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Hormuz Crisis: अगर भारत-ओमान पाइपलाइन बन गई होती तो नहीं आता ऊर्जा संकट? 1600KM प्रोजेक्ट पर फिर तेज हुई चर्चा

Namam Sharma
Last updated: 2026/05/11 at 8:56 अपराह्न
Namam Sharma - Senior Editor – Newsjagran
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8 Min Read
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पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ते तनाव ने भारत समेत दुनिया के कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण कड़ा करने के बाद तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हुई है। इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, कच्चे तेल की कीमतों और भारत के ऊर्जा आयात बिल पर साफ दिखाई दे रहा है।

Contents
आखिर क्या है ओमान-भारत पाइपलाइन प्रोजेक्ट?आखिर यह प्रोजेक्ट इतना महत्वपूर्ण क्यों है?1990 के दशक से क्यों अटका हुआ है प्रोजेक्ट?कितना सस्ता पड़ सकता था यह प्रोजेक्ट?क्या अब तकनीकी चुनौती कम हो गई है?भारत-ओमान व्यापार भी तेजी से बढ़ाक्या यह परियोजना भारत की ऊर्जा रणनीति बदल सकती है?पीएम मोदी की ऊर्जा बचत अपील से कैसे जुड़ता है यह मुद्दा?क्या अब फिर शुरू हो सकती है परियोजना?

इसी बीच एक पुराना लेकिन बेहद अहम प्रोजेक्ट फिर चर्चा में आ गया है। यह है ओमान-भारत डीप वॉटर पाइपलाइन प्रोजेक्ट यानी OIDMPP। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह परियोजना समय पर पूरी हो गई होती तो आज भारत को होर्मुज संकट का इतना बड़ा असर नहीं झेलना पड़ता।

भारत के जियो-स्ट्रैटजिस्ट संदीप उन्नीथन ने इस परियोजना को लेकर कहा है कि अब इस प्रोजेक्ट को तेजी से आगे बढ़ाने का समय आ गया है। उनका कहना है कि यह पाइपलाइन भारत की ऊर्जा सुरक्षा को पूरी तरह बदल सकती है।

आखिर क्या है ओमान-भारत पाइपलाइन प्रोजेक्ट?

ओमान-भारत गहरे समुद्र की पाइपलाइन परियोजना एक प्रस्तावित ऊर्जा कॉरिडोर है जो मध्य पूर्व को सीधे भारत से जोड़ने की योजना पर आधारित है। इसे OIDMPP, MEIDP और SAGE प्रोजेक्ट के नाम से भी जाना जाता है।

यह परियोजना मुख्य रूप से प्राकृतिक गैस को ओमान से सीधे भारत तक पहुंचाने के लिए बनाई गई थी। प्रस्ताव के मुताबिक पाइपलाइन ओमान के रास अल जिफान से शुरू होकर गुजरात के पोरबंदर तक पहुंचती।

इसकी कुल लंबाई लगभग 1600 किलोमीटर बताई गई है और इसे समुद्र की सतह से करीब 3500 मीटर नीचे बिछाने की योजना थी। यही इसकी सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती भी मानी जाती है।

आखिर यह प्रोजेक्ट इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरत का लगभग 85 फीसदी हिस्सा आयात करता है। ऐसे में मध्य पूर्व भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोतों में शामिल है।

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। भारत को आने वाला बड़ा हिस्सा कच्चा तेल, एलएनजी और गैस इसी रास्ते से होकर आता है।

अगर इस मार्ग में किसी तरह का व्यवधान होता है तो भारत के ऊर्जा आयात, विदेशी मुद्रा भंडार, महंगाई और आर्थिक वृद्धि पर सीधा असर पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि ओमान-भारत पाइपलाइन भारत को समुद्री संकटों और भू-राजनीतिक जोखिमों से काफी हद तक बचा सकती थी क्योंकि इससे गैस की सप्लाई अधिक स्थिर और सुरक्षित हो जाती।

1990 के दशक से क्यों अटका हुआ है प्रोजेक्ट?

इस परियोजना पर पहली बार 1990 के दशक में गंभीर चर्चा शुरू हुई थी। बाद में साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज यानी SAGE ने इसे आगे बढ़ाने की कोशिश की।

SAGE ने भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय को करीब 5 अरब डॉलर की लागत वाला अंडर-सी एनर्जी कॉरिडोर प्रस्तावित किया था। इसके जरिए भारत को ओमान, यूएई, सऊदी अरब, कतर, ईरान और तुर्कमेनिस्तान से गैस आयात करने का विकल्प मिल सकता था।

हालांकि कई वर्षों तक तकनीकी चुनौतियां, भारी लागत, कूटनीतिक मुद्दे और घरेलू गैस ग्रिड परियोजनाओं को प्राथमिकता मिलने की वजह से यह योजना आगे नहीं बढ़ पाई।

कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत सरकार ने उस समय कोच्चि-थूथुकुडी पाइपलाइन और घरेलू गैस नेटवर्क जैसी परियोजनाओं को ज्यादा प्राथमिकता दी थी।

कितना सस्ता पड़ सकता था यह प्रोजेक्ट?

SAGE के मुताबिक यह पाइपलाइन भारत के लिए एलएनजी आयात की तुलना में काफी सस्ती साबित हो सकती थी। कंपनी का दावा था कि गैस आयात लागत प्रति मिलियन BTU पर 1.5 से 2 डॉलर तक कम हो सकती थी और भारत को हर साल लगभग ₹7000 करोड़ की बचत हो सकती थी।

SAGE के निदेशक सुबोध कुमार जैन ने 2023 में कहा था कि यह प्रोजेक्ट हर साल करीब 945 मिलियन डॉलर तक की बचत करा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लंबे समय में यह परियोजना भारत की ऊर्जा लागत कम करने के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत कर सकती है।

क्या अब तकनीकी चुनौती कम हो गई है?

जब इस परियोजना पर शुरुआती चर्चा हुई थी तब 3500 मीटर गहराई में पाइपलाइन बिछाना बेहद कठिन और महंगा माना जाता था।

लेकिन अब डीप-वॉटर इंजीनियरिंग, समुद्री पाइपलाइन तकनीक और ऊर्जा अवसंरचना में काफी प्रगति हो चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि आज यह परियोजना पहले की तुलना में ज्यादा व्यवहारिक दिखाई देती है।

भारत-ओमान व्यापार भी तेजी से बढ़ा

भारत और ओमान के बीच आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच व्यापार लगभग 10.61 अरब डॉलर तक पहुंच गया।

दोनों देश व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते यानी CEPA को अंतिम रूप देने की दिशा में भी काम कर रहे हैं। माना जा रहा है कि अगर यह समझौता लागू होता है तो ऊर्जा सहयोग और मजबूत हो सकता है।

क्या यह परियोजना भारत की ऊर्जा रणनीति बदल सकती है?

ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह पाइपलाइन बनती है तो भारत को एलएनजी आयात पर निर्भरता कम करने, ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने और भू-राजनीतिक जोखिम घटाने में बड़ी मदद मिल सकती है।

इसके अलावा भारत को खाड़ी देशों से दीर्घकालिक गैस आपूर्ति सुनिश्चित करने का स्थायी विकल्प भी मिल सकता है।

पीएम मोदी की ऊर्जा बचत अपील से कैसे जुड़ता है यह मुद्दा?

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ऊर्जा की बचत, गैर-जरूरी यात्रा कम करने और ईंधन खपत घटाने की अपील की थी। विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज संकट और बढ़ती तेल कीमतों के बीच भारत अपने विदेशी मुद्रा भंडार और ऊर्जा आयात बिल को लेकर गंभीर दबाव महसूस कर रहा है।

ऐसे में OIDMPP जैसी परियोजनाएं भविष्य में भारत को ऊर्जा संकटों से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

क्या अब फिर शुरू हो सकती है परियोजना?

फिलहाल यह परियोजना आधिकारिक रूप से “ऑन-होल्ड” मानी जाती है। लेकिन पश्चिम एशिया संकट और ऊर्जा सुरक्षा की बढ़ती चिंता के बाद इस पर फिर गंभीर चर्चा शुरू हो गई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर भारत ऊर्जा सुरक्षा, गैस आधारित अर्थव्यवस्था और दीर्घकालिक आयात रणनीति पर तेजी से काम करना चाहता है, तो इस परियोजना को दोबारा प्राथमिकता दी जा सकती है।

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नमम शर्मा, Newsjagran के सीनियर एडिटर हैं। बिज़नेस न्यूज़, कमोडिटी बाज़ार, सोना-चांदी भाव, पेट्रोल-डीजल रेट और फाइनेंस में 9 साल का अनुभव। हिंदी डिजिटल पत्रकारिता के जानकार।
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