर भी दबाव में दिखाई दिए।

क्यों डर गया है बाजार?

इस बार बाजार में गिरावट केवल तकनीकी करेक्शन नहीं मानी जा रही। निवेशकों को डर है कि अगर पश्चिम एशिया संकट लंबा खिंचता है तो भारत जैसी तेल आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर महंगाई, रुपये और कंपनियों की लागत पर पड़ता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा गिरावट में “ग्लोबल रिस्क” का असर ज्यादा दिखाई दे रहा है। यही वजह है कि विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं।


1. पश्चिम एशिया संकट और ईरान युद्ध ने बढ़ाई टेंशन

शेयर बाजार में गिरावट का सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता युद्ध संकट माना जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने की बजाय लगातार बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में कहा कि ईरान के साथ संभावित सीजफायर “लाइफ सपोर्ट” पर है। अमेरिका द्वारा दिए गए शांति प्रस्ताव पर ईरान की शर्तों ने हालात और खराब कर दिए हैं।

अमेरिका और इजरायल द्वारा 28 फरवरी को ईरान पर किए गए हमले के बाद से वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर चिंता काफी बढ़ गई है। निवेशकों को डर है कि अगर यह संघर्ष और बढ़ा तो दुनिया भर में ऊर्जा संकट गहरा सकता है।

शेयर बाजार हमेशा अनिश्चितता से डरता है। युद्ध जैसी स्थितियों में निवेशक जोखिम वाले एसेट्स से पैसा निकालकर सुरक्षित निवेश विकल्पों की तरफ जाते हैं। यही कारण है कि वैश्विक इक्विटी बाजारों में भी दबाव देखने को मिल रहा है।


2. कच्चे तेल की कीमत 107 डॉलर के पार

कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी भारतीय बाजार के लिए सबसे बड़ा खतरा बनती जा रही है। ब्रेंट क्रूड करीब 3 फीसदी उछलकर 107 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। दुनिया की सबसे बड़ी तेल कंपनी सऊदी अरामको ने चेतावनी दी है कि वैश्विक तेल स्टॉक खतरनाक रूप से कम स्तर की ओर बढ़ रहा है।

इसके अलावा अप्रैल में ओपेक देशों का उत्पादन 26 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। यानी सप्लाई पहले से ही कमजोर है और युद्ध ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है।

भारत के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है क्योंकि महंगा तेल सीधे कई सेक्टरों की लागत बढ़ाता है:

  • एयरलाइंस कंपनियों का खर्च बढ़ता है
  • पेंट और केमिकल उद्योग प्रभावित होते हैं
  • ट्रांसपोर्टेशन महंगा होता है
  • महंगाई बढ़ती है
  • सरकार पर सब्सिडी का दबाव बढ़ता है

यही वजह है कि ऑटो, एविएशन और पेंट कंपनियों के शेयरों में भारी बिकवाली देखने को मिली।


3. रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा

भारतीय रुपया भी बाजार की चिंता बढ़ाने वाला बड़ा फैक्टर बन गया है। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में रुपया 35 पैसे टूटकर 95.63 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले सोमवार को भी रुपया 79 पैसे कमजोर होकर 95.28 पर बंद हुआ था।

रुपये में गिरावट का मतलब है कि भारत के लिए तेल आयात और महंगा हो जाएगा। इससे देश का आयात बिल बढ़ेगा और चालू खाते के घाटे पर दबाव बढ़ सकता है।

कमजोर रुपया विदेशी निवेशकों को भी डरा रहा है क्योंकि उन्हें अपने निवेश पर करेंसी लॉस का खतरा बढ़ जाता है। यही वजह है कि एफआईआई लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं।

हालांकि आईटी और एक्सपोर्ट आधारित कंपनियों को कमजोर रुपये से कुछ फायदा मिल सकता है, लेकिन फिलहाल बाजार का फोकस व्यापक आर्थिक जोखिमों पर ज्यादा है।


4. विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड बिकवाली

विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई की लगातार बिकवाली ने बाजार की हालत और खराब कर दी है। शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक सोमवार को एफआईआई ने 8,437 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए।

ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से 20 अरब डॉलर से ज्यादा निकाल चुके हैं। यह सिर्फ आंकड़ा नहीं बल्कि बाजार के भरोसे में गिरावट का संकेत है।

जब विदेशी निवेशक बिकवाली करते हैं तो बाजार में लिक्विडिटी घटती है और बड़े शेयरों में दबाव बढ़ जाता है। यही वजह है कि रिलायंस, एचडीएफसी बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और टीसीएस जैसे हैवीवेट शेयरों में भी कमजोरी दिखी।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक वैश्विक स्थिति स्थिर नहीं होती, तब तक एफआईआई की बिकवाली जारी रह सकती है।


5. प्रधानमंत्री मोदी की अपील से भी प्रभावित हुई बाजार धारणा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया अपील ने भी बाजार की धारणा पर असर डाला है। हैदराबाद में एक रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने लोगों से ईंधन का विवेकपूर्ण इस्तेमाल करने, सोने की खरीद टालने और विदेश यात्राएं कम करने की सलाह दी।

उन्होंने कारपूलिंग, मेट्रो के इस्तेमाल, इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा और वर्क फ्रॉम होम जैसे उपाय अपनाने की बात कही ताकि विदेशी मुद्रा की बचत हो सके।

हालांकि यह अपील अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से की गई थी, लेकिन बाजार ने इसे संभावित आर्थिक दबाव के संकेत के रूप में लिया। निवेशकों को लगा कि सरकार आने वाले समय में ऊर्जा संकट और विदेशी मुद्रा दबाव को लेकर गंभीर चिंताओं का सामना कर सकती है।


किन सेक्टरों पर सबसे ज्यादा दबाव?

मौजूदा गिरावट में लगभग सभी सेक्टर लाल निशान में दिखाई दिए लेकिन कुछ सेक्टरों पर दबाव ज्यादा रहा:

सेक्टरगिरावट की वजह
बैंकिंगविदेशी बिकवाली और आर्थिक चिंता
ऑटोमहंगा तेल और लागत बढ़ने का डर
एविएशनएटीएफ कीमतों में उछाल
मेटलवैश्विक मांग घटने की आशंका
रियल एस्टेटब्याज दर और निवेशक भावना कमजोर

हालांकि आईटी सेक्टर में गिरावट अपेक्षाकृत सीमित रही क्योंकि कमजोर रुपये से एक्सपोर्ट आधारित कंपनियों को फायदा हो सकता है।


क्या यह 2020 जैसा बड़ा क्रैश बन सकता है?

विशेषज्ञ फिलहाल इसे कोविड जैसी स्थिति नहीं मान रहे, लेकिन यह जरूर कहा जा रहा है कि अगर तेल 110-120 डॉलर के ऊपर टिकता है और युद्ध लंबा खिंचता है तो भारतीय बाजार में और गिरावट आ सकती है।

भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल मजबूत ग्रोथ दिखा रही है लेकिन:

  • महंगा तेल
  • कमजोर रुपया
  • एफआईआई बिकवाली
  • महंगाई का खतरा

इन सभी फैक्टर्स का संयुक्त असर बाजार को लंबे समय तक दबाव में रख सकता है।


निवेशकों को क्या करना चाहिए?

बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि घबराकर बिकवाली करना सही रणनीति नहीं हो सकती। लंबी अवधि के निवेशकों को मजबूत कंपनियों पर फोकस बनाए रखना चाहिए।

निवेशकों के लिए अहम सलाह

  • ज्यादा कर्ज वाली कंपनियों से बचें
  • डिफेंसिव सेक्टरों पर नजर रखें
  • SIP बंद न करें
  • एकमुश्त निवेश से बचें
  • कैश रिजर्व बनाए रखें
  • तेल और रुपये की चाल पर नजर रखें

क्यों महत्वपूर्ण है यह गिरावट?

यह गिरावट सिर्फ शेयर बाजार की कमजोरी नहीं दिखाती बल्कि यह संकेत देती है कि वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव अब सीधे भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने लगे हैं। अगर पश्चिम एशिया संकट जल्दी खत्म नहीं हुआ तो इसका असर:

  • महंगाई
  • पेट्रोल-डीजल कीमतों
  • रुपये
  • सरकारी खर्च
  • आम आदमी की जेब

सभी पर दिखाई दे सकता है।

इसी वजह से निवेशकों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है और बाजार में भारी उतार-चढ़ाव बना हुआ है।

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By Namam Sharma Senior Editor – Newsjagran
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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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